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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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चीत्कार बाहर सुनाई देने लगी। इसके बाद आग से अपने को बचाते हुए कुछ लोग सामने के दरवाजे से बाहर निकलने लगे। तब तक लड़कों ने तम्बू में लगी मजबूत लाठियाँ अपने हाथों में ले लीं और सामने आने वाले लोगों को पीटने लगे। तम्बू में लगी आग से इन लड़कों के दिल में लगी प्रतिशोध की आग अधिक तेज थी। वे गला फाड़कर चिल्ला रहे थे, "आओ गणोजी शिर्के, बाहर आओ, हम तुम्हारी बोटी-बोटी कर देते हैं।" परन्तु इन बच्चों के आवेश से मुगलों की शक्ति बहुत अधिक थी। आसपास से पहरेदार और सैनिक सैकड़ों की संख्या में भागकर आगे आ गये। उन आठ जंगली पंछियों को कैद कर लिया गया। शीघ्र ही आग पर भी काबू पा लिया गया। अन्दर सोये अनेक लोगों ने आग को भड़कता देखकर दूसरी ओर नदी में छलाँग लगा दी थी। इस तरह अपनी जान बचाई थी। आग ने अपना प्रभाव तो छोड़ा ही था। वहाँ तीन शव कोयले की तरह काले होकर गिरे थे। काले-कलूटे, धुएँ से सने शव पहचान में नहीं आ रहे थे। उनके वस्त्र और सिर के बाल जलकर खाक हो गये थे। उनकी आँखों की पुतलियाँ बाहर आ गयी थीं। शवों की खाल जगह-जगह झूल रही थी। मुसलमान सैनिक धीरे धीरे आपस में बात कर रहे थे, "एक गणोजी होगा, दूसरा नागोजी। परन्तु यह तीसरा फौजी कौन हो सकता है?" आग और दंगा दोनों शान्त हो गये। किन्तु मुकर्रब के तम्बू मे कोई जागा नहीं। इतना दंगा-फसाद और शोरगुल होने पर भी अनेक दिन थके मुकर्रब को जगाने का साहस थानेदार को नहीं हो पाया। दूसरे दिन दोपहर को मुकर्रबखान अपने तम्बू से बाहर आया। वह सामने की चारपाई पर बैठकर अँगड़ाइयाँ ले रहा था। उन आठ जंगली पंछियों को खान के तम्बू के बाहर मुस्कें बाँधकर खड़ा किया गया था। आग लगाने का दंड देने के लिए उन्हें चाबुक से पीटा गया था। पीटे जाने के कारण लड़कों के मुँह सूज गये थे। उनका शरीर जगह-जगह फट गया था। फिर भी वे सभी निडर भाव से सीना ताने मुकर्रब की ओर देख रहे थे। मुकर्रब ने पूरी घटना का ब्यौरा लिया। गणोजी और नागोजी के जलकर खाक होने की बात उसे बताई गयी। उस ओर ध्यान न देते हुए उसने तत्काल थानेदार से पूछा, "सम्भा कहाँ है?" राजबन्दी सुरक्षित हैं, यह जानते ही मुकर्रब शान्त हो गया। इसी बीच एक कनात के पीछे से गणोजी और नागोजी जल्दी-जल्दी आते हुए दिखाई पड़े। उनकी ओर देखते हुए मुकर्रब हँसकर बोला, "गणोजी, मैंने तो सुना आप जल चुके हैं।" गणोजी अपने गालों में हँसते हुए बोला, "खान साहब! सम्भाजी :: 677