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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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दरबार समाप्त होने पर महाराज ने तीनों बन्धुओं को अपने निजी महल में बुलाया। सम्मानपूर्वक अपने साथ बिठाकर उन्हें भोजन कराया। उस सम्मान से तीनों धन्य हो गये। भोजन के बाद यात्रा वृतान्त आरम्भ हुआ। यहाँ पर शम्भूराजा जीजा माता की गोद में चिपके बैठे थे तो येसूबाई सोयराबाई की बाँहों में समाई थीं। विमाजी पन्त ने कहना आरम्भ किया- "महाराज, यात्रा में हमने अनेक बार युवराज को धोती और जनेऊ पहनाकर ब्राह्मण बालक बना दिया था। उनके सिर के लम्बे बाल और भोली भाली आँखों को देखने से वे हमारे भांजे ही तो लगते थे।" "किन्तु महाराज आप और छोटे राजा आगरा से भागकर निकल गये हैं, यह खबर हवा की तरह चारों ओर फैल गयी थी। उसके कारण गश्त में जगह जगह पर बादशाह के सिपाहियों और थानेदारों से हमें बहुत परेशानी हुई। उन्हें बहुत धन देना पड़ता था। इसलिए हमने एक योजना बनायी।" बीच में ही कृष्णाजी खिलखिलाकर हँस पड़े साथ में तीनों भाई हँसने लगे परन्तु शम्भूराजा शर्म से पानी पानी हो गये। काशीपन्त ने कहा, "शम्भूराजा का बहुत ही गोरा रंग, तेजस्वी मुखमुद्रा और मूर्ति जैसा सुगठित शरीर देखकर लोगों का शक बढ़ने लगा तो आने वाली कठिनाइयों से बचने के लिए हमने युवराज को साड़ी पहना दी गले में जेवर पहना दिये आँखों में काजल डाल दिया। पूरी यात्रा में सभी उन्हें हमारी दासी समझते रहे। खास महल हँसी की लहरों से गूँज उठा, युवराज के स्त्री वेष की कल्पना करके येसू बहुत हँसी। इस कल्पना से उसका भरपूर मनोरंजन हुआ। त्रिमल बन्धु चल गये। कवि कलश के साथ शम्भूराजा की आगरा में ही मित्रता हो गयी थी। वे दोनों साथ में बाहर निकले तो रानियाँ शिवाजी महाराज पर टूट पडीं। युवराज के जीवित रहते हुए महाराज ने उनका अन्तिम संस्कार किया यह सोचकर सोयराबाई क्रोध से काँपने लगी। जीजा माता की आँख से आँख मिलाने का साहस महाराज को नहीं हो रहा है। अपना सिर नीचे झुकाकर महाराज बोले "माताजी, हम और कर ही क्या सकते थे? वह औरंगजेब तो पूरा पशु है। उसने अपने तीनों भाइयों को धोखा देकर मार डाला।" "तो क्या जीते जी उसका अन्तिम संस्कार करना चाहिए था?" "माता जी ! हम इतने कठोर न बनते तो सचमुच में बेटे के अन्तिम संस्कार करने का दुर्भाग्य हमें प्राप्त होता।" इस संकट की कल्पना करके जीजा माता काँप उठीं। उन्होंने शम्भूराजा को अपने पास बुलाया और सीने से उन्हें लगा लिया। परन्तु उसी क्षण उनका ध्यान फिर ६४ संभाजी

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