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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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कमलजा का घोड़ा रुकने वाला नहीं है। उसने कमर के पट्टे से अपनी कटार निकाली और कमलजा के घोड़े को मारा। कटार चक्र की तरह घूमती हुई घोड़े के अगले पैर में जा लगी। घोड़े के पैर में कटार के चुभते ही वह जोर से हिनहिनाकर मुँह के बल गिरा और कमलजा भी बगल में दूर जा गिरी। उसके पैर में मोच आ गयी। वह उठे उससे पहले ही अनेक सैनिकों ने उसे घेर लिया। कमलजा कैद हो गयी। ज़ीनतउन्निसा बहुत होशियार और बुद्धिमती थी। उसने जैनुद्दीन को तुरन्त बुलवाया और कहा, "यह घटना किसी को मत बताना।" उसने अपने दरबारियों और जासूसों में किसी को धमकाया किसी को बख्शीस दी। घटित प्रसंग को दोहराते हुए शहजादी ने जैनुद्दीन से कहा, "जो घटित हुआ यह भी हमारी खेल कूद का ही एक हिस्सा है। ऐसा ही समझना। नहीं तो यदि यह समाचार हमारे अब्बा के कान तक गया तो कमलजा भी हमारी दीदी जेबुन्निसा की तरह अँधेरी कोठरी के बाहर कभी दिखेगी नहीं।" उस रात को महल के पास गिरकर जख्मी हुई मानकर हकीम द्वारा कमलजा का इलाज शुरू हुआ। उसकी खाट के पास ज़ीनत बैठी थी। वह वहाँ आधी रात तक जागती रही। एकान्त देखकर शहजादी ने कहा, "कमलजा, तुममें और मुझमें एक विलक्षण समानता है। तुम और मैं ही अपने पिता से अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रेम करते हैं।" अपने पैर के दर्द को दबाते हुए कमलजा ने प्रश्न किया— "शहजादी दीदी पिता और पुत्री के बीच के प्रेम को ठीक-ठीक समझने का आपका दावा गलत है। यदि सचमुच ऐसा होता तो आज दोपहर को मेरा घोड़ा क्यों रोका जाता ? एक अभागी लड़की जन्म से अपने कभी न देखे पिता से मिलने जा रही थी। इस बात में तो आपको आनन्द का अनुभव करना चाहिए था। क्या मैं आपके खजाने में डाका डालकर जा रही थी।" "कमलजा तू कोई ऐरी गैरी लड़की नहीं है। तुम्हारे शरीर में तुम्हारे दादा जान शिवाजी महाराज और पिता सम्भाजी महाराज का रक्त भरा है।" "लेकिन मैं तो खाली हाथ निकली थी। मेरे अकेले के चले जाने से शाही फौज को क्या फरक पड़ने वाला था ?" "बहुत खूब।" "अं?" "हाँ, पिछले सात आठ साल से तुम्हारा बचपन अहमदनगर और बहादुरगढ़ किले में बीता है। इन दोनों किलों के कोने कोने का नक्शा तुम्हारी आँखों में उतर आया है। कलेजे पर अंकित हो गया है। रायगढ़ जाकर अपने पिता की आँखों के 532 सम्भाजी