छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 678, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुरक्षित थी। वे जागीरदारों और जमींदारों के शोषण से बचे हुए थे। सह्याद्रि के खाई-पठारों में गोकुल का सुख फैला था। उसी शिवपुत्र को आज शत्रु इसी रास्ते से निकालकर ले गया। जाने-अनजाने हमने भी शत्रुओं की सहायता की है। इसी एहसास से लड़कों का शरीर आग की तरह जल रहा था। बिना रुके और एक क्षण भी गँवाये, आठों लड़के रातभर दौड़ते रहे। उनकी कमर की करधनी में बँधे कोयले और छुरे सरसराते रहे। हाथ की मुट्ठियाँ भींचते अपने दाँतों को चबाते, हवा की पीठ पर सवार वे यही सोचते रहे कि कहाँ है वह गणोजी ? कराड़ की मुगल छावनी गहरी नींद में थी। बगल के कोयना नदी के पाट से ठंडी हवा आ रही थी। छावनी में केवल पहरेदार और चौकीदार जाग रहे थे। जगह-जगह मशालें जल रही थीं। जिस प्रकार बकरियों के झुंड में छिपकर बैठे भेड़िये को पकड़ने के लिए गड़ेरिये दबे पाँव चलते हैं वैसे ही ये लड़के दबे पाँव आगे बढ़े। एक पहरेदार ने उन्हें रोका और पूछा, "क्या रे, कहाँ चले ?" "जी हमें गणोजी शिर्के सरकार ने बुलाया है।" "कहाँ से आये हो ?" "आज शम्भूराजा का शिकार करने शिर्के सरकार आये थे। उन्हें राह दिखाने वाले हमी हैं।" इल्या ने कहा। पहरेदार थोड़ा-सा विचार में पड़ गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। इसी समय सामने की छोलदारी से एक सैनिक बाहर निकला। वह भी पिछले दिन सेना के साथ था। उसने लड़कों को देखा। उसने हँसते हुए पहरेदार से कहा, "अरे ले जाओ इनको गणोजी के पास, ये सब अपने ही छोकरे हैं।" छावनी में गहरा सन्नाटा था। मुकर्रब के साथ आये सात आठ सौ सैनिक बिल्कुल त्रस्त हो गये थे। उन्होंने अपने थके हाथ पैर धरती पर लम्बे कर दिये थे। दोनों पहरेदार एक तम्बू के पास रुके। उन्होंने अन्दर से बन्द किया गया कपड़े का दरवाजा लड़कों को दिखाया। देखते ही बच्चों ने नारा लगाया "बिरुबा की जयऽऽ, बिरुबा की जयऽऽ"। इसके साथ ही वे अपने साथ आये पहरेदारों पर झपट पड़े। उनके हाथों की मशालें अपने हाथों में ले लीं। मशालों की लपट से पहरेदारों की दाढ़ी के बाल जल गये। कहीं आँखों की पुतलियाँ भी न बाहर आ जायँ, इस भय से पहरेदार भाग खड़े हुए। लड़कों ने जलती मशालों को सामने के तम्बू से लगा दिया। देखते-देखते तम्बू धू धूकर जलने लगा। भीतर के सामान के साथ सारी कनातें जलने लगीं। भीतर घोड़ों के लिए रखा घास भी सुलगने लगी। धुएँ की धारा बाहर निकलने लगी। चारों ओर से एक ही आवाज आने लगी, 'भागोऽ भागो, आगऽ आगऽऽ' तम्बू के भीतर से 'या अल्लाऽऽ बचाओऽ बचाओऽऽ' जैसी करुण 676 सम्भाजी