छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 574, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंगणोजी के इस वाक्य से येसूबाई की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। उस विचारशील नारी से अपने पति का यह अपमान सहन नहीं हो पाया। वे शीघ्रता से आगे बढ़ीं। किसी को घटना का अनुमान लग सके इसके पूर्व ही उन्होंने गणोजी राजा को एक चाँटा जमाया। इस विषबाण से गणोजी घबरा गये। वे हाथ पैर झाड़ते हुए उठकर खड़े हो गये। आसपास के नौकर-चाकर, बहन भाई के इस झगड़े को अवाक् होकर देख रहे थे। क्रोध से विह्वल गणोजी ने अपनी छोटी बहन के गौर भाल की ओर देखा। उसके माथे पर कुंकुम था और आँखों से अंगारे बरस रहे थे। अपने ओंठ और दाँत चबाते हुए गणोजी ने धीमे स्वर में केवल इतना कहा, "अपने माथे का कुंकुम पोंछकर जिस दिन तू विधवा होगी, उसी दिन मैं पचास गाँवों में मिठाई बाँटूँगा, दीवाली मनाऊँगा।" "खामोश, गणोजी! पहले अपना मुँह काला करके रायगढ़ से बाहर निकलिए।" येसूबाई की आँखों में क्रोधाग्नि फूट रही थी। अपना ओंठ दाँत से चबाते हुए उन्होंने कहा, "अरे, पुण्यवान माता पिता से जन्म लेकर हम धन्य हुए। किन्तु जैसे कल्पवृक्ष के साथ विषवृक्ष पैदा हो जाये या कालसर्प पैदा हो जाये उसी प्रकार पवित्र शिर्के कुल में आप जन्मे हैं।" "येसू मैं देख लूँगा। इसका परिणाम बहुत बुरा होगा।" पैर पटकते हुए गणोजी गरजे। "औरंगजेब के कुत्ते। जाओ अपने बादशाह के पास। तुम्हारे मुँह में स्वराज्य की बासी रोटी का टुकड़ा भी नहीं जाएगा।" दो "युवराज्ञी आपके भाई गणोजी की झोली में हमने जागीरदारी नहीं डाली तो वे नाराज होकर मुगलों को निमन्त्रित करने दौड़े चले गये। निमन्त्रण भी कैसा? शत्रु को हमारे स्वराज्य में फौजी चौकी खड़ी करने का। कितना उल्टा कार्य करने के लिए वहाँ भागा है, यह शिर्केकुलभूषणऽऽ।" दरबार में अत्यन्त असन्तोष के साथ महारानी से कहा, "उन्हें बुद्धि ही नहीं है, अपने-पराये की समझ ही नहीं है।" महारानी का स्वर अपराध भाव से भर 572 :: सम्भाजी