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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 793 में से

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चली गयी। बादशाह ने बीजापुर के सम्बन्ध में वजीर से सहज ही पूछा, "असदखान! काफिरों के मददगार उस आदिल शाह पर कब आक्रमण करना है?" "पिछले कई दशकों में आक्रमण करने की हिम्मत किसी ने की नहीं, फतह की बात तो बहुत दूर की है।" "क्या?" बादशाह का चेहरा तमतमा गया। "बादशाह सलामत! उस नापाक शहर के चारों ओर अतिशय मजबूत ढाई मील की तटबन्दी है। उसके साथ बहुत गहरी खाई है। उस तटबन्दी के भीतर एक और तटबन्दी है जो फौलाद की तरह मजबूत है उनके बुर्जों पर 'मालिक-ए-मैदान' जैसी बड़ी बड़ी तोपें हैं। ये तोपें बहुत दूर तक मार करने वाली हैं।" बादशाह ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। केवल आसमान की ओर एक बार देखा। उसी दोपहर को शहंशाह की बैठक में जुल्फिकारखान दौड़ते हुए आया और कहने लगा, "जिल्लेसुभानी, बहुत अच्छी खबर है, उस सम्भा के चार बड़े सरदार विद्रोही हो गये हैं। आपसे मिलने के लिए बाहर इन्तजार कर रहे हैं।" बादशाह ने हाथ के संकेत से स्वीकृति प्रदान की। तब थोड़ी ही देर में कान्होजी शिर्के जगदेव राय, अर्जोजी और अचलोजी आकर बादशाह के सामने खड़े हो गये। उन्होंने जमीन पर माथा टेककर बादशाह को साष्टांग प्रणाम किया। "क्या चाहते हो?" बादशाह ने सीधा प्रश्न किया। "माई बाप, हमी नहीं, बहुत से मराठे खानदान उस सम्भाजी से रुष्ट हैं। उसके पास कोई न्याय व्यवस्था बची नहीं है।" कान्होजी ने अत्यन्त दीन वाणी में कहा। "तुम्हारे हिन्दवी स्वराज्य का क्या है?" "किस स्वराज्य की बात कर रहे हैं माई-बाप? वह तो पानी का बुलबुला है। किसी भी समय फूट जाएगा। शिवाजी ने काशी से ब्राह्मण बुलाकर अपने ऊपर फूलों की वर्षा करवाई और राजा बनने का नाटक किया। लेकिन इस तरह का दिखावा कितने दिन चलेगा?" "असल में क्या चाहते हो, आप लोग?" "दूसरा कुछ नहीं हम पहले के वतनदार है। उस जागीर को हमारे और हमारे बाल बच्चों के नाम कर दीजिए। हम मराठे मालिक नहीं, किसी का मांडलिक बनने के लिए जन्म लेते हैं।" "बहुत खूब! शिर्के तुम बहुत चतुर दिखाई पड़ते हो। गणोजी तुम्हारे कौन लगते हैं?" "सगे चचेरे भाई।" उन चारों सरदारों ने कुछ भी न माँगने की होशियारी दिखाई थी। किन्तु सम्भाजी :: 511

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