छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभी जमीन पर पहुँचने के पहले पेड़ों की टहनियों पर झूलती लटकती हैं। नीचे उतरने के लिए उनसे अनुमति माँगती हैं।" बोलते-बोलते शम्भूराजा रुक गये। उनकी नजरें चौकन्नी होकर देखने लगीं। उन्होंने हरकारे से केवल एक प्रश्न पूछा, "वह मुकर्रबखान कहाँ है?" "कोल्हापुर के पास केला के पठार पर। कहते हैं कि उसे अचानक ठंडे बुखार ने घेर लिया है। वह पिछले तीन दिनों से अपने डेरे से बाहर ही नहीं निकला। इसकी मेरे पास पक्की खबर है।" "और अपना मलकापुर का अश्वदल?" महाराज ने कवि कलश की ओर मुड़ते हुए पूछा। "महाराज! मलकापुर में केवल चार हजार घुड़सवार हैं। शेष छह हजार अश्वदल आंबा घाटी के मुहाने पर और विशालगढ़ के रास्ते पर तैनात हैं।" "कविराज!" महाराज ने आश्चर्यचकित होकर कहा। कवि कलश ने कहा, "हाँ, राजन! विशालगढ़ की ढलान उतरने मे पहले ही मैंने मलकापुर के लिए दूत भेज दिये थे। राजन! समय का कोई भरोसा नहीं होता। प्रतिकूल समय कहकर नहीं आता। एक बार हवा के साथ भले ही खिलवाड़ कर लें लेकिन समय के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।" महाराज ने अपने आस पास मौजूद सेना का अन्दाजा लगाया। समीप ही श्रृंगारपुर में पाँच हजार घोड़े तैयार खड़े थे। ऊपर प्रतीचगढ़ पर पाँच सौ सिपाहियों का दल था। निवरे के रास्ते ऊपर जाने वाले और आगे कराड़ की ढलान पर मालेघाट पर एक हजार सवारों का रात दिन सावधान पहरा था। यह मार्ग घनघोर और दुर्गम जंगल से होकर जाता था। इस ओर से किसी के प्रवेश करने की सम्भावना नहीं थी। दूसरी ओर गोवा मार्ग पर हातखंबे के पास दो हजार सिपाही पहरे पर तैनात थे। इसके अतिरिक्त जयगढ़ और नावड़ी बन्दरगाह पर भी पहरा बैठाया गया था। कुल मिलाकर थल अथवा जल मार्ग से किसी के भी संगमेश्वर पहुँचने की कोई सम्भावना नहीं थी। फिर भी वहाँ से शीघ्र निकलकर राजगढ़ की ओर बढ़ना महाराज को आवश्यक लग रहा था। बड़े उत्साह से विचार विमर्श चल रहा था। देखते देखते सूर्यास्त हो गया। संगमेश्वर के जंगल में अँधेरा गहराने लगा था। चर्चा के अधिकांश मुद्दे समाप्त हो चुके थे। शम्भू महाराज ने अपने सभी साथियों को पान सुपारी भेंट की। उन्होंने अपने महल से बाहर के अँधेरे की ओर देखा। हरी-भरी पर्वत-श्रेणियाँ अन्धकार के गहवर में डूब चुकी थीं। नारियल, सुपारी एवं अन्य वृक्षों से हवा के टकराने की ध्वनियाँ कानों में पड़ रही थीं। शम्भू महाराज ने बड़ी गम्भीर मुद्रा में सभी की ओर देखा। उन्होंने आशा भरे स्वर में पूछा, "दोस्तो! क्या आपको लगता सम्भाजी : 643