छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसहित सारा परिवार हतवाक हो उठा। सभी ने महाराज की ओर क्रोध से देखा। किन्तु महाराज की विषादग्रस्त मुद्रा सभी के लिए असह्य हो उठी। अपशकुन की कल्पना मात्र से जीजा माता के पैर के नीचे की जमीन खिसक गयी। वे 'शम्भू बेटाऽऽऽ' कहते हुए दहाड़ मारकर चिल्लायीं। यह देखते ही पूरा अन्तःपुर चीख- चिल्लाहट से भर गया। छोटी येसू पूरी तरह हड़बड़ा गयी। उसका शिशुमन कुछ समझ नहीं पा रहा था। दोपहर में उसकी सहेलियों ने उससे कहा, "येसू तू बड़ा अभागी है। आगरा के रास्ते में एक घने जंगल में शम्भुराजा घोड़े से गिर पड़े और उनका देहान्त हो गया।" औरंगजेब के क्रूर चंगुल से छूटकर महाराज वापस आये। इसलिए उनसे मिलने के लिए झुंड-के झुंड लोग राजगढ़ की ओर आ रहे थे। किन्तु शम्भुराजा के देहान्त की खबर सुनते ही दुःख विकल हो जाते थे। जीजा माता से लिपटकर सोयराबाई दहाड़ें मार कर रो रही थीं। उस समय तक उन्हें अपना पुत्र प्राप्त नहीं हुआ था। शम्भुराजा को ही अपना पुत्र मानकर उन्होंने आँखों की पुतली की तरह पाला था। उनके दुःखों का कोई आर पार नहीं था। पूरे राजगढ़ पर शोक छा गया था। इस कल्पना से ही जनता को रोना आ जाता था कि शिवाजी महाराज के सफेद घोड़े पर अनेक बार घूमने वाला रोबीला, स्फटिक सा गौरांग जितना सुन्दर उतना ही निर्भीक दिखने वाला शम्भू अब कभी नहीं दिखेगा। महाराज ने शम्भुराजा के क्रिया कर्म की तैयारी की। जोधपुर, जयपुर से लेकर दक्षिण में जिंजी तक के सभी राजाओं ने शिवाजी महाराज को शोकपत्र भेजे। अन्तिम संस्कार से सम्बन्धित सारे अनुष्ठान हो रहे थे। महाराज ने हजार ब्राह्मणों को भोजन कराया, साधु सन्तों और भिखारियों को दान दिया। येसू दुख से मुरझा गयी। पाठशाला का सहपाठी मित्र, खेल का सहयोगी और जिसे उसका पति कहकर सारी सहेलियाँ उसे चिढ़ाती थीं, वह प्यारा शम्भुराजा अब कभी नहीं मिलेगा, यह सोचकर येसू बहुत उदास हो गयी! एक शाम को जीजा माता के गले लगकर येसू बोली, "दादीजी मुझे सती होना है।" सती का अर्थ, उसका दाह, उसकी पीड़ा आदि येसू को कुछ भी ज्ञात न था। किन्तु येसू के भीतर एक पवित्र भाव था। येसू ने सुना था कि मृत पति के मोक्ष के लिए, उसके सम्मान में जलती चिता में स्वयं को जला देना, स्वयं का बलिदान कर देना बहुत पवित्र कार्य है। प्रथा के अनुसार छोटी उम्र की कोई बच्ची सती होने का निर्णय ले तो परिवार वालों के विरोध का कोई कारण ही नहीं था। इसके विपरीत ससुराल और मायके के लोग ऐसी लड़की को जबरदस्ती चिता में फेंक देते थे। 66 :: सम्भाजी