भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 622

कुछ अप्रत्याशित घटित हो जाता है।" "कैसे?" "बड़े महाराज हमारे नाम से कागज तैयार करने वाले थे दुर्देव से बीमार पड़ गये और फिर कभी उठ नहीं पाए। इस समय भी वैसी ही परिस्थितियाँ हैं।" गिरजोजी के मुँह से निकल गया। किन्तु अपनी भूल का ध्यान आते ही उसने अपनी जीभ दबा ली। "आप कहना क्या चाहते हैं, यादव?" "ऐसा कुछ भी नहीं है। किन्तु शिर्के लोगों के नाते-रिश्ते के लोग भला बुरा कहते रहते हैं। वे कहते हैं कि राजा और राज्य सलामत है तब तक लिखा-पढ़ी करवा लो।" गिरजोजी ने कहा। शम्भूराजा यह सुनकर अवाक् रह गये। उन्होंने केवल इतना कहा, "कल रात या परसों प्रातःकाल में संगमेश्वर पहुँच जाइये। वहाँ खंडो बल्लाल भी आएँगे। उनकी उपस्थिति में आपका सारा काम निपटा देंगे।" दोपहर में राजा और कविराज घोड़ घाटी में जा पहुँचे। घोड़ घाटी पांढरपाणी और गजापुर के बीच में थी। 14 जुलाई, 1660 को वीर लड़ाकू बाजीप्रभु देशपाण्डे ने मूसलाधार वर्षा में इस घाटी की रक्षा करते हुए, अपने प्राण अर्पित किये थे। आक्रमणकारी सिद्दी जोहार को रोकने के लिए बहादुर बाजीप्रभु घोड़ घाटी में दीवार बनकर खड़े हो गये थे। अपने चुनिन्दा साथियों के साथ वह महायोद्धा अपने शत्रु से अन्तिम समय तक लड़ता रहा। शत्रु की सहायता के लिए दो बार सेना दस्ते आये किन्तु बाजीप्रभु अपनी जगह पर अडिग बना रहा। बाजी और उसका भाई फूलाजी दोनों अद्भुत पराक्रम से जूझते रहे। अन्त में जब शिवाजी महाराज के गढ़ में सुरक्षित पहुँचने की सूचना तोप की आवाज से मिली तब दोनों भाइयों ने अपने प्राण निछावर किये। वही ऐतिहासिक घोड़ घाटी अब पावनघाटी के नाम से जानी जाती है। वहीं करवी और करौंदे के जंगल में बाजी और फूलाजी की पत्थर की समाधियाँ बनाई गयी थीं। अट्ठाइस उन्तीस वर्ष पुरानी वह घटना शम्भूराजा के भीतर तरंगें उत्पन्न कर रही थी। उन प्रभु-देशपाण्डे बन्धुओं की समाधि पर पुष्प अर्पित करते हुए शम्भूराजा का मन भर आया। सूर्य पश्चिम की ओर झुकने लगा तब भरे मन से शम्भूराजा गढ़ की ओर लौटे। फिर गढ़ से उतरकर खाई को पार किया और चट्टान की चोटी पर चढ़ गये। उस ऊँचाई से आसपास की गहरी घाटियाँ दिखाई पड़ रही थीं। घाटियों में अँधेरा गहरा रहा था। शम्भूराजा की निगाह सामने के किले की ओर बरगद के पठार पर गयी। उस पठार की एक चट्टान नीचे की ओर झुकी थी। उसकी ओर शम्भूराजा ने 620 :: सम्भाजी