छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरहा था। कवि कलश इस स्थिति को भली भाँति जानते थे। इसलिए फूँक फूँक कर कदम रखते थे। वे सभी से अलग रहना पसन्द करते थे। संभाजी राजा के दरबार में कवि कलश का सम्मान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था इसलिए दरबार के बहुत से महत्त्वाकांक्षी और नये लोग कवि कलश से ईर्ष्या करने लगे थे। कवि कलश ने अपने जीवन में शम्भूराजा का नाम जब पहली बार सुना तो उस समय उनकी उम्र बीस वर्ष थी। किन्तु उसी छोटी उम्र में उन्होंने ब्रजभाषा और संस्कृत का इतना गहन अध्ययन कर लिया था कि दोनों भाषायें उनकी आज्ञाकारी दासियाँ बन गयी थीं। वे इस उम्र में ही ब्रजभाषा के एक प्रतिष्ठित कवि बन चुके थे। उनका ननिहाल मथुरा में था। अपनी छोटी उम्र में ही कवि कलश ने मथुरा, प्रयाग, बनारस जैसे स्थानों पर वरिष्ठों के सम्मेलन में भाग लिया था। अनेक प्राचीन और समकालीन कवियों की श्रेष्ठ कविताएँ और लोकगीत उन्हें कण्ठस्थ थे। देखते देखते वे ब्रजभाषा के एक श्रेष्ठ कवि ही नहीं बल्कि कवियों की सभा के कलश बन गये। इसी आधार पर इन्हें 'कवि कलश' नाम दिया गया। प्रयाग के मुरलीधर शास्त्री का पुत्र उमाजी पंडित ही कवि कलश के रूप जाना गया। मुरलीधर शास्त्री बिंबाजी भोसले के समय से भोसले परिवार के प्रयाग के पंडित थे। कवि भूषण के बाद उत्तर भारत में शिवाजी महाराज की खुलकर प्रशंसा करने वाले दूसरे विद्वान पंडित थे। इसी अपराध के लिए उन्हें एक बार इलाहाबाद की मुगल कोतवाली पर तलब किया गया था। उन्हें चेतावनी भी दी गयी थी। एक दिन कवि कलश नित्य की भाँति भोर के समय संगम पर स्नान के लिए गये थे। स्नान करके गीले वस्त्रों में ही घर लौटे। उस समय उनके पिता मुरली धर शास्त्री तुलसी के पास खड़े बड़ी व्यग्रता से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। कवि कलश के आते ही उन्होंने अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ बन्द कर लीं। वे गम्भीर किन्तु धीमी आवाज में बोले— “चल जल्दी कर। एक क्षण भी बिना नष्ट किये घोड़े को बाहर निकाल।” “बाबा! इतनी शीघ्रता क्यों?” “रायगढ़ से सन्देश आया है। शिवाजी महाराज अपने पुत्र शम्भूराजा के साथ कुछ ही दिनों में आगरे पहुँचने वाले हैं। औरंगजेब की काली करतूतों का महाराज को कोई भरोसा नहीं है। इसलिए भोसले खानदान के साथ विश्वसनीय व्यवहार रखने वाले तीन चार परिवारों के श्रेष्ठ लोगों को उन्होंने उत्तर भारत में आगरे बुलाया है। ऐसी कठिन परिस्थिति में वस्तुतः मुझे ही जाना चाहिए किन्तु इस वृद्धावस्था में यात्रा का कष्ट मैं झेल नहीं पाऊँगा।” कवि कलश ने तत्काल यात्रा के लिए आवश्यक अल्पतम सामग्री एक गठरी 72 सम्भाजी