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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

सहित सारा परिवार हतवाक हो उठा। सभी ने महाराज की ओर क्रोध से देखा। किन्तु महाराज की विषादग्रस्त मुद्रा सभी के लिए असह्य हो उठी। अपशकुन की कल्पना मात्र से जीजा माता के पैर के नीचे की जमीन खिसक गयी। वे 'शम्भू बेटाऽऽऽ' कहते हुए दहाड़ मारकर चिल्लायीं। यह देखते ही पूरा अन्तःपुर चीख- चिल्लाहट से भर गया। छोटी येसू पूरी तरह हड़बड़ा गयी। उसका शिशुमन कुछ समझ नहीं पा रहा था। दोपहर में उसकी सहेलियों ने उससे कहा, "येसू तू बड़ा अभागी है। आगरा के रास्ते में एक घने जंगल में शम्भुराजा घोड़े से गिर पड़े और उनका देहान्त हो गया।" औरंगजेब के क्रूर चंगुल से छूटकर महाराज वापस आये। इसलिए उनसे मिलने के लिए झुंड-के झुंड लोग राजगढ़ की ओर आ रहे थे। किन्तु शम्भुराजा के देहान्त की खबर सुनते ही दुःख विकल हो जाते थे। जीजा माता से लिपटकर सोयराबाई दहाड़ें मार कर रो रही थीं। उस समय तक उन्हें अपना पुत्र प्राप्त नहीं हुआ था। शम्भुराजा को ही अपना पुत्र मानकर उन्होंने आँखों की पुतली की तरह पाला था। उनके दुःखों का कोई आर पार नहीं था। पूरे राजगढ़ पर शोक छा गया था। इस कल्पना से ही जनता को रोना आ जाता था कि शिवाजी महाराज के सफेद घोड़े पर अनेक बार घूमने वाला रोबीला, स्फटिक सा गौरांग जितना सुन्दर उतना ही निर्भीक दिखने वाला शम्भू अब कभी नहीं दिखेगा। महाराज ने शम्भुराजा के क्रिया कर्म की तैयारी की। जोधपुर, जयपुर से लेकर दक्षिण में जिंजी तक के सभी राजाओं ने शिवाजी महाराज को शोकपत्र भेजे। अन्तिम संस्कार से सम्बन्धित सारे अनुष्ठान हो रहे थे। महाराज ने हजार ब्राह्मणों को भोजन कराया, साधु सन्तों और भिखारियों को दान दिया। येसू दुख से मुरझा गयी। पाठशाला का सहपाठी मित्र, खेल का सहयोगी और जिसे उसका पति कहकर सारी सहेलियाँ उसे चिढ़ाती थीं, वह प्यारा शम्भुराजा अब कभी नहीं मिलेगा, यह सोचकर येसू बहुत उदास हो गयी! एक शाम को जीजा माता के गले लगकर येसू बोली, "दादीजी मुझे सती होना है।" सती का अर्थ, उसका दाह, उसकी पीड़ा आदि येसू को कुछ भी ज्ञात न था। किन्तु येसू के भीतर एक पवित्र भाव था। येसू ने सुना था कि मृत पति के मोक्ष के लिए, उसके सम्मान में जलती चिता में स्वयं को जला देना, स्वयं का बलिदान कर देना बहुत पवित्र कार्य है। प्रथा के अनुसार छोटी उम्र की कोई बच्ची सती होने का निर्णय ले तो परिवार वालों के विरोध का कोई कारण ही नहीं था। इसके विपरीत ससुराल और मायके के लोग ऐसी लड़की को जबरदस्ती चिता में फेंक देते थे। 66 :: सम्भाजी

आधी अधूरी जली हुई स्त्री यदि चिता से बाहर आने का प्रयत्न करती थी तो उसके सम्बन्धी अमानवीय ढंग से भाले की नोक से छेदते हुए वापस चिता में ढकेल देते थे। येसू के निर्णय का मायके के शिर्के परिवार ने कोई विरोध नहीं प्रकट किया था। येसू के इस निर्णय से शिवाजी महाराज बहुत विचलित हो गये थे। उनकी आँखों में आँसू छलकने लगे। उसे अपनी बाँहों में लेकर, अपनी सगी बेटी की तरह से चूमते हुए बोले, “चिन्ता मत कर बेटी, भगवान तेरा भला करेगा।” सूखे पत्तों की तरह दिन उड़े जा रहे थे। किले पर घूमते हुए सफेद बादलों को उड़ते हुए देखकर येसू का कलेजा फटने लगता था। इसलिए वह सफेद कपड़ों में सारा समय मन्दिर में ही बिताती थी। वह दुखी और उदास बहुत समय तक मन्दिर में बैठी रहती थी। शिवाजी महाराज को आगरा से राजगढ़ आये दो महीने आठ दिन बीत चुके थे। येसू मन्दिर के अँधेरे में बैठी थी। अचानक जोर-जोर की आवाजें आने लगीं। ऐसा लगा जैसे बिजली की कड़कन से आसमान फटा जा रहा हो। एक के बाद एक तोपें भड़कने लगीं। येसू डर गयी उसका कलेजा पानी पानी होने लगा। अपनी जगह से हिलने तक का साहस उसे नहीं हुआ। उसे लगा कुछ धोखा हो गया है, स्वराज्य के सभी शत्रुओं ने एक साथ मिलकर राजधानी पर आक्रमण कर दिया है, परन्तु तोपों के साथ ही तुरही और शहनाई जैसे मंगलवाद्य भी बजने लगे तो येसू और भी भ्रमित होने लगी। इतने में येसू को ढूँढ़ते हुए सोयराबाई दौड़ते हुए आती दिखाई दीं। उनके हाथ में शक्कर की थाली थी। चेहरे पर हँसी की लहरें दौड़ रही थीं। आगे बढ़कर उन्होंने येसू को प्रसन्नतापूर्वक बाँहों में भर लिया। उसे बार बार चूमते हुए सोयराबाई चिल्लायीं- "येसू अपना शम्भूराजा आ गया रे। अपना राजा बेटा सकुशल आ गया।" आनन्द का यह झोंका इतना तीव्र था कि येसू टिक नहीं पायी। वह मूर्छित होकर अपनी जगह पर ही गिर पड़ी। मथुरा से विसाजी पन्त, काशी पन्त और कृष्णाजी पन्त ये त्रिमल बन्धु अपने जान की बाजी लगाकर, कदम-कदम पर संकटों का सामना करते हुए शम्भूराजा को लेकर राजगढ़ आये थे। उनके साथ बीस वर्ष उम्र के कवि कलश भी थे। इन लोगों के सम्मान में महाराज ने खास दरबार बुलाया, अपने साथ बिठाकर भोजन कराया। महाराज के सम्मान से तीनों धन्य हो गये। त्रिमल बन्धुओं के सम्मान में खास दरबार बुलाकर महाराज ने उन्हें 'विश्वासराव' की उपाधि प्रदान की। उन तीनों में से प्रत्येक को हाथी, पालकी और मूल्यवान वस्त्र देकर सम्मानित किया। ग.ध्वज 67

दरबार समाप्त होने पर महाराज ने तीनों बन्धुओं को अपने निजी महल में बुलाया। सम्मानपूर्वक अपने साथ बिठाकर उन्हें भोजन कराया। उस सम्मान से तीनों धन्य हो गये। भोजन के बाद यात्रा वृतान्त आरम्भ हुआ। यहाँ पर शम्भूराजा जीजा माता की गोद में चिपके बैठे थे तो येसूबाई सोयराबाई की बाँहों में समाई थीं। विमाजी पन्त ने कहना आरम्भ किया- "महाराज, यात्रा में हमने अनेक बार युवराज को धोती और जनेऊ पहनाकर ब्राह्मण बालक बना दिया था। उनके सिर के लम्बे बाल और भोली भाली आँखों को देखने से वे हमारे भांजे ही तो लगते थे।" "किन्तु महाराज आप और छोटे राजा आगरा से भागकर निकल गये हैं, यह खबर हवा की तरह चारों ओर फैल गयी थी। उसके कारण गश्त में जगह जगह पर बादशाह के सिपाहियों और थानेदारों से हमें बहुत परेशानी हुई। उन्हें बहुत धन देना पड़ता था। इसलिए हमने एक योजना बनायी।" बीच में ही कृष्णाजी खिलखिलाकर हँस पड़े साथ में तीनों भाई हँसने लगे परन्तु शम्भूराजा शर्म से पानी पानी हो गये। काशीपन्त ने कहा, "शम्भूराजा का बहुत ही गोरा रंग, तेजस्वी मुखमुद्रा और मूर्ति जैसा सुगठित शरीर देखकर लोगों का शक बढ़ने लगा तो आने वाली कठिनाइयों से बचने के लिए हमने युवराज को साड़ी पहना दी गले में जेवर पहना दिये आँखों में काजल डाल दिया। पूरी यात्रा में सभी उन्हें हमारी दासी समझते रहे। खास महल हँसी की लहरों से गूँज उठा, युवराज के स्त्री वेष की कल्पना करके येसू बहुत हँसी। इस कल्पना से उसका भरपूर मनोरंजन हुआ। त्रिमल बन्धु चल गये। कवि कलश के साथ शम्भूराजा की आगरा में ही मित्रता हो गयी थी। वे दोनों साथ में बाहर निकले तो रानियाँ शिवाजी महाराज पर टूट पडीं। युवराज के जीवित रहते हुए महाराज ने उनका अन्तिम संस्कार किया यह सोचकर सोयराबाई क्रोध से काँपने लगी। जीजा माता की आँख से आँख मिलाने का साहस महाराज को नहीं हो रहा है। अपना सिर नीचे झुकाकर महाराज बोले "माताजी, हम और कर ही क्या सकते थे? वह औरंगजेब तो पूरा पशु है। उसने अपने तीनों भाइयों को धोखा देकर मार डाला।" "तो क्या जीते जी उसका अन्तिम संस्कार करना चाहिए था?" "माता जी ! हम इतने कठोर न बनते तो सचमुच में बेटे के अन्तिम संस्कार करने का दुर्भाग्य हमें प्राप्त होता।" इस संकट की कल्पना करके जीजा माता काँप उठीं। उन्होंने शम्भूराजा को अपने पास बुलाया और सीने से उन्हें लगा लिया। परन्तु उसी क्षण उनका ध्यान फिर ६४ संभाजी

शब्दों में महाराज को चेतावनी दी—"शिवबा ! इस तरह का अपराध भविष्य में कभी मत करना। आप राजनीति करते हैं और हमारी जान निकल जाती है।" दो शृंगारपुर की मूसलाधार बारिश ऐसी थी कि चार हाथ की दूरी पर खड़ा व्यक्ति खुली आँखों से दिखाई नहीं देता था। एक बार वर्षा जंगल, पेड़, साग परिसर धोकर चली जाती थी, फिर घने कुहरे के पीछे खड़ा प्रचितगढ़ दुर्गम पहाड़ दिखाई देता था। ऊँचे पहाड़ से निकलकर नीचे की ओर घोड़े की तरह छलाँग लगाती तेज गति से बहती शास्त्री नदी, आसपास के झरने, बड़े-बड़े जल प्रपात और बहते हुए पानी का कल-कल छल-छल संगीत आदि से समृद्ध विलक्षण निसर्ग शोभा युवराज पर जादू का प्रभाव डालती थी, वे धन्य हो जाते थे। वर्ष में एक बार गौरी पूजा के त्योहार में मायके आयीं लड़कियों की तरह वर्षा की धाराएं चार महीने ऊधम मचाती रहती थीं। काव्यानन्द के नशे से दिमागी प्यास बुझ जाती थी। किन्तु शरीर में दौड़ने वाले पौरुषेय लहू का क्या करते। शम्भूराजा और कवि कलश में विचार विमर्श हुआ। व्यायाम के लिए पाँच बड़ी व्यायाम-शालाओं को निर्मित करने का निर्णय लिया गया। शम्भूराजा के शृंगारपुर आने का समाचार पूरे प्रभावली क्षेत्र में फैल गया था। इसलिए बहुत से तरुण युवक रोज़ ही उनके आसपास इकट्ठे होने लगे। दाभोल और राजापुर के बन्दरगाह से आने वाले फिरंगियों को नया समाचार मिल रहा था। वहाँ सात समुद्र पार राज्य की सेना पूरे बारह महीने तैयार रहती है। मराठा सैनिकों की तरह बारिश में चावल की खेती और ग्रीष्म तथा शीत में तलवार चलाने का काम नहीं करते थे। वहाँ के सैनिक सेना के लिए ही समर्पित रहते थे। सभी की अनुमति से निर्णय ले लिया गया। चेऊल, दाभोल और राजापुर बन्दरगाहों से मजबूत पीठ और अच्छी नस्लवाले हट्टे-कट्टे घोड़े खरीदे जाएँ और प्रभावली में स्वस्थ और साहसी जवानों को चुनकर कम से कम दो हजार सैनिकों का अश्वदल बनाया जाय। इस निर्णय पर सरदार विश्वनाथ ने पूछा, "युवराज ! शृंगारपुर में आपकी सेवा के लिए पाँच हजार की फौज के होते हुए यह अतिरिक्त सेना किसलिए?" सम्भाजी : 69

"हमारी यह नयी घुड़सवार सेना बहुत बहादुर होगी। हम इस विश्वास से इसका गठन करेंगे कि भविष्य में जहाँ भी ये घोड़े दौड़ लगाएँगे वहाँ श्रृंगारपुरी अश्वदल के नाम से पहचाने जाएँगे।" निर्णय के अनुसार योजना कार्यान्वित हो रही थी। अच्छे अच्छे नये घोड़े खरीदे गये। शम्भूराजा ने साधारण कुनबी बारा, बलूतेदार और अन्य समुदायों से परिश्रमी बहादुर युवकों को अपने आसपास इकट्ठा किया था। युवराज की सेना में युद्ध करने का अवसर मिलेगा यह सोचकर वहाँ के जवान बड़े उत्साह के साथ आगे आये। घुड़सवारों की नयी फौज तैयार होने लगी। दूर दूर की दौड़ आरम्भ हो गयी। सामने प्रतिचगढ़ की सीधी चढ़ाई बहुत कठिन थी। फिर भी ये जवान बड़े उत्साह से उस सीधी चढ़ाई पर दौड़ाते थे उस दुर्गम रास्ते पर चलते हुए घोड़े झुक जाते थे पसीने पसीने हो जाते थे। शम्भूराजा और कविराज कलश के अनुमान के अनुसार ही घटित हुआ। एक दिन रायगढ़ का सन्देश लेकर सरदार विश्वनाथ सामने उपस्थित हुए और दबी जबान में बोले—"युवराज राहूजी सोमनाथ का सन्देश आया है। उन्हें आपसे एक छोटा सा स्पष्टीकरण चाहिए।" "किस बात का?" "बड़े महाराज कर्नाटक में हैं। उनकी या राजगढ़ दरबार की अनुमति लिए बिना आप नयी सेना का गठन कैसे कर सकते हैं?" "क्यों नहीं कर सकते?" कवि कलश ने कहा। "कविराज, आप बीच में न बोलें।" "क्यों नहीं? हमारी ओर से वे ही बोलेंगे। वे हमारे गुरुबन्धु हैं, हमारे मन्त्री हैं।" युवराज ने कहा। विश्वनाथ का दर्प कुछ टूटा। कविराज ने कहा—"सरदार विश्वनाथ जी, आप बेहिचक रायगढ़ पर हमारा उत्तर पहुँचा दें। उनसे कह दें—'बड़े राजा ने राज्याभिषेक समारोह में शम्भूराजा को युवराज घोषित किया है। धर्म, परम्परा और प्रथा के अनुसार अष्टप्रधानों जितना ही उनका भी अधिकार है। अपने राज्य के हित में वे कोई भी निर्णय ले सकते हैं'।" सरदार विश्वनाथ ने सिर नीचे झुका लिया। वे जाने लगे तो युवराज ने उनके समीप जाकर कोमल वाणी में पूछा—"विश्वनाथ काका, इन कारकूनों के छल- कपट को क्या कहा जाए? इस प्रकार बार बार अपमानित करके ये लोग जानबूझकर मुझको क्यों सताते हैं? उनसे कहना कि यहाँ हमने अखाड़े शुरू किये हैं जनानखाने नहीं।" 70 :: सम्भाजी

तीन प्रतिचगढ़ की चोटी पर कौओं की आँखों की तरह गहरे और साफ-सुथरे अनेक जलाशय थे। इस जल से प्यास को तृप्ति मिलती थी। सह्याद्रि की चोटी से युवराज की दृष्टि कभी कभी वारणा प्रदेश की ओर दौड़ जाती थी। उसी ओर कुछ दूरी पर पन्हालागढ़ था, उसी गढ़ की दिशा में आगे बीजापुर की ओर का कर्नाटक और तमिल प्रदेश है। वहीं पर युवराज की जिन्दगी का सर्वस्व, सत्य, शिव और सुन्दर सब कुछ अर्थात् शिवाजी महाराज थे। उनके मन्त्रपूत चरणों पर युवराज की दृष्टि सदैव टिकी रहती थी। हृदय धड़कता रहता था। शाम के समय वन चरकर लौटती गाय के लिए जैसे बछड़ा अधीर होने लगता है, पक्षियों से मिलने के लिए उनके शावकों को विकलता होती है, अपने प्रेमी को मिलने के लिए प्रेमिका पागल हो जाती है, उसी उत्सुकता, लगन और अभिलाषा से संभाजी अपने पिता की प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रृंगारपुर में ही येसूबाई के पाँव भारी हो गये थे। पेट में शिशु बड़ा हो रहा था। शयनकक्ष में येसू के पेट पर अपनी कोमल उँगलियाँ फेरते हुए युवराज पूछते थे—"येसू! हम पिताजी से कब मिलेंगे?" "आप जब कहेंगे तब।" "नहीं। ऐसे खाली हाथ नहीं जाएँगे। अब तो हाथ में बाल राजा को लेकर ही जाएँगे तभी रायगढ़ पर पिताजी और जगदीश्वर का दर्शन करेंगे।" श्रृंगारपुर का सम्पूर्ण परिसर वनदेवता की अद्भुत देन प्रकृति का असीम आशीर्वाद है। यहाँ पर आषाढ़ की तेज वर्षा कुछ समय के लिए रुकी हुई थी। भाँग पिये हुए घोड़ों की तरह प्रतिचगढ़ के कन्धों से नीचे के ओर भागने वाले बड़े बड़े झरने मनुष्यों को उतरने का रास्ता देने लगे थे। कुछ दिनों से घने बादलों में दबी सूरज की किरणें धरती पर उतरने लगी थीं। श्रावण महीने में घड़ी-दो घड़ी के अन्तराल से हल्की बौछारें आती थीं और तितलियों के झुंड की तरह चली भी जाती थीं। श्रृंगारपुर के मैदान पर धूप हिरन के बच्चे की तरह नाच रही थी। पानी से लबालब भरे धान के खेत सन्तुष्ट दिखने लगे थे। कवि कलश शम्भूराजा के मित्र, गुरु, दीवान और दीवाने सब कुछ थे। संभाजी के हृदय और दरबार में उनका विशिष्ट स्थान था। एक परकीय व्यक्ति का प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ते इतनी ऊँचाई पर पहुँच जाना बहुत लोगों से देखा नहीं जा सम्भाजी :: 71

रहा था। कवि कलश इस स्थिति को भली भाँति जानते थे। इसलिए फूँक फूँक कर कदम रखते थे। वे सभी से अलग रहना पसन्द करते थे। संभाजी राजा के दरबार में कवि कलश का सम्मान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था इसलिए दरबार के बहुत से महत्त्वाकांक्षी और नये लोग कवि कलश से ईर्ष्या करने लगे थे। कवि कलश ने अपने जीवन में शम्भूराजा का नाम जब पहली बार सुना तो उस समय उनकी उम्र बीस वर्ष थी। किन्तु उसी छोटी उम्र में उन्होंने ब्रजभाषा और संस्कृत का इतना गहन अध्ययन कर लिया था कि दोनों भाषायें उनकी आज्ञाकारी दासियाँ बन गयी थीं। वे इस उम्र में ही ब्रजभाषा के एक प्रतिष्ठित कवि बन चुके थे। उनका ननिहाल मथुरा में था। अपनी छोटी उम्र में ही कवि कलश ने मथुरा, प्रयाग, बनारस जैसे स्थानों पर वरिष्ठों के सम्मेलन में भाग लिया था। अनेक प्राचीन और समकालीन कवियों की श्रेष्ठ कविताएँ और लोकगीत उन्हें कण्ठस्थ थे। देखते देखते वे ब्रजभाषा के एक श्रेष्ठ कवि ही नहीं बल्कि कवियों की सभा के कलश बन गये। इसी आधार पर इन्हें 'कवि कलश' नाम दिया गया। प्रयाग के मुरलीधर शास्त्री का पुत्र उमाजी पंडित ही कवि कलश के रूप जाना गया। मुरलीधर शास्त्री बिंबाजी भोसले के समय से भोसले परिवार के प्रयाग के पंडित थे। कवि भूषण के बाद उत्तर भारत में शिवाजी महाराज की खुलकर प्रशंसा करने वाले दूसरे विद्वान पंडित थे। इसी अपराध के लिए उन्हें एक बार इलाहाबाद की मुगल कोतवाली पर तलब किया गया था। उन्हें चेतावनी भी दी गयी थी। एक दिन कवि कलश नित्य की भाँति भोर के समय संगम पर स्नान के लिए गये थे। स्नान करके गीले वस्त्रों में ही घर लौटे। उस समय उनके पिता मुरली धर शास्त्री तुलसी के पास खड़े बड़ी व्यग्रता से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। कवि कलश के आते ही उन्होंने अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ बन्द कर लीं। वे गम्भीर किन्तु धीमी आवाज में बोले— “चल जल्दी कर। एक क्षण भी बिना नष्ट किये घोड़े को बाहर निकाल।” “बाबा! इतनी शीघ्रता क्यों?” “रायगढ़ से सन्देश आया है। शिवाजी महाराज अपने पुत्र शम्भूराजा के साथ कुछ ही दिनों में आगरे पहुँचने वाले हैं। औरंगजेब की काली करतूतों का महाराज को कोई भरोसा नहीं है। इसलिए भोसले खानदान के साथ विश्वसनीय व्यवहार रखने वाले तीन चार परिवारों के श्रेष्ठ लोगों को उन्होंने उत्तर भारत में आगरे बुलाया है। ऐसी कठिन परिस्थिति में वस्तुतः मुझे ही जाना चाहिए किन्तु इस वृद्धावस्था में यात्रा का कष्ट मैं झेल नहीं पाऊँगा।” कवि कलश ने तत्काल यात्रा के लिए आवश्यक अल्पतम सामग्री एक गठरी 72 सम्भाजी

में बाँधी। पानी पीने के लिए एक ढक्कन वाला कलश लिया। मुरलीधर शास्त्री पुत्र को विदा करते समय भाव विभोर होकर बोले, "अपने परिवार पर वर्षों से पंडित होने के नाते भोसले परिवार का बहुत विश्वास है। इसलिए शिवाजी महाराज और शम्भुराजा की सेवा का जो भी काम मिले उसे मन लगाकर करना। आज शत्रुओं के आक्रमण से पीड़ित भारत के तैंतीस कोटि देवी देवता शिवाजी महाराज की ओर बड़ी आशा से देख रहे हैं।" अपने पिता के आदेश को शिरोधार्य कर कवि कलश ने आगरा के लिए प्रस्थान किया। वह शिवाजी महाराज की सेवा में प्रस्तुत हुआ। एक दिन भगवान की पूजा करते समय कवि कलश के मुख से महाराज ने शुद्ध संस्कृत पाठ सुना और उसी समय उन्हें संभाजी राजा की सेवा में नियुक्त कर दिया। कवि कलश शम्भुराजा से उम्र में लगभग दस वर्ष बड़े थे। श्रृंगारपुर के उमाजी पंडित ने शम्भुराजा के मन में संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम उत्पन्न कर दिया था। किन्तु कवि कलश की सुमधुर आवाज में संस्कृत और ब्रजभाषा की काव्य पंक्तियों को सुनकर युवराज विभोर हो जाते थे। आगरा प्रवास में दोनों के बीच इतनी आत्मीयता हो गयी कि कवि कलश यदि किसी कार्य से कुछ समय के लिए अन्यत्र चले जाते थे तो युवराज अन्यमनस्क हो जाते थे। आगरा से निकलते समय बड़े महाराज ने अपनी आँखों को पोंछते हुए कवि कलश से कहा, "हम दक्षिण की ओर जा रहे हैं। हमारे जाने के बाद भी हमारे कलेजे का यह दीपक यहीं रहेगा। इसे सँभालना।" महाराज ने अपनी कनिष्ठिका से हीरे की अँगूठी निकाली और कवि कलश को भेंट स्वरूप प्रदान की। इसके बाद उन्होंने सभी से विदा ली। इसके बाद कवि कलश अपने मित्र सक्सेना के साथ कुछ दिनों तक आगरा में रहे। गुप्त रूप से वे वहाँ के समाचार एकत्र करते थे। एक दिन दोनों को संदिग्ध स्थिति में भटकते देखकर वहाँ के कोतवाल ने इन्हें कैद कर लिया। कोतवाल ने दोनों मित्रों को अनेक प्रकार की यातनाएँ देकर आगरा से बाहर निकाल दिया। आगरा से निकलकर कवि कलश अपने ननिहाल मथुरा आये। एक दिन शाम को किसी कृष्ण मन्दिर में उन्होंने शम्भुराजा सुकुमार को ब्राह्मण कुमार के वेश में देखा। उन्होंने युवराज को तत्काल पहचान लिया, किन्तु वहाँ बाजार की भीड़ में कोई गड़बड़ी पैदा न हो जाय इसलिए वे अण्णाजी पन्त त्रिमल का दबे पाँव पीछा करते हुए धीरे धीरे उनके आवास तक आ पहुँचे। मथुरा निवासी त्रिमलबन्धु युवराज को लेकर जब दक्षिण की ओर जाने लगे तो कवि कलश भी उनके साथ हो लिए। कालान्तर में कवि कलश और संभाजी का परस्पर प्रेम निरन्तर बढ़ता गया। युवराज ने कविराज से ब्रजभाषा के अनेक छन्द और गीत सीखे। कालिदास और सम्भाजी . 73

भवभूति की नाट्यकला का दोनों ने मिलकर अध्ययन किया। कृष्ण, राधा, मीरा ही नहीं पूरा गोकुल कविराज की जबान पर था। उनके साहचर्य में युवराज के भीतर साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। कवि कलश की संगति में युवराज ने 'नायिका भेद', 'नखशिख' और 'सात सप्तक' ग्रंथों के साथ तीन अन्य ग्रन्थ लिखे! ब्रजभाषा में लिखे गये 'नायिकाभेद' में युवराज ने श्रेष्ठतम शृंगार का वर्णन किया और बहुत-सी नायिकाओं पर मौलिक दृष्टि से विचार किया। युवराज 'नृपशंभु' के नाम से साहित्य लेखन करते थे। संस्कृत वा ब्रजभाषा में किसी कविता का प्रारम्भिक लेखन हो जाने के बाद कवि कलश उसका सूक्ष्म निरीक्षण करते थे। संभाजी राजा ने कवि कलश को अपना वाङ्मयीन गुरु माना था। इसलिए वही उनके प्रथम पाठक और प्रशंसक बनते थे। आवश्यक होने पर कविराज परिशोधन और परिष्कार भी करते थे। दिन के समय कविराज और युवराज दरबार में मिलते थे। दरबार में राज्य का कार्यव्यापार अर्थात् प्रशासन, राज्य व्यवस्था, सूबेदारी, तवारीख, पत्राचार आदि कार्य युवराज द्वारा निपटाये जाते थे। दरबार में कविराज उनके साथ ही रहते थे। किन्तु शाम के समय या रात में युवराज की काव्य-आराधना आरम्भ होती थी। सरस्वती के दरबार की घंटियों के बजते ही युवराज मुक्त होकर आनन्दित हो जाते थे। राजनीति और कविता दोनों क्षेत्रों में गुरु-शिष्य की दौड़ सभी दिशाओं में चलती रहती थी। शृंगारपुर के मनोहर स्थान में केशव पंडित, कवि कलश और शम्भुराजा की काव्य-गोष्ठी सजती थी। शम्भुराजा को छोड़कर शिवाजी महाराज दक्षिण की लड़ाई पर चले गये थे। इसके कारण युवराज के हृदय में उत्पन्न असन्तोष तात्कालिक था। अपने कर्तव्यनिष्ठ पिता, कुलदेवता, माताभवानी, विद्या के देवता गणेश, शिव और पार्वती उनके मन के कोनों को प्रकाशित करते रहने थे। काव्य की मधुर गन्ध युवराज को मिल गयी थी। श्रृंगारपुर में रहते हुए शम्भुराजा ने संस्कृत भाषा में 'बुधभूषणम्' नामक ग्रन्थ लिखने की घोषणा की। जैसे जैसे युवराज श्लोक लिखते थे वैसे वैसे कवि कलश को देखने के लिए देते जाते थे। उसी सुबह अपने पुण्यप्रतापी पिता का वर्णन एक श्लोक लिखकर युवराज ने कवि कलश को दिया। कवि कलश उसे देखकर ऊँची आवाज में पढ़ने लगे कलिकालभुजंगभावलीढं निखिलं धर्मवेक्ष्य विक्लवं यः! जगतः पतिरंशतोवतापोः (तीर्णः) स शिवछत्रपतिजयत्यजेयः! (कलिकाल भुजंग फेरा डाल रहा है। धर्म का सर्वनाश कर रहा है। 74 :: सम्भाजी

धर्म का उद्धार करने धरती पर। जग त्राता ने अवतार लिया है। होने दो जयनाद शिवा दुन्दुभि का।।। चार उस रात युवराज कुछ जल्दी बिस्तर में चले गये थे। महल के चारों ओर घना अँधेरा छाया था। शृंगारपुर मानो सामने के पहाड़ों को तकिया बनाकर सोया था। बगल के घने पेड़ों से रह-रहकर लाल किरणें दिखाई पड़ती थीं। इससे पहरेदारों के हाथों की मशालें लहराने का आभास होता था। ऐसा लगता था जैसे जंगल में बैताल की पालकी चल रही है। थोड़े ही समय में महल के बाहर एक साँड़नी सवार कुछ घुड़सवारों के साथ आकर रुके। अचानक आये मेहमानों और दरवाजे पर बैठे कर्मचारियों के बीच धीमी आवाज में कुछ बात चल रही थी। उनके ठीक बाद कवि कलश का घोड़ा आकर रुका। कविराज ऊपर कमरे में पहुँचे उसके पहले ही युवराज ने वस्त्र धारण कर लिए। घर में रखी कौड़ियों की माला पहन ली और अपने वस्त्राभूषण ठीक करते हुए द्वार पर आ पहुँचे। वहाँ तेज दीपकों के प्रकाश में चार पाँच लोग बैठे थे, सफेद दाढ़ी वाला लगभग पचास वर्ष का एक मुसलमान युवराज की प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी प्रत्येक गतिविधि पर कवि कलश अपनी सूक्ष्म दृष्टि टिकाए हुए थे। युवराज द्वार पर उपस्थित हुए तो सभी लोग उठकर खड़े हो गये। सभी ने युवराज का अभिवादन किया। संभाजी राजा ने बैठते हुए कवि कलश से आँखों के संकेत से पूछा। कविराज ने संकोच में कहा, "दिलेरखान के यहाँ से एक लिफाफा आया है।" कवि कलश की बात सुनकर शम्भुराजा ने एक गहरी साँस छोड़ी। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वे चुपचाप बैठे रहे। दिलेरखान कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था। गंगा यमुना से लेकर भीमा कावेरी तक अनेक नदियों का पानी पिया हुआ साठ साल का अनुभवी बुड्ढा था। इस प्रकार का कुशल सरदार दो वर्ष पूर्व दक्षिण का सूबेदार बनकर आया था। तभी से वह संभाजी राजा से मित्रता करने का प्रयास कर रहा था। शम्भुराजा ने कौड़ियों की माला हाथ में लेकर मन में ही मन्त्र का जाप किया। सम्भाजी 75

उन्होंने दिलेरखान द्वारा दी गयी लिफाफे की थैली खोलकर देखी। अन्य लोग कमरे से निकलकर बाहर चले गये। शम्भूराजा ने कवि कलश को लिफाफा देकर पढ़ने के लिए कहा। कविराज की नजर उस सुन्दर हस्तलेख पर घूमने लगी। "राजाधिराज, शेरसमशेर, संभाजी राजा भोसले।" कोई व्यक्ति जब मित्रता के लिए अपना हाथ बढ़ाता है तो उसके मन का शत्रुता वाला ग्रंथिजाल जलकर खाक हो जाता है। यह बात हम आप जैसे शायर मराठा शहजादे को हम क्या समझाएँगे। किन्तु आप भी इस बात को गाँठ बाँध लीजिएगा कि कमल के सुन्दर फूल केवल तालाब में ही खिलते हैं। शेर का बच्चा जंगल में ही शोभा पाता है। इस सम्बन्ध में हम आपसे सवाल करना चाहते हैं कि मराठी राज्य के योग्य शहजादे होते हुए भी श्रृंगारपुर की अँधेरी गुफा में अपने को बन्द करके आप क्यों बैठे हैं? "रायगढ़ के अपने हक से वंचित होकर आप विस्थापित हैं। शेर शिवाजी जैसे पिता के होने पर भी आप प्यार के लिए यतीम हो गये हैं। आपके दिल की धड़कन हम जान गये हैं। आजतक आपने मुसलमानों की सिर्फ दुश्मनी के बारे में सुना होगा, दोस्ती के बारे में नहीं। हमारी दोस्ती की कोशिश को ठुकराना नहीं। आप पर जो तकलीफ आये मुझे सूचित करना, हमें आधी रात को जगा देना। उम्र और तजुर्बे की परवाह किये बिना यह बन्दा आपकी सेवा में हाजिर हो जाएगा।" कवि कलश का चेहरा उतर गया। उनसे पत्र का अगला भाग पढ़ा नहीं जा रहा था। शम्भूराजा मन ही-मन मुस्करा रहे थे। स्वयं को रोकने का प्रयास कर रहे थे। किन्तु पानी के बाँध की तरह उनकी हँसी बेकाबू हो गयी। वे पेट पकड़कर हाः हाः करके हँसने लगे। दुष्ट और अनोखा सूबेदार शेर शिवाजी के पुत्र को ही प्यार मुहब्बत का न्योता दे रहा है। इसकी कल्पना ही कितनी उपहासास्पद है। युवराज के साथ ही कवि कलश भी जोर जोर से हँसने लगे। येसूबाई दौड़ते हुए आकर दरवाजे के पास खड़ी हो गयीं। पत्र के सन्देश से पूरे महल में एक अप्रिय सन्नाटा फैल गया। पत्र का उत्तर पाने के लिए दिलेरखान के दूत महल के बाहर रुके हुए थे। दूसरे दिन दोपहर हो गयी। दिलेरखान के दूतों से श्रृंगारपुर की तेज गर्मी सहन नहीं हो रही थी। उन्होंने शम्भूराजा से बार बार पूछना शुरू किया। तब युवराज दूत पर बरसते हुए बोले, "जाओ और अपने दिलेरखान से कहो कि छत से गिरे पानी का वापस छत पर चढ़ना जितना असम्भव है, नदी का सागर की बाँहों में समाने के बदले साँप की तरह उद्गम की ओर जाना जितना असम्भव है, उतना ही किसी मुसलमान सूबेदार के लिए शिवाजी महाराज के पुत्र से मित्रता की इच्छा 76 :. सम्भाजी

करना। यह मूर्खता की नहीं महामूर्खता का लक्षण है।'' पाँच युवराज-युवराज्ञी को लेकर पालकियाँ संगमेश्वर के नावड़ी बन्दगाह पर उतर गयी थीं। शम्भुराजा दूर तक फैली हुई छोटी सी खाड़ी की चमकती धारा को देख रहे थे। सन्ध्या समय वहाँ के ताड़वन में पवन ने अपना नृत्य आरम्भ कर दिया था। पश्चिम दिशा का अरुणाभ आकाश समुद्र के दर्पण में उतर आया था। इस सन्ध्या बेला में मछुवारों की छोटी-छोटी नौकाएँ लहरों पर मंथर गति से डोल रही थीं। कोली स्त्रियाँ नौ गज की साड़ी कुछ ऊपर पहने, पूरे गले में मनियों की माला पहने, बालों में जंगली फूलों को सजाये आनन्द से थिरक रही थीं। सिर पर छोटी लाल टोपी पहने या रूमाल बाँधे, घुटनों तक लुंगियाँ पहने कोली नाव की लकड़ी पर ताल से नाच रहे थे। चलाओ रे नैया, चलाओ मुरारी सागर तट थिरक रही नैया हमारी छोड़ युवराज को श्रृंगारपुर नगर में? गये क्यों महाराज दक्षिण नगर में हमको बताओ हे भगवान मल्हारी। इस गीत के कानों में पड़ते ही शम्भुराजा ने हँसते हुए येसूबाई और कवि कलश की ओर देखा। संगमेश्वर नगर ने संभाजी राजा के मन पर जादू का असर किया था। वरुणा और अलकनन्दा नदी के संगम पर बसी यह प्राचीन नगरी युवराज को बहुत अच्छी लगी। किसी समय इस नगर का नाम रामक्षेत्र था। कर्ण नामक चालुक्य राजा के शासनकाल में इस छोटे से नगर में लगभग तीन सौ नये मन्दिर और तालाब बनाये गये। शहर के चारों ओर एक प्राचीर बनाई गयी थी। शिवाजी महाराज से पहले बीजापुर के आदिलशाह का एक सूबेदार यहाँ रहता था। किन्तु जैसे जैसे हिन्दुओं का स्वराज्य बढ़ने लगा। वैसे वैसे अम्बा घाट उतरकर कोंकण में आने की आदिलशाही की हिम्मत टूटती गयी। ग०,० ३

शम्भुराजा ने कर्णेश्वर मन्दिर में सपत्नीक जाकर दर्शन किया। युवराज ने नगर की बगल में एक कुछ ऊँची जगह देखी। इसके चारों ओर सुपारी और नारियल के पेड़ थे। पीछे ही ओर पास ही कल कल निनादनी नदी थी। चारों ओर पहरेदारों की तरह खड़े घने वृक्षों से घिरी यह हरी पहाड़ी थी। शम्भुराजा ने कहा, "कविराज, यह जगह मुझे बहुत पसन्द आयी है। यहीं पर हमारे लिए एक सुन्दर सा घर बनवाइए। यहाँ पर प्रकृति का साहचर्य मिलेगा साथ ही गोवा और कोल्हापुर से आने वाले रास्ते की अच्छी निगरानी भी रख सकेंगे।" रात्रि भोजन के लिए युवराज को शृंगारपुर के महल में वापस जाना था। इसके लिए शम्भुराजा और येसूबाई ने पालकियों को छोड़कर मजबूत कद काठी वाले अरबी घोड़ों पर सवारी की। युवराज ने घोड़े की लगाम खींचकर शृंगारपुर की ओर दौड़ाया। उस समय अगल बगल ताड़वृक्षों से घिरी घाटियों और खाइयों में अँधेरा उतर रहा था। झरनों और नालों के बीच से राह दिखाने वाले मशालची आगे-पीछे दौड़ने लगे। शम्भुराजा नगर की सीमा पार कर रहे थे, उसी समय अचानक दो तीन सौ किसानों और कोलियों का झुंड युवराज के रास्ते में आकर खड़ा हो गया। तभी संगमेश्वर में नियुक्त पहरेदारों ने 'चलो ! पीछे चलो, पीछे हटो।' कहकर उन्हें ढकेलना आरम्भ किया। किन्तु उसी समय 'ओ युवराज, ओ मालिक, ओ माई बाप, थोड़ा रुक जाओ' ऐसी चीख युवराज के कानों में पड़ी। इस व्याकुल और आर्त चीख को सुनते ही युवराज ने अपने घोड़े की लगाम खींचकर उसे पीछे की ओर घुमाया। युवराज को रुकता देखकर, पहरेदारों के बिना कोई चिन्ता किये, उन गरीब श्रमजीवियों ने चीखना-चिल्लाना शुरू किया- "माई बाप, सरकार हमको बचाओ।" संभाजी राजा को किसी गम्भीर प्रसंग की आशंका हुई। वे घोड़े से उतर गये। उनके पीछे कवि कलश भी घोड़े से उतरे। उन दोनों को किसानों ने घेर लिया। एक बूढ़ा किसान दहाड़ मारकर चिल्लाया- "माई बाप, सरकार, हम कैसे जियें ? ये जप्ती के हुकुमनामे देखिये।" "किसने भेजे हैं इन्हें ?" "देखिये सीधे रायगढ़ से आये हैं।" दुबले पतले दो तीन किसान एक साथ बोल पड़े। "कविराज देखिए तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है।" शम्भुराजा व्यग्र होकर बोले, "यहाँ प्रभावली की सूबेदारी महाराज ने मुझे दी है। ऐसी स्थिति में बिना मुझसे पूछे ये हुकुमनामे रायगढ़ से कैसे आये ?" 78 :: सम्भाजी

उन घबराये हुए किसानों के हाथ से कविराज ने हुकुमनामा लिया। वे धीमी आवाज में बोले, "बहुत सालों से लगान न भरने के कारण ये हुकुमनामे भेजे गये होंगे।" "किन्तु, उस पर हस्ताक्षर किसके हैं?" "राहुजी सोमनाथ के। अण्णाजी दत्तोपन्त के कहने पर ये हुकुमनामे भेजे गये हैं, ऐसा इसमें स्पष्ट उल्लेख है।" पीठ से पेट चिपके किसानों में भय की लहर पुनः उमड़ पड़ी। आठ दस लोगों ने शम्भूराजा और येसूबाई के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया। वे दहाड़ें मारकर शिकायत करने लगे—"हम भी क्या कर सकते हैं मालिक? पिछले छह- सात सालों में अनाज कुछ पैदा ही नहीं हुआ। कितने ही लोगों ने निराश होकर आत्महत्या कर ली। हम पर दया करो, माई-बाप हमें न्याय दो।" उन श्रमजीवियों के दुबले पतले निष्प्राण शरीर को देख लेने पर किसी दूसरे गवाह की आवश्यकता ही नहीं थी। फिर भी युवराज ने संगमेश्वर के थानेदार को पास बुलाया और किसानों की बदहाली की पक्की जाँच की। उन्होंने कविराज को तत्काल आदेश दिया—"कलशजी, इन सभी को लिखकर माफीनामा का हुक्म दे दो।" युवराज ने उसी जगह पर तत्काल न्याय व्यवस्था की। यह देखकर मेहनती कुनबी वहीं पर आनन्द से नाचने लगे। उन किसानों ने युवराज को बहुत बहुत आशीर्वाद दिया। युवराज की सेना पुनः श्रृंगारपुर की ओर चल पड़ी। रात में कवि कलश ने हल्के से संकेत करने वाले शब्दों में शम्भूराजा से कहा, "आपके हुक्म की तामील कल प्रातः ही कर दूँगा। माफीनामा कल ही विशेष दूत से संगमेश्वर भेज दूँगा। परन्तु राजन! आपकी कार्यवाही की एक प्रति सूचनार्थ रायगढ़ को भी भेज देता हूँ।" "हमारे हुक्मनामे के सम्बन्ध में कुछ सन्देह हो रहा है क्या?" गरम तवे पर तेल पड़ने से जैसे छनछनाहट की आवाज आती है, वैसे ही शम्भूराजा उखड़े— "कविराज! हम प्रभावली के बाकायदा सूबेदार हैं। अपने अधिकार से हम यह निर्णय ले सकते हैं और हिन्दवी स्वराज्य के युवराज हैं, खेत खड़ा किया गया धोखा नहीं हैं। किसी कारण से दुखी, लाचार और जरूरतमन्द प्रजा के लिए तत्काल निर्णय लेने का अधिकार युवराज के रूप में मुझे है।" कवि कलश धीरे-से हँसे, और उतने ही शान्त स्वर में बोले, "राजन! आपके अधिकार के सम्बन्ध में प्रश्न करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। किन्तु एक प्रिय मित्र के नाते मुझे यह अवश्य कहना पड़ेगा कि जहाँ राजा होता है वहाँ दरबार होता है। दरबार की दीवारें षड्यन्त्रकारी कारनामों से खोखली होती हैं, सम्भाजी :: 79

महत्त्वाकांक्षा की भूख मे बेचैन होती हैं। यह खेल बहुत पुराने जमाने से चला आ रहा है। आगे पीछे कोई समस्या न उत्पन्न हो इसलिए रायगढ दूत भेजकर सूचना दे देनी चाहिए, ऐसा मेरा विचार है। " छह आसमान मे उड़ने वाले सफेद बादलों की तरह दिन तेजी से गुजर रहे थे। श्रृंगारपुर की दिनचर्या मे कोई विशेष अन्तर नही आया था। इसी बीच एक दिन दोपहर के समय बालाजी आवजी चिटणीस की पालकी महल के दरवाजे पर आ पहुँची। पतले शरीर, गहरे गोरे रंग, मजबूत काठी वाले साठ वर्षीय बालाजी पालकी से उतरे। बीस वर्षीय तरुण की भाँति तेजी से महल की पचीस सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आये। बालाजी बीच के चौक पर आये तो येसूबाई ने सामने आकर उनका स्वागत किया। शम्भूराजा भी बालाजी के अचानक आगमन से चौंक गये। दोनो एक-दूसरे की बाँहों में समा गये। शम्भूराजा ने हँसते हुए पूछा, "बालाजी काका एकदम बिना सूचना के कैसे आ गये?" "शम्भूराजा! गढ़ पर अब मन नहीं लगता। महाराज का कर्नाटक गये कई महीने हो गये। सोचा कम से कम युवराज के ही साहचर्य मे दो दिन बिता लें।" स्वराज्य की स्थापना करते समय शिवाजी महाराज ने अपने आसपास बहुत से नर रत्नों का समूह एकत्र कर रखा था। उनमें से तानाजी बाजीप्रभु देशपांडे शिवा काशीद जैसे अनेक रत्न शहीद हो चुके थे। कुछ वृद्धावस्था के कारण समाप्त हो गये थे। इस समय राजदरबार में हबीरराव, येसाजी कंक हिरोजी फर्जन्द, अण्णाजी दत्तो, मोरोपन्त पिंगले, राहुजी सोमनाथ जैसे उँगलियों पर गिने जा सकने वाले लोग ही पुराने समय के बचे थे। उन्हीं मे बालाजी आवजी चिटणीस का समावेश था। चिटणीस खानदान का स्वराज्य की सेवा में प्रवेश एक दुर्घटना और योगायोग का परिणाम था। बालाजी के कर्मठ पिता आवजी हरि चित्रे जंजीरा के सिद्दी के यहाँ दीवान थे। मराठी प्रदेश पर भयानक अत्याचार करने के लिए सिद्दी कुख्यात था। किन्तु अपनी कार्यकुशलता और निष्ठा के कारण आवजी हरि सिद्दी के दीवान बने रहे। आवजी की दिनोंदिन बढ़ती समृद्धि और प्रगति से अनेक मुसलमान कर्मचारी ४० सम्भाजी

और सरदार स्वभावतः ईर्ष्या करने लगे थे। जेजुरी के खंडोबा आवजी हरि के पूज्य देवता थे। एक बार उनके सपने में मल्हारी मार्तंड के आने की घटना घटी। तभी अपनी सेवा के अनुशासन को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने बीमार मालिक के सामने नियमानुसार प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। अवकाश लेकर वे जेजुरी गये और खंडोबा की पूजा करके जंजीरा वापस लौट आये। इसके पश्चात् सिद्दी बाबशीखान की तबीयत और भी खराब हो गयी। आवजी हरि से ईर्ष्या करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को अच्छा अवसर मिल गया। उन्होंने षड्यन्त्र रचकर यह कहना शुरू किया कि आवजी ने जेजुरी जाकर मालिक पर कुछ जादू टोना किया है। वे एक ही बात दोहराते थे-‘आवजी ने सुल्तान पर भयानक जादू टोना किया है। वह राज्य को डुबाना चाहता है।‘' संयोग बाबशीखान मर गया। गद्दी पर कम उम्र का नया सिद्दी बैठा। कर्मचारियों ने उससे भी शिकायत करनी आरम्भ की कि आवजी ही सुल्तान की मृत्यु का कारण है। नये सिद्दी ने शिकायत को सच मान लिया। आवजी ने हाथ पैर जोड़कर सुल्तान से स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने की प्रार्थना की किन्तु सिद्दी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत नये सिद्दी ने जहर का प्याला आवजी के हाथ में देकर उसे पीने के लिए सख्त आदेश दिया। आवजी और उनके भाई खण्डोजी को बोरे में बाँधकर समुद्र में फेंक दिया गया। हब्शी लोगों ने आवजी हरि का घर लूट लिया। उन्होंने आवजी के बालाजी चिमणाजी और श्यामजी तीनों पुत्रों को गुलाम के बच्चे मानकर ईरान इराक में बेचने का निश्चय किया। एक रात आवजी की पत्नी रखमाबाई के भाग्य फूट गये। उस समय बालाजी केवल ग्यारह वर्ष के थे। अभागी माता के साथ तीनों बच्चे नाव पर चीख-चिल्ला रहे थे। भरे समुद्र और आसमान को देख देखकर भाग्य और भगवान से सहायता की प्रार्थना कर रहे थे। भाग्य का फेर था या कुछ और स्वयं प्रकृति ही उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़ी। नाव राजापुर के किनारे तक पहुँची थी तभी अचानक हवा उल्टी दिशा में बहने लगी। विवश होकर नाविकों को किनारे की ओर जाना पड़ा। यह योगायोग ही था कि रखमाबाई के भाई विसाजी शंकर राजापुर में व्यापार करते थे। वे ऐन मौके पर बहन की सहायता के लिए दौड़ पड़े। नाविकों और कर्मचारियों से बहुत-बहुत प्रार्थना करके और बहुत-सा धन उनकी झोली में डालकर विसाजी ने अपनी बहन और भांजों को मुक्त करा लिया। एक बार बालाजी ने अपने मोतियों जैसे सुन्दर अक्षरों में शिवाजी महाराज को एक पत्र लिखा-‘महाराज! हिन्दवी स्वराज्य के एक सिपाही के रूप में सेवा करने से मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।’ सम्भाजी :: 81

संयोग से शिवाजी महाराज कुछ समय बाद राजापुर की लड़ाई पर आये। उन्होंने एक जौहरी की भाँति हीरे को पहचाना। उन्होंने रखमाबाई से कहा कि वे बालाजी को स्वराज्य की सेवा में ले रहे हैं। अपने परिवार के साथ घटित हादसे से वे अभी तक उबर नहीं पायी थीं। उनके करुण रुदन से महाराज का हृदय द्रवित हो उठा। महाराज ने बालाजी की माता को अभयदान देते हुए कहा, ‘‘माताजी आपके तीन पुत्र हैं। मुझे आप अपना चौथा पुत्र मानिए। आपका सुपुत्र स्वराज्य की चिन्ता करेगा, मैं आपकी चिन्ता करूँगा।’’ अपनी ईमानदारी, परिश्रम और कार्य कौशल से बालाजी पन्त राजसत्ता की एक एक सीढ़ी चढ़ते ऊपर गये। स्वराज्य के ब्राह्मण प्रधानों के प्रच्छन्न विरोध की अनदेखी करके महाराज ने बालाजी को सचिव (चिटणीस) बना दिया और राज्य के सभी किलों और गढ़ों का कार्यभार उन्हें सौंप दिया। बालाजी पन्त ने प्रत्येक किले पर अपनी प्रभु जाति के योग्य और कर्मठ व्यक्तियों को नियुक्त किया। उन्हें महत्त्वपूर्ण पद दिये। अष्टप्रधानों में दो दल बन गये थे। एक ओर बालाजी आवजी चिटणीस तो दूसरी ओर अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त पिंगले थे। प्रभु और ब्राह्मण जाति में आश्चर्यजनक आन्तरिक बैर था। किन्तु शिवाजी महाराज के कठोर अनुशासन और निर्णायक दृष्टि के सम्मुख किसी की कुछ न चलती थी। बालाजी आवजी को शम्भुराजा से पहले से ही बहुत स्नेह था। शम्भुराजा मातृ विहीन पुत्र और बड़े महाराज हमेशा अपने राज-काज में व्यस्त रहते थे। ऐसी स्थिति में पहले राजगढ़ में और बाद में रायगढ़ में शम्भुराजा की हित चिन्ता करने वाले जो इने गिने लोग थे उनमें बालाजी आवजी एक थे। सागौन का वृक्ष जिस गति से बढ़ता है, शम्भुराजा भी उसी गति से दिनोंदिन हृष्ट-पुष्ट होते जा रहे थे। राज्याभिषेक के पूर्व बड़े महाराज ने रायगढ़ और स्थानीय राज्य का कार्यभार सँभालने के लिए कहा था। शम्भुराजा ने बड़े उत्साह और बड़ी कुशलता से चार वर्षों तक यह कार्य सफलतापूर्वक सँभाला। कर्नाटक की कोलार और चिक्कबालापुर की जागीर भी स्वयं सँभाली थी। आगे अथणी, रायबाग गोलकुंडा से लेकर हुबली, फोंडा और अकोला तक कर्नाटक और गोवा की सीमा तक धावा बोला था। कुतुब शाह के दीवान मादण्णा से मित्रता करके बहुत सा धन लूटकर रायगढ़ ले आये थे। शम्भुराजा के इस वीरता भरे उत्साह से बालाजी पन्त बहुत प्रभावित हुए थे। कुछ समय बाद बालाजी पन्त शम्भुराजा के साथ भोजन कर रहे थे। सुस्वादु भोजन से उनका मन बहुत प्रसन्न था। परन्तु भोजन करते-करते यकायक जैसे मुँह में कोई पत्थर का टुकड़ा आ गया। बालाजी ने क्रुद्ध स्वर में पूछा- ‘‘वह अघोरघट कपालिक कहाँ है?’’ 82 सम्भाजी

" 'कौन अघोरघट और कौन कापालिक ?' ' इस नये प्रसंग को लेकर बालाजी पन्त की मुद्रा अपना लुभावनापन छोड़कर क्रोधावेश में भयानक हो गयी। वे चिल्लाए- " 'जो हमेशा तुम पर अपना जादू चलाता है। जिसने अपनी पापी बुद्धि मे तुम्हें पागल बना दिया है। जो भैंसे की गीली पीठ पर सवारी करता है, जो काले जादू के काले-कारनामे करता है।' ' " 'मगर है कौन ?' ' " 'जो अघोरी कार्य के लिए बैतालों के झुंड बुलाता है।' ' संभाजी ने मुस्कराते हुए येसूबाई की ओर देखा। फिर दानों जोर से हँसने लगे। अपनी हँसी को रोकते हुए शम्भूराजा ने कहा, " 'औरों की तरह आपको भी संशय और ईर्ष्या के साँप ने डस लिया है क्या ? इसीलिए कविराज आपको पराये लगने लगे हैं क्या ?' ' " 'सच कहूँ युवराज ! इस सन्दर्भ में मैं अपने अष्टप्रधानों को जरा भी दोष नहीं देता। यह कलुष के रूप में शिवाजी महाराज के स्वराज्य में कलि प्रविष्ट हो गया है। यह पूरी तरह मच है। यदि ऐसा नहीं होता तो आपके जैसा कर्तव्यपरायण राजकुमार ने इतनी भयंकर चाल न चली होती।' ' " 'कैसी चाल ? बालाजी काका !' ' " 'किसी अच्छे व्यक्ति के बुरी संगति में पड़ने से बुराइयों का प्रभाव पड़ता ही है। इस श्रृंगारपुर के परिसर में मांस मच्छी खाने वाले, जादू-टोना करने वाले अधर्मी शाक्तपन्थियों ने उत्पात मचा रखा है। आप जैसा विद्वान युवराज उनका अन्धा शिकार हो जाय, यह बड़ा दुर्भाग्य है।' ' " 'बालाजी काका मनुष्य के आचरण की शुद्धता के लिए ही प्रत्येक धर्म और पथ प्रयत्न करते हैं। कालान्तर में लोग धर्म को वशवर्ती बनाकर अनुचित मार्ग को अपनाते हैं। किन्तु धर्म का विकृत रूप वास्तविक धर्म नहीं होता। यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि केवल शाक्त पन्थियों में ही सारी बुराइयाँ हैं और वैदिक धर्म इससे पूर्णतया मुक्त हैं।' ' शम्भूराजा ने आगे कहा, " 'शाक्त पंथ को हम कुछ अन्य नहीं समझते। वह तो वस्तुतः जगदम्बा की, शक्ति की ही पूजा है। उसमें हमारे भोसले खानदान की कुलदेवी तुलजा भवानी भी हैं। वे शस्त्रधारिणी और दुष्टों का नाश करने वाली हैं। उसे भोग लगता है तो उसी रक्त मांस का," बोलते-बोलते शम्भूराजा क्षणभर के लिए रुके फिर भरे हुए गले से बोले, " 'आज हमारा कोई अपराध न होने पर भी बहुतों की उपहास करने वाली दुष्ट दृष्टि हमें शाप देती है। बहुत से लोगों के द्वेष के, शाप के और उनकी गालियों के हम शिकार होते हैं। ऐसी दुष्ट प्रवृत्ति का सामना करने के लिए किसी शक्ति के आशीर्वाद और वरदान की आवश्यकता तो पड़ेगी ही, बालाजी काका।' ' सम्भाजी • 83

"शम्भूराजा ! बड़े महाराज ने ऐसा सहारा कहाँ ढूँढ़ा था ?" "आपके जैसे व्यक्ति को क्या बताएँ चिटणीस काका ?" शम्भूराजा आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोले, "गागाभट्ट से पिताजी ने अपना राज्याभिषेक करवाया था। किन्तु उसमें कुछ दोष रह गये थे, कुछ अपूर्णताएँ थीं। यह ध्यान में आने पर पिताजी ने फिर दुबारा निश्चल गिरि गोसावी से तान्त्रिक अभिषेक करवाया था। आप इस बात को भूल गये क्या? यहीं पर महाराज ने निश्चल गिरि के लिए आश्रम बनवाया था और उनके लिए हर प्रकार की सुविधा करके दी थी। आपको इसे नहीं भूलना चाहिए।" बालाजी कुछ नरम पड़े किन्तु तत्काल उन्होंने पूछा- "मुझे यह नहीं मालूम था कि तुम्हें राजा बनने की इतनी जल्दी पड़ी है।" "काका, आप यह क्या कह रहे हैं? अपने पिताजी राजगद्दी पर बैठे हैं तो राजपद के हम क्यों उतावले होंगे? इस तरह का आचरण करने वाले क्या हम आपको किसी सुल्तान या मुसलमान के दुष्ट शहजादे लग रहे हैं? "यदि ऐसा नहीं था तो वह महाभयंकर अभिषेक क्यों करवाये ?" "कौन सा ?" "वह कलशाभिषेक था क्या ?" आँखें सिकोड़ते हुए बालाजी ने पूछा। "हाँ, वह किया मैंने।" शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में कहा। "अरे यह क्या किया शम्भूराजा आपने ?" बालाजी आवजी व्याकुल हो गये। उनका चेहरा उतर गया। "क्या करते बालाजी काका ? कद काठी का मजबूत तगड़ा घोड़ा दौड़ते दौड़ते अचानक ठोकर लगने से मर कैसे जाता है ? हमारे महल के आगे पीछे हल्दी कुमकुम लगे नींबू, सुई से गुदे हुए भल्लातक, काली जादू टोने की गुड़ियाँ जैसी अशुभ वस्तुएँ कहाँ से आकर भरी पड़ी रहती हैं ?" "परन्तु इसके लिए कलशाभिषेक ?" बालाजी आवजी ने आँखें मटकायीं। "दूसरा करते भी क्या काका ? अन्तःपुर में, दरबार में घोड़ों के तबेलों में कहीं भी शान्ति नहीं, बहनोई गणोजी अलग नाराज। जिन्दगी को शर्मनाक बना देने वाली दरबारियों द्वारा की गयी बदनामी, व्यभिचार के गन्दे आरोप, मुझे हमेशा नीचा दिखाने की ताक में बैठे अष्टप्रधान और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह कि सारी दुनिया के लिए पहाड़ जैसा आधार देने वाले किन्तु मुझसे निरन्तर दूर होते जा रहे मेरे पिताजी, इन सारी परेशानियों का कटु अनुभव करते हुए सोचा एक बार शान्ति कर डालूँ।" "शान्ति ? इस प्रकार की शान्ति ?" बालाजी आवजी संकुचित हुए। उनकी पुतलियाँ तेजी से गोल-गोल घूमने लगीं। उनका गला भर आया। वे व्याकुल स्वर 84 : सम्भाजी

में चीखे- "इसका मतलब यह है युवराज कि जिन शिवाजी महाराज ने इस महाराष्ट्र का निर्माण किया उनको हमेशा के लिए शान्त करने को निकले हैं आप।" बालाजी पन्त ने जो निष्कर्ष निकाला था उसकी कल्पना मात्र से शम्भूराजा के प्राण सूख गये। ऐसा लगा जैसे किसी ने तेज छुरी उनके कलेजे में उतार दी। आसन से उठकर वे दरी पर बैठ गये और अत्यन्त भयभीत स्वर में बोले, "कितनी भयंकर बात कर रहें है काका आप? "युवराज! कलशाभिषेक फिर दूसरा अभिप्राय क्या है?" बालाजी पन्त दहाड़ें मारकर रोने जैसे स्वर में बोले, "एक राजा के गद्दी पर रहते दूसरा राजा उस गद्दी पर नहीं बैठ सकता। जिसको राजसत्ता प्राप्त करने की उतावली रहती है वही कलश जैसे धूर्त मात्रिकों को एकत्र करता है और तन्त्र-मन्त्र की अघोरी विद्या के बल पर जीवित राजा का नाश करता है। दिवंगत राजा के श्राद्ध के दिन ही नये राजा का सिंहासनाारोहण होता है। इसी के साथ कलशाभिषेक की पूर्णाहुति होती है। शास्त्रज्ञ पंडितों का ऐसा ही मानना है।" शम्भूराजा की आँखों में धारासार आँसू गिरने लगे। उन्होंने बालाजी से तत्काल पूछा, "कलशाभिषेक अनुष्ठान यह भयंकर आशय आपको किसने बताया?" "अजी अब बताना किसको रह गया है। रायगढ़ से लेकर पन्हालगढ़ तक हर जगह यह बात फैल गयी है। आपके इस भयंकर कृत्य का समाचार राज्य के कुछ कर्मचारियों ने महाराज के पास कर्नाटक भी भेजा है। अण्णाजी दत्तो और राहुजी सोमनाथ की शिष्यमंडली, उनके भांजे-भतीजे, स्वयं आपकी सौतेली माता सोयराबाई रानी सभी हर किसी से आपके इस कृत्य का वर्णन करते हैं। बच्चे बूढ़े सभी इस चर्चा में लिप्त हैं। बालाजी आवजी ने कपड़े से अपना चेहरा पोंछा। बालाजी के मुँह से निकले धक्का देने वाले प्रत्येक शब्द को सुनकर युवराज और युवराज्ञी दोनों आश्चर्यचकित रह गये। अपनी आँसुओं और रुलाई के वेग को रोकते हुए शम्भूराजा ने कहा, "जिन नीच और दुष्ट लोगों के विकृत मस्तिष्क से ऐसे विषैले विचार निकलते हैं, कल उनके मुँह में राख भरने में गधे भी पाप कर्म का अनुभव करेंगे। अच्छा हुआ, आपने इतनी दूर आकर हमें सावधान किया।" मरणासन्न, घायल मराठा सरदार की तरह शम्भूराजा नीचे गिर गये। जैसे किसी ने कलेजे पर गरम सरिया रख दिया हो। ऐसी पीड़ा से वे छटपटाये। "बालाजी काका! जिस जीजा माता ने मेरी माँ के मरने के बाद मुझे पाल पोस कर छोटे से बड़ा किया उसी जीजा माता के पुत्र की मृत्यु का सपना संभाजी देखता होगा; ऐसा आप सोच कैसे सकते हैं?" "नहीं-नहीं, एकदम असम्भव।" बालाजी पराजित स्वर में बोले। सम्भाजी · ४९