भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 531

कुतुबशाही को और आजम को आदिलशाही को विनष्ट करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। सम्भव हो तो युद्धभूमि के समीप रहकर दोनों फौजों को लड़ाते रहने का उसका विचार था। बीजापुर पर घेरा डाले शहजादे आजम को एक वर्ष बीत चुका था। किन्तु निकट भविष्य में जीतने के कोई भी संकेत दिखाई नहीं पड़ रहे थे। इससे औरंगजेब बहुत नाराज हो रहा था। उसी समय उसका खान ई जहान नामक सरदार मंगलबेडा और सांगोला जैसी आदिलशाह की चौकियों को जीतकर उस पर दबाव बढ़ा रहा था। इससे औरंगजेब को कुछ सन्तोष हुआ। पहरे के सिपाही इधर उधर गश्त लगा रहे थे। लालबाग में थोड़ा दूर पर असदखान का डेरा था। अपने चाचा वजीर असदखान पर बादशाह का बहुत क्रोध आ रहा था। वजीर के साथ में उसकी एक सौ आठ बेगमें भी फौज के साथ थीं। अपने अय्याश स्वभाव के कारण असदखान राजकीय कार्यों में ध्यान नहीं दे पाता था। शाहंशाह की यही शिकायत थी। वजीर के तम्बू के पास अचानक दस बारह घोड़ों का एक दल आया। कुछ बहुत आवश्यक सूचना लेकर ये दूत आये थे। वजीर जल्दी जल्दी तैयार हुआ और दूतों को लेकर लालबारी के बीच वाले चौक में आया। बादशाह की शय्यागृह वाले विशाल तम्बू में पूरी निस्तब्धता देखकर वे सभी वापस लौटे। किन्तु इसी समय बादशाह दरवाजे पर आ गया। उसके नौकर ने असदखान को पुकारा। डेरे के बाहर घोड़ों के दबे पाँव चलने पर भी उनकी आवाज से बादशाह जाग गया इसका सभी को आश्चर्य हुआ। घबराये दूत बादशाह के निजी बैठक में आये। उन्हें बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अन्त में असदखान ने बताना आरम्भ किया—‘‘जहाँपनाह रहम करें। अपने दिन ही इतने बुरे आ गये हैं। किया भी क्या जाय? कल रात सांगोला की अपनी छावनी पर मरगट्ठों ने डाका डाला। वे जत की ओर दौड़ते हुए आये थे। आपका खजाना लूट लिया, शाही तबले से पाँच सौ घोड़े भगा ले गये। जहाँपनाह अँधेरे और हो हल्ले का फायदा उठाकर उन लोगों ने बहुत ऊधम मचाया।‘’ ‘‘मराठों के इस आक्रमण मुखिया कौन था?’’ ‘‘हंबीरराव मोहिते।‘’ इस नाम को सुनते ही बादशाह ने आसमान की ओर देखते हुए सिर ऊपर उठाया। बादशाह ने वाकेनवीस और अन्य लोगों को बाहर जाने के लिए कहा। अब अपने ऊपर कौन सी आफत आएगी, यह सोचते हुए असदखान सिकुड़कर बैठ गया। आश्चर्यचकित बादशाह पीडा भरे स्वर में बोला, ‘‘आजकल मैं एक बात के लिए खुदा की आयतें पढ़ता हूँ कि कुछ ऐसे दिन आएँ जब सम्भा और हंबीर का नाम कान पर न आये और परोसा हुआ भोजन मीठा लगे।‘’ सम्भाजी . 529