छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंआधी अधूरी जली हुई स्त्री यदि चिता से बाहर आने का प्रयत्न करती थी तो उसके सम्बन्धी अमानवीय ढंग से भाले की नोक से छेदते हुए वापस चिता में ढकेल देते थे। येसू के निर्णय का मायके के शिर्के परिवार ने कोई विरोध नहीं प्रकट किया था। येसू के इस निर्णय से शिवाजी महाराज बहुत विचलित हो गये थे। उनकी आँखों में आँसू छलकने लगे। उसे अपनी बाँहों में लेकर, अपनी सगी बेटी की तरह से चूमते हुए बोले, “चिन्ता मत कर बेटी, भगवान तेरा भला करेगा।” सूखे पत्तों की तरह दिन उड़े जा रहे थे। किले पर घूमते हुए सफेद बादलों को उड़ते हुए देखकर येसू का कलेजा फटने लगता था। इसलिए वह सफेद कपड़ों में सारा समय मन्दिर में ही बिताती थी। वह दुखी और उदास बहुत समय तक मन्दिर में बैठी रहती थी। शिवाजी महाराज को आगरा से राजगढ़ आये दो महीने आठ दिन बीत चुके थे। येसू मन्दिर के अँधेरे में बैठी थी। अचानक जोर-जोर की आवाजें आने लगीं। ऐसा लगा जैसे बिजली की कड़कन से आसमान फटा जा रहा हो। एक के बाद एक तोपें भड़कने लगीं। येसू डर गयी उसका कलेजा पानी पानी होने लगा। अपनी जगह से हिलने तक का साहस उसे नहीं हुआ। उसे लगा कुछ धोखा हो गया है, स्वराज्य के सभी शत्रुओं ने एक साथ मिलकर राजधानी पर आक्रमण कर दिया है, परन्तु तोपों के साथ ही तुरही और शहनाई जैसे मंगलवाद्य भी बजने लगे तो येसू और भी भ्रमित होने लगी। इतने में येसू को ढूँढ़ते हुए सोयराबाई दौड़ते हुए आती दिखाई दीं। उनके हाथ में शक्कर की थाली थी। चेहरे पर हँसी की लहरें दौड़ रही थीं। आगे बढ़कर उन्होंने येसू को प्रसन्नतापूर्वक बाँहों में भर लिया। उसे बार बार चूमते हुए सोयराबाई चिल्लायीं- "येसू अपना शम्भूराजा आ गया रे। अपना राजा बेटा सकुशल आ गया।" आनन्द का यह झोंका इतना तीव्र था कि येसू टिक नहीं पायी। वह मूर्छित होकर अपनी जगह पर ही गिर पड़ी। मथुरा से विसाजी पन्त, काशी पन्त और कृष्णाजी पन्त ये त्रिमल बन्धु अपने जान की बाजी लगाकर, कदम-कदम पर संकटों का सामना करते हुए शम्भूराजा को लेकर राजगढ़ आये थे। उनके साथ बीस वर्ष उम्र के कवि कलश भी थे। इन लोगों के सम्मान में महाराज ने खास दरबार बुलाया, अपने साथ बिठाकर भोजन कराया। महाराज के सम्मान से तीनों धन्य हो गये। त्रिमल बन्धुओं के सम्मान में खास दरबार बुलाकर महाराज ने उन्हें 'विश्वासराव' की उपाधि प्रदान की। उन तीनों में से प्रत्येक को हाथी, पालकी और मूल्यवान वस्त्र देकर सम्मानित किया। ग.ध्वज 67