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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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देखते हुए गणोजी शिर्के ने कहा, "कविराज, आपके बाहर जाने से कैसे चलेगा?" "'नहीं, ऐसे ही जाकर आता हूँ।'" "'ऐसे कैसे कविराज ? जा कहाँ रहे हैं? रायगढ़ के महाराज आपके बिना पानी तक नहीं पीते, श्वास भी नहीं लेते।'" "'ठीक कह रहे हो गणोजीराव ! राजा को ईमानदार व्यक्ति अपने समीप रखने पड़ते हैं और इसी प्रकार नालायकों को दस हाथ दूर ही रखना पड़ता है।'" शम्भू महाराज के इस उद्गार से येसूबाई का चेहरा खिल गया। महाराज ने तत्काल पूछा, "कहिये गणोजी, कैसे हैं?" गहरी साँस लेते हुए गणोजी ने कहा, "हमारे सगे जीजा स्वराज्य के छत्रपति हैं। इतने बड़े साम्राज्य के मालिक हैं। मेरी छोटी बहन रायगढ़ की साम्राज्ञी है। किन्तु यह सब व्यर्थ है। हमारे जीजाजी ने हमें कभी अपना माना ही नहीं। क्यों येसू सच है, कि गलत?" "किसलिए बहन को साक्षी बना रहे हैं, गणोजीराव?" सम्भाजी राजा का चेहरा तमतमा गया। वे अपने दाँतों से ओंठ चबाते हुए बोले, "दूर की बात क्यों करें ? पिछले तीन महीने में आप स्वयं छुप-छुपकर औरंगजेब से कितनी बार मिले हैं इसका पक्का सबूत दूँ आपको ? वे सारे प्रमाण और आपके हाथ के लिखे पत्रों को महारानी ने भी अपनी आँखों से देख लिया है।'" महाराज के सीधे आक्रमण से गणोजी कुछ घबराये अवश्य किन्तु दूसरे ही क्षण अपना मूल स्वर पकड़ते हुए आवेश में बोले, "मैं कहता हूँ, ठीक है। मैं मिला औरंगजेब से। किन्तु कोई व्यक्ति इतनी दूर तक क्यों चला जाता है इसका विचार राजमुकुट धारण करने वाले व्यक्ति को करना चाहिए या नहीं?" "जागीर के लिए ही न?" शम्भू महाराज ने गणोजी पर दृष्टि टिका दी। "वही कह रहा हूँ महाराज, आपके तीर्थस्वरूप पिता शिवाजी महाराज ने वचन दिया था कि मुझे यदि पुत्ररत्न प्राप्त होगा तो दाभोल की जागीर उसके नाम कर देंगे। अब हमारे चिरंजीव आठ वर्ष के हो गये हैं। कब दे रहे हैं आप हमें हमारी जागीर?" गणोजी उखड़ गये। "गणोजीराव आप समझते क्यों नहीं? समय बहुत खराब आया है। औरंगजेब जैसा शत्रु गर्दन पर सवार है। यदि आप अकेले को जागीर दी तो दूसरों को भी देनी पड़ेगी। अराजकता फैल जाएगी। इसीलिए कहता हूँ, थोड़ा धीरज रखिये।" सम्भाजी ने समझाते हुए कहा। बैठक में गणोजी और सम्भाजी की बातचीत चल रही थी। बातचीत की गर्म हवा बाहर भी पहुँच रही थी। बैठक की बातचीत समाप्त करने के लिए महाराज और महारानी प्रयत्न कर रहे थे कि भोजन के बहाने उठें और भीतर चले जायें। सम्भाजी :: 569