छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगया था। "तो क्या औरंगजेब जैसे भयंकर जानवर को दरवाजा खोलकर भीतर आने दिया जाय? मैंने तो कविराज से स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि बादशाह के गुलाम सालेराजा का ऐसा अशिष्ट बर्ताव मैं कभी सह नहीं सकता। इसलिए प्रभावली में औरंगजेब के चौकी बनाने से पहले ही शिर्के को यहाँ से निकाल दिया जाय।" आजकल कवि कलश कभी कभी ही महाराज के सामने दिखाई पड़ते थे। महाराज ने उन्हें मलकापुर प्रान्त की जिम्मेदारी सौंपी थी। वहाँ से समीप अंबाघाट का संरक्षण भी उन्हीं के जिम्मे था। महाराज ने उन्हें आदेश दिया था कि जो भी हो, उस रास्ते से शत्रु के आदमी तो क्या एक चींटी भी कोंकण में उतरने न पाए। पन्हाला, मलकापुर, विशालगढ़ से अम्बाघाट भावी युद्ध की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। इसलिए कवि कलश अपने घोड़े पर उस क्षेत्र को छान रहे थे। उनकी बेचैनी और उनके जोश का प्रभाव वहाँ की प्रजा पर भी पड़ रहा था। गड़ेड़ियों के लड़के भी कविराज की प्रशंसा में कहते थे, "बड़ी जिद वाला है यह हिन्दुस्तानी ब्राह्मण।" राजा की आज्ञानुसार, पिछले महीने से कविराज ने शिर्के का पीछा करना आरम्भ कर दिया था। अपने साथ एक बड़ी फौज लेकर क्रुद्ध कविराज घूम रहे थे। पहले पन्द्रह दिनों में उन्होंने शिर्के और उनके सम्बन्धियों की रीढ़ तोड़ दी थी। किन्तु पिछले दस दिनों से कविराज का कोई समाचार नहीं मिल पाया था। इसलिए महाराज चिन्तित थे। दोपहर को किले पर चढ़कर कविराज के सचिव कृष्णाजी कोन्हेरे दरबार में आ पहुँचे। कुछ विश्राम करने या भोजन करने के चक्कर में न पड़कर वे सीधे महाराज के सामने उपस्थित हुए। उनकी चिन्तित मुखाकृति को देखकर महाराज और महारानी एक दूसरे की ओर देखने लगे। शम्भू महाराज कुछ रुष्ट होकर बोले, "पिछले दस दिनों से आपकी ओर से कोई समाचार नहीं। यह क्या चल रहा है, कृष्णाजी पन्त? शम्भुराजा का आदेश कवि कलश भी भूल गये?" "नहीं, नहीं, वैसा नहीं है।" कृष्णाजी पन्त ने बड़ी आत्मीयता से कहा, "कविराज की तलवार की अपेक्षा गणोजी की जीभ बहुत अधिक विषैली है महाराज। उन्होंने अपनी विषैली जीभ से स्वराज्य में आपके विरुद्ध गलतफहमियों का बड़वानल भड़का रखा है।" "क्या कहता है वह?" पन्त ने अपनी जीभ दबा ली। अपने गालों पर हल्की सी चपत लगाते हुए वे क्षमा माँगने लगे। इस पर महाराज ने ज्यों की त्यों बात कहने का आदेश दिया। तब सम्भाजी :. 573