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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 793 में से

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"हुजूर!"' "आखिर कौन है यह हंबीर?"' "सम्भा का मामा—" "वह बात नहीं। मेरा सवाल अलग है। हमारी पाँच लाख की फौज में ऐसा कोई एकाध खंबीर-हंबीर क्यों नहीं पैदा होता? कैसी है हमारी फौज—नामर्दों और हिजड़ों की बारात।" असदखान इस प्रकार सिर झुकाए बैठा था जैसे उसके गले की हड्डी ही टूट गयी हो। वह सिर उठाने के लिए तैयार नहीं था। तब बादशाह अपनी कठोर आवाज में बोला, "वजीरे-आजम अब आप को तीन ही बातें करनी हैं। पहली बात यह कि उस हंबीर पर करोड़ों की दौलत उड़ा दो। नहीं तो ऐसा करो—उसे नियन्त्रित करो। उससे कहो कि तुम्हारे जैसा बहादुर बलिष्ठ मर्द मुझे मिले तो तुम्हें ही हम रायगढ़ का राजा बना दें। उस काफिर सम्भा को हमेशा के लिए कारागार में डाल दें।" "क्या बात है आका? ऐसा कुछ तो हमने सोचा भी नहीं था।" उस कल्पना मात्र से असदखान आनन्द से भरकर खड़ा रहा गया। "वह हंबीर हमारे पास आता है तो उसके रास्ते में फूल बिछा दो, नहीं आता तो धारदार खंजर तैयार रखो—किन्तु वह जिन्दा या मुर्दा हमें नहीं मिला तो इस दक्खन की मिट्टी से कोई ऐसे शेर ढूंढ़ो जो इस हंबीर नाम के सिर दर्द से हमेशा के लिए हमें मुक्त कर दें।" बादशाह ने असदखान के साथ बहुत देर तक विचार विमर्श किया। उस बैठक में ही हंबीरराव के लिए एक लुभावना पत्र तैयार किया गया। बादशाह ने कहा, "बारूगढ़ जाकर हमारे नागोजी माने से मिलो। वही नेक इनमान हमारी मदद करेगा। यदि सीधे यह पैगाम ले जाने की भूल करोगे तो हंबीर ले जाने वाले को कच्चा चबा जाएगा।" औरंगजेब ने मुस्कराते हुए कहा, "अब हमें अपनी फौज के आदमियों पर विश्वास नहीं रहा। अब तो दक्षिण के गद्दारों को लेकर ही काम चलाना पड़ेगा। उस सर्जाखान को भी किसी न किसी प्रकार मिलाने की कोशिश करो वजीर ए आजम।" "लेकिन जहाँपनाह, इससे पहले आपने ही उसे बीजापुर से बाहर निकालने के लिए दबाव डाला था।" "इसका कारण यह है कि सर्जाखान ही उसकी सच्ची लड़ाकू शक्ति है। एक कारगर हथियार है। ऐसा हथियार यदि आदिलशाह की बजाय हमारे शाही अस्त्रागार में आ जाय तो उसकी जरूरत हमें क्यों न होगी?" 530 :: सम्भाजी

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