छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“क्या हुआ?” “अपना पाँच हजार घुड़सवारों का एक दल, हमारे साथ गद्दारी करके रात को भाग गया।” “कहाँ? सम्भा के पास?” “खबर उतनी बुरी तो नहीं है।” वजीर ने सँभलते हुए कहा। “वे सभी बैजापुर की ओर से दिल्ली, आगरा की ओर भाग गये।” “क्यों? उन्हें तनख्वाह नहीं मिली?” “दक्खन उन्हें आये आज पाँच वर्ष हो गये। उन्हें तनख्वाह मिलती है। खाने-पीने की भी कोई कमी नहीं है। किन्तु उन पागलों को अपने बाल-बच्चों की बहुत याद आ रही थी। जहाँपनाह अपनी जिन्दगी में उन्होंने इतनी लम्बी लड़ाई कभी देखी ही नहीं थी।” “यह बात ठीक नहीं, वजीर। आज पाँच हजार गये, कल दस हजार जाएँगे, बाद में पाँच लाख जाएँगे। इस प्रकार एक-एक करके सारी शाही फौज टूट जाएगी।” “फिर क्या हुक्म है, मेरे मालिक?” चाहे तो चौगुनी फौज उनके पीछे भेजो, किन्तु उनकी मुस्कें चढ़ाकर खींचते हुए उन्हें पीछे ले जाओ।” बादशाह कहते-कहते रुक गया। बहुत गम्भीर होकर कहने लगा-“राजमहल में सौ खम्भे हैं। उनमें यदि एकाध आड़ा-तिरछा हो गया तो क्या बिगड़ेगा? ऐसा सोचने की मूर्खता न करो। इस प्रकार के घमंड और ऐसी मूर्खता का जिन्दगी में कोई उपयोग नहीं है। यह विनाश की शुरुआत है। बुद्धिमान व्यक्ति को इससे सीख लेनी चाहिए।” पाँच औरंगाबाद से दिल्ली की ओर भागती अपनी सेना को पकड़ने में औरंगजेब सफल हो गया। औरंगजेब उन सभी भगोड़े सैनिकों को समाप्त कर देने का विचार बना रहा था। किन्तु इस प्रकार के कठोर निर्णय लेने का वह समय नहीं था। बादशाह बहुत देर तक बेचैनी के साथ बैठा रहा। अन्त में उसने वजीर से कहा, “शरीर से थकी फौज को नयी रसद पहुँचाकर तरोताजा किया जा सकता है। सम्भाजी :: 523