छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्यों?'' शम्भुमहाराज अत्यन्त गम्भीर हो गये। येसूबाई की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें? तब सखूबाई रुष्ट स्वर में स्वयं को ही दोष देकर कहने लगी, "सारी भूल मुझसे हुई। मैंने ही निंबालकर को मिन्नत करके रोका। मैंने कहा-छोटा भाई राजा बन रहा है तो मुगलों की चाकरी क्यों करना?" "अब अपने किये कराये का फल भोगो..." महादजी ने कहा। "शम्भुमहाराज यदि आपने महाड़िकों को कुछ न दिया होता तो हम भी अपना मुँह कभी न खोलते। किन्तु बिना किसी त्याग या सेवा के उन्होंने दक्षिण का सूबा प्राप्त कर लिया और हम पागल की तरह देखते रहे।" "दिल्ली के बादशाह से जागीर मिली थी, लेकिन आप हमें भाई के स्वराज्य में खींचकर ले आयीं। हमारे लिए तो स्वार्थी स्वजनों से वह मुगल ही अच्छा था।" महादजी ने गुर्राते हुए कहा। महादजी और बहन सखूबाई की बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। अन्त में शंभुमहाराज ने कहा, "दीदीजी हमारा हिंदवी स्वराज्य जनता का मन्दिर है। पिताजी ऐसा ही मानते थे और मैं भी उसी दृष्टि से स्वराज्य की ओर देखता हूँ। आप चाहे जितना भी हठ करें, हम अलग से कोई जागीर किसी को दे नहीं सकते।" दीदी सखूबाई और महादजी चुप हो गये। दूसरे दिन उनकी पालकियाँ रायगढ़ से नीचे उतरकर चली गयीं। सम्भाजी :: 509