छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमारी आँखें फोड़ रहे थे तो बादशाह को क्यों नहीं दिखाई पड़ा?'' क्रोध से अपने ओंठ चबाते हुए गरजा, "लड़ने वाले बहादुर अपने मित्रों के क्षेत्र में सेना लेकर नहीं जाते। उन्हें कष्ट देना ठीक नहीं। इसी इरादे से आप पहाड़, पोलादपुर की ओर गये ही नहीं—छोड़ो उस बात को! पहले यह बताओ कि वह पैसा कहाँ है?'' "अब्बाजान पैसा तो सारा समाप्त हो गया। इसीलिए तो हमारी सेना की यह दुर्दशा हुई।'' "वह नहीं, कहाँ है सम्भा द्वारा दी गयी रिश्वत?'' मुअज्जम को सूझ नहीं रहा था कि अपने शंकालु पिता के इस प्रश्न क्या उत्तर दे? इसलिए निराश होकर वह अपने शिविर में चला गया। वहाँ अपनी खिड़कियाँ, दरवाजे बन्द करके अपने आप से बातें करने लगा। वह एक पागल की भाँति अपने को कोसने लगा। अपने आप से ही वह बोला, "जाते समय तकलीफ, वहाँ पहुँचने पर मुसीबत, आते समय जानलेवा मुसीबत, यहाँ लौटने पर ऐसा लांछन। या खुदा! कैसी फूटी तकदीर है हमारी?'' पाँच सखूबाई निंबालकर शम्भूमहाराज मे सात वर्ष बड़ी थीं। उन्हें शम्भूमहाराज के प्रति बड़ी ममता थी। किन्तु अम्बिकाबाई के पति को कर्नाटक की सूबेदारी मिल जाने के बाद गृह कलह आरम्भ हो गया। एक दिन शम्भूराजा के जीजा महादजी निंबालकर और सखूबाई जिद करने लगे। युद्धभूमि में हजारों के सामने दृढ़ और अविचल बने रहने वाले शम्भूमहाराज गृह कलह के कारण विचलित हो गये थे। उनके भीतर हलचल मची हुई थी। सखूबाई का यही कहना था, "आपने जो व्यवहार महाड़िक परिवार के साथ किया है वही हमारे माथ भी होना चाहिए। "ऐसा क्या दे दिया है हमने उन्हें?'' महाराज ने पूछा। "जिंजी और कर्नाटक की सूबेदारी।" "दीदीजी आपको कोई गलतफहमी हुई है! हमने हरजी महाराज को कर्नाटक की सूबेदारी दी है, जागीर नहीं ? सखूबाई बहुत नाराज नजर आ रही थीं। उन्होंने झटके से कहा, "शम्भूराजा, रिश्तेदारों के बीच ऐसा भेद-भाव अखिर 508 :: सम्भाजी