छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन को कड़ा करके पन्त व्यग्र स्वर में बोले, "गणोजी कहते हैं, रायगढ़ का राजा पागल हो गया है। उसका दिमाग फिर गया है। सन्तुलन बिगड़ गया है। इसीलिए उन्होंने धर्मभ्रष्ट और शाक्तपन्थी कलश के अधिकार में स्वराज्य दे दिया है। यह कलश देव, धर्म और देश का घोर शत्रु है। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि अनेक मराठे और ब्राह्मण सरदार और सम्मानित लोग इसका विश्वास कर रहे हैं।" इस समाचार को सुनकर शम्भू महाराज बड़ी देर तक अपने आसन पर चिन्ताग्रस्त बैठे रहे। खंडो बल्लाल कागज पत्रों से सिर उठाकर चिन्तित मुद्रा में महाराज और महारानी की ओर देख रहे थे। येसूबाई ने कृष्णाजी पन्त से पूछा, "अपना काम छोड़कर कविराज का विशालगढ़ की ओर जाने का क्या कारण था?" "नहीं महारानी जी, शिर्के के दुष्प्रचार ने सारा वातावरण ही उलट दिया है। लोग यह भी भूलने लगे हैं कि असली संघर्ष शम्भू महाराज और औरंगजेब के बीच है। इसके विपरीत यह सिद्ध किया जा रहा है कि कवि कलश ही असली धर्म संकट हैं। इसलिए भ्रमित होकर कवि कलश पीछे आ गये हैं।" बीच में हस्तक्षेप करते हुए महारानी ने कहा, "मुझे लगता है कि इसी समय रायगढ़ छोड़ देना ही अच्छा है।" "महारानी, यह आप कह रही हैं?" सम्भाजी राजा ने महारानी की ओर चकित होकर देखा। महारानी ने अपनी पलकें बन्द करके हुकारी भरी। शम्भू महाराज ने खंडो बल्लाल को आदेश दिया, "खंडो जी, अभी इसी वक्त कविराज को पत्र भेजिये। उनके कहिये कि वे दो दिन के भीतर संगमेश्वर पहुँचें।" खंडो बल्लाल ने तत्काल पत्र लिखना आरम्भ किया। शत्रु से मिल जाने के कारण शम्भू महाराज शिर्के को नेस्तनाबूद करने के लिए निकलने वाले थे। किन्तु वे यह भी नहीं भूल पा रहे थे कि वह क्षेत्र उनकी प्रिय रानी का मायका है। दरबार में चक्कर काटते हुए वे बीच बीच में येसूबाई की ओर देखते थे। येसूबाई अपना आँचल सँभालते हुए राजा के सामने आ गयीं और दृढ़ स्वर में बोलीं, "महाराज, अब कोई पछतावा या दुख अपने मन में न आने दें। आप अपने निर्णय के अनुसार कार्य करें। यदि राजा की ससुराल किसी दुश्मन बादशाह का मायका बन गया है तो ऐसी ससुराल की होली जला देने से क्या बिगड़ेगा?" महाराज कुछ कहें इससे पहले ही अपने मन का गुबार निकालते हुए महारानी ने कहा, "महाराज, पिछले आठ वर्षों की गर्मी और वर्षा को आपने झेला है। यह झेलते हुए आप अपने शत्रु के विशाल सेना सागर से जूझते रहे हैं। इस बीच परायों की कौन कहे कितने अपने भी पराये हो गये। शरीर पर पहाड़ टूटने जैसा हंबीरमामा 574 :: सम्भाजी