छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबड़े हुए थे। उसका स्मरण करके इल्या कहने लगा, "अपनी ही माई-मौसी के दूध से शम्भूराजा पले बढ़े हैं, आज हमने ही उनके गले पर छुरा मारा है।" बिरज्या रोते हुए कहने लगा, "मैंने भी अपनी माँ की गोद में यह गीत बहुत बार सुना है।" वह आँखें पोंछते हुए स्वयं गाने लगा— जब भी होंठ शम्भू के सूखे धाराऊ का दूध उमड़ता। निपट गरीबों की कुटिया में सुवन शिवाजी का है पलता।। आँसुओं की पहली बाढ़ सूख गयी। आठों लड़कों की कान की नमें गर्म हो गयीं। ऐसा लगा जैसे उनके शरीर में आग लग गयी है। उनके हाथों में मुरसुरी उठने लगी। सभी ने एक स्वर में पीर्या से पूछा, "बता दादा, हमें अब क्या करना होगा?" "अरे गधो पूछते क्या हो? भेड़ बकरियों के बीच घुस आये भेड़ियों पर टूट पड़ने वाले और जिन्दा भेड़ियों के जबड़े तोड़कर उन्हें मारने वाले गड़ेरियों की औलादें हैं हम। हमारी आँखों को चकमा देकर शैतान हमारे राजा को ले गया है, हम उसकी हड्डी पसली एक कर देंगे।" सभी एक स्वर में चिल्ला उठे, "चलो चलोऽऽ हम गणोजी के कर्मचारी पन्त को पहले समाप्त करेंगे।" "पन्त को किसलिए? जड़ को ही पहले समाप्त करेंगे। उस गणोजी शिर्के का ही गला घोटेंगे।" लड़के भूख-प्यास भूल गये। वे धरती पुत्र आठ बालक खाई, पहाड़, झरने, पेड़-पौधे पार करते हुए कराड़ की दिशा में दौड़ने लगे। उनके पैरों में दस हाथियों की शक्ति आ गयी थी। उनकी छाती धक धक कर रही थी। हृदय में प्रतिशोध की भावना भी धधक रही थी। शिवाजी और उनके पुत्र शम्भू महाराज को स्मरण करके सिर चकरा रहा था। रायगढ़ का वह राज्याभिषेक, वह राजा का उत्सव, जनता उल्लास, वे गालकियाँ, उनकी मज़ावट आदि इन लड़कों में से तीन-चार ने अपने पिता अथवा चाचा के कन्धे पर बैठकर स्वयं देखा था। इन लड़कों ने शम्भू महाराज का राज्याभिषेक स्वयं देखा था। गड़ेरियों ने अपना विशेष नृत्य गजनृत्य प्रस्तुत किया था। शिवाजी के राज्याभिषेक के समय इन लड़कों के पुरखों ने उल्लास से भाग लिया था। वे बड़े बड़े ढोल बजाते हुए नाचे-गाये थे। इनके चाचा मामाओं ने बचपन में शम्भूराजा को अपने कन्धे पर बिठाकर, श्रृंगारपुर के खेतों खलिहानों में घुमाया था। इन धरतीपुत्रों को जागीर का अर्थ नहीं मालूम था। उन्हें स्वार्थ की विषैली हवा नहीं छू सकी थी। उनके लिए शिवाजी और सम्भाजी प्राणों से भी बढ़कर थे। सूर्य और चाँद थे। वे मानते थे कि इन दो छत्रपतियों के कारण ही सिर की शिखा सम्भाजी : 675