छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिन्तु मन से थकी हुई फौज चिन्ता का विषय बन जाती है। हमें एक बात बताओ, अनाज, लिबास, तनख्वाह छोड़कर इन मूर्खों को और क्या चाहिए।" "एक विजय।" "मतलब!" "आलमपनाह, पिछले पाँच-छः वर्षों में अपनी फौज ने एक लड़ाई जीती नहीं है। वह नन्हा-सा रामशेज आज भी हमारे क़ब्जे में नहीं आ रहा है। अगले कुछ महीने अथवा वर्ष में सम्भाजी पराजित होगा, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। हजरत, सम्भा के किले सचमुच फौलाद के बने हैं।" "फिर उसी सम्भा और उसकी फौज की तारीफ?" बादशाह ने घूरा। "तारीफ नहीं हजरत, यह हकीकत है।" बरामदखान बीच में बोल पड़ा। "मराठों की फौज एक अद्भुत चमत्कार है, जिल्लेसुभानी। अपनी विजय बिना निश्चित किये वह सम्भा और हंबीरराव मैदान में आते ही नहीं। हथियार से हथियार भिड़ाते ही नहीं।" "तो बड़ी फौज लेकर जाओ।" "बड़ी फौज की गन्ध पाते ही मराठे छूमन्तर हो जाते हैं। भूतों की तरह पेड़ों और पहाड़ों में कहाँ अदृश्य हो जाते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। पीछा करना बन्द किया कि तूफानी गति से हमारे ऊपर आक्रमण करते हैं। हवा और पानी की लहरों की तरह उठते हैं।" "किन्तु आज अपनी फौज की दिमागी हालत बिगड़ी है। उसका क्या?" औरंगजेब ने महत्त्वपूर्ण मुद्दा उपस्थित किया। बादशाह के प्रश्न पर सभी ने स्वीकृति में सिर हिलाया। असदखान ने स्वीकारोक्ति में कहा, "जहाँपनाह, इसमें कोई शक नहीं कि अपनी सेना का दिल टूट गया है रामदरा घाट में इन मराठों ने खड़ी घास जला दी लेकिन हमारे घोड़ों को घास-दाना खाने नहीं दिया। हजरत, रामशेज का किला तो भूतखाना ही है।" दरबार उठ गया। बादशाह के माथे से चिन्ता की लकीरें मिट नहीं रही थीं। अपना ओंठ चबाते हुए बादशाह ने कहा, "वजीरे आजम, इन सभी बातों का एक ही मतलब है। सम्भा, गोलकुंडा के कुतुबशाह और बीजापुर के आदिलशाह की मित्रता को पहले तोड़ना होगा। यदि मराठों के प्रदेश पर जीत सम्भव नहीं हो पाती तो और कहीं सही। हमारी फौज को विजय की जरूरत है—जरूरत है।" "जी, जहाँपनाह।" "इन दोनों इस्लामी हुकूमतो मे मराठों को मिलने वाली गुप्त सहायता तुरन्त बन्द होनी चाहिए। इसके लिए पहले इन दोनों इस्लामी हुकूमतो को नेस्तनाबूद करना है। उसके बाद पहाड़ के उस चूहे के बच्चे को पकड़कर कुचल देने के अलावा हमारे हाथ में बचा ही क्या है?" 524 सम्भाजी