छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदक्षिण अभियान एक एक दिन सुबह-सुबह शहरबानू ने अपने ससुर औरंगजेब से भेंट की इजाजत माँगी। इससे बादशाह को कुछ आश्चर्य हुआ। शहरबानू ही नहीं किसी भी पुत्रवधू को यदि किसी चीज की आवश्यकता होती थी तो वह अपनी माँग उदयपुरी बेगम के सामने रखती थी। वैसे शहरबानू बहुत सुन्दर थी। वह बीजापुर की शहजादी थी। शहजादा आजम के साथ उसका विवाह हुआ था। छाती तक खिंचे हुए महीन घूँघट में भी उसकी आँखें विलक्षण रूप से चमकती थीं। इस अचानक भेंट का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए शहरबानू ने धीमे स्वर में कहा— "जिल्लेसुभानी, आपकी सल्तनत मेरे लिए मक्का-मदीना है फिर भी मुझे लगता है कि मेरे अब्बाजान की नगरी बीजापुर और मुगलों के बीच किसी प्रकार का झगड़ा नहीं होना चाहिए। इसके लिए मैंने बुरहानपुर से आगे बढ़ने से पहले ही सर्जाखान को एक सन्देश भेजा है। मैंने उन्हें समझाया है कि बादशाह की फौज की मदद करो और काफिरों को मिटा दो।" "बहुत खूब बेटी!" सहज रूप से बादशाह के मुख से निकला। बादशाह का स्वर ठंडा था— "तुम्हारा दिल पाक है किन्तु बीजापुर वालों का दिमाग ठिकाने पर नहीं है।" बादशाह ने बगल की मेज पर रखी कागज की थैलियों की ओर शहरबानू का ध्यान आकर्षित करते हुए कठोर शब्दों में कहा, "बेटी, ये कुतुबशाह, आदिलशाह और उस सम्भा के आपसी पत्र हैं जिसे हमारे थानेदारों और जासूसों ने इकट्ठा किया है। मुझे दक्खन में न घुसने देने का और मदण्णा तथा सम्भा जैसे काफिरों की औलादों की रक्षा करना इन बेवकूफों का इरादा है। बेटी तुम्हारी कोशिश के लिए शुक्रिया, लेकिन उस आदिलशाह में तो हमारे पत्रों का उत्तर देने की भी तमीज नहीं है। एक न एक दिन हमें बीजापुर को खाक करना ही पड़ेगा।" बादशाह को कोर्निस करते हुए और उसे बिना पीठ दिखाए, रुष्टभाव से वहाँ 510 :: सम्भाजी