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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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तीन प्रतिचगढ़ की चोटी पर कौओं की आँखों की तरह गहरे और साफ-सुथरे अनेक जलाशय थे। इस जल से प्यास को तृप्ति मिलती थी। सह्याद्रि की चोटी से युवराज की दृष्टि कभी कभी वारणा प्रदेश की ओर दौड़ जाती थी। उसी ओर कुछ दूरी पर पन्हालागढ़ था, उसी गढ़ की दिशा में आगे बीजापुर की ओर का कर्नाटक और तमिल प्रदेश है। वहीं पर युवराज की जिन्दगी का सर्वस्व, सत्य, शिव और सुन्दर सब कुछ अर्थात् शिवाजी महाराज थे। उनके मन्त्रपूत चरणों पर युवराज की दृष्टि सदैव टिकी रहती थी। हृदय धड़कता रहता था। शाम के समय वन चरकर लौटती गाय के लिए जैसे बछड़ा अधीर होने लगता है, पक्षियों से मिलने के लिए उनके शावकों को विकलता होती है, अपने प्रेमी को मिलने के लिए प्रेमिका पागल हो जाती है, उसी उत्सुकता, लगन और अभिलाषा से संभाजी अपने पिता की प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रृंगारपुर में ही येसूबाई के पाँव भारी हो गये थे। पेट में शिशु बड़ा हो रहा था। शयनकक्ष में येसू के पेट पर अपनी कोमल उँगलियाँ फेरते हुए युवराज पूछते थे—"येसू! हम पिताजी से कब मिलेंगे?" "आप जब कहेंगे तब।" "नहीं। ऐसे खाली हाथ नहीं जाएँगे। अब तो हाथ में बाल राजा को लेकर ही जाएँगे तभी रायगढ़ पर पिताजी और जगदीश्वर का दर्शन करेंगे।" श्रृंगारपुर का सम्पूर्ण परिसर वनदेवता की अद्भुत देन प्रकृति का असीम आशीर्वाद है। यहाँ पर आषाढ़ की तेज वर्षा कुछ समय के लिए रुकी हुई थी। भाँग पिये हुए घोड़ों की तरह प्रतिचगढ़ के कन्धों से नीचे के ओर भागने वाले बड़े बड़े झरने मनुष्यों को उतरने का रास्ता देने लगे थे। कुछ दिनों से घने बादलों में दबी सूरज की किरणें धरती पर उतरने लगी थीं। श्रावण महीने में घड़ी-दो घड़ी के अन्तराल से हल्की बौछारें आती थीं और तितलियों के झुंड की तरह चली भी जाती थीं। श्रृंगारपुर के मैदान पर धूप हिरन के बच्चे की तरह नाच रही थी। पानी से लबालब भरे धान के खेत सन्तुष्ट दिखने लगे थे। कवि कलश शम्भूराजा के मित्र, गुरु, दीवान और दीवाने सब कुछ थे। संभाजी के हृदय और दरबार में उनका विशिष्ट स्थान था। एक परकीय व्यक्ति का प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ते इतनी ऊँचाई पर पहुँच जाना बहुत लोगों से देखा नहीं जा सम्भाजी :: 71