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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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सामने नक्शा फैला दिया होता तो? तो हमारे अब्बाजान औरंगजेब साहब की मौत पाँच दस वर्ष पहले आ जातीऽ। इसीलिए तो '' नौ "येसू, हमारे मराठी प्रदेश को किसी की नजर लग गयी है। आज औरंगजब का दबाव थोड़ा दक्षिण की ओर सरका है, थोड़ी साँस लेने का अवकाश मिला तो अकाल दम तोड़ रहा है।" "सच है स्वामी, पिछले दो तीन वर्षों में अकाल की जो करालता रही है ऐसा तो कभी किसी ने नहीं देखा। ऐसा बूढ़े लोग भी कहते हैं।" इस प्रकार येसूबाई ने अपनी सहमति प्रकट की। "येसू, अकाल ने फसलें नष्ट कर दीं, जमीन बंजर हो गयी, इसका तो कुछ नहीं, यह मुझे स्वीकार है किन्तु किसानों की गोशालाएँ और तबेले नष्ट हो रहे यह बड़े दुःख की बात है।" "स्वामी, कल यदि हमारे पास अश्वधन नहीं रहेगा तो यदि कहीं लड़ाई या चढ़ाई करनी होगी तो किसके बल पर करेंगे?" पिछले कई वर्षों से पड़ने वाले अकाल ने 1686 87 में उग्र रूप धारण कर लिया था। हिन्दवी स्वराज्य की कमर टूटने का समय आ गया था। किन्तु इस दैवी आपदा का सामना करने में येसूबाई और शम्भूमहाराज सफल हुए। अकाल से पीड़ित प्रजा के लिए उन्होंने रायगढ़ पर एक विशेष कचहरी खोली थी। नीलोपन्त पेशवा की ओर से किलेदारों और अमलदारों को आदेश भेजे गये थे। यह सन्देश था— 'नयी बुआई और सिंचाई के लिए प्रजा की सहायता करो। इसके लिए सरकारी खजाने से आर्थिक सहायता दी जाए।' जनवरी 1686 में सतारा के पूर्वी हिस्से में—माणदेश, खटाव औंध, कोरेगाँव आदि क्षेत्रों में भयंकर अकाल पड़ा था। पुणे के आसपास चिंचवड़, खेड़, चाकण आदि में भयंकर सूखा पड़ा था। कई महीनों तक अकाल की मार झेलते झेलते कई गाँवों के लोग गाँव छोड़कर अन्यत्र चले गये थे। प्रजा की अवस्था अत्यन्त दयनीय हो गयी थी। शत्रुओं से निरन्तर लड़ते रहने के कारण सरकारी खजाना भी खाली हो सम्भाजी 533