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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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पर रक्त का सैलाब फैलाने में भी आगा पीछा नहीं देखेगा।'' शम्भू महाराज और येसूबाई ने दोपहर का भोजन समाप्त किया। उसी समय एक दासी ने दौड़ते हुए आकर सूचित किया कि गणोजी राजा पुनः बैठक में आ गये हैं। यह सुनकर शम्भू महाराज विचित्र तरह हँसे। पति से झगड़कर कोई झगड़ालू औरत अपनी गठरी उठाकर गाँव की सीमा तक जाती है और फिर लौटकर पैर पटकते हुए दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती है। यही स्थिति गणोजीराव की हुई थी। हो सकता है कि अपनी बहन पर उनका प्रेम फिर उमड़ आया हो। यह भी हो सकता है कि जगदम्बा की कृपा से उन्हें अपने किये पर पश्चाताप हुआ हो। ऐसे ही कुछ महाराज ने सोचा। किन्तु दूसरे दिन भी गणोजी अपनी ही हठ पर कायम थे। अन्त में गणोजी के भीतर का जहर आखिर बाहर निकल पड़ा। शिर्के बेचैन होकर बोले, "सम्भाजी महाराज अभी विचार कीजिए, सीधे सीधे हमारी जागीर हमें दे दीजिए, नहीं तो इस रायगढ़ को मैं एक दिन बेंचिराग कर दूँगा।'' गणोजी के मुख से ये शब्द सुनकर शम्भू महाराज झट से खड़े हो गये और गणोजी का गला घोंटने के लिए झपटे। किन्तु बिजली की तेजी से येसूबाई बीच में आ गयीं। उन्होंने अपने भाई के लिए महाराज के सामने आँचल फैला दिया। बड़े भाई के लिए उनकी आँखों में आँसू उमड़ आये। वे अपने भाई के प्राणों की भीख माँगने लगीं। महारानी के आँसुओं में ऐसी विलक्षण शक्ति थी कि महाराज का प्रलयंकर क्रोध पिघलकर तरल हो गया। विवाद आगे न बढ़े और कोई अघटित न घटित हो इसलिए येसूबाई अपने भाई को लेकर अन्दर के दालान में चली गयीं। वहाँ भी गणोजी वही रट लगाए थे। उन्होंने पक्का निर्णय ले लिया था इस बार जागीर के सम्बन्ध में फैसला कर लेना है। अपने स्वार्थ के लिए गणोजी ने महाराज पर जो आरोप किये थे उससे महारानी भी रुष्ट थीं। उन्होंने अपने भाई से चिल्लाकर कहा, "भाई साहब पिताजी के न रहने पर आपकी जबान बहुत तेज चलने लगी है क्यों?" "हाँ येसू, पिताजी के दबाव के कारण ही मैं इतने दिन चुप बैठा रहा। परन्तु उन्हें भी इस बात की कल्पना कहाँ थी कि समय इस तरह बदल जाएगा। इसलिए येसू एक बात मैं बहुत साफ साफ कह देता हूँ।" "कौन सी?" "रायगढ़ के सिंहासन पर आज कोई राजा बैठा ही नहीं है।" "तो दूसरा कौन बैठा है?" "एक अविचारी उल्लू।" सम्भाजी 571