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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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में बाँधी। पानी पीने के लिए एक ढक्कन वाला कलश लिया। मुरलीधर शास्त्री पुत्र को विदा करते समय भाव विभोर होकर बोले, "अपने परिवार पर वर्षों से पंडित होने के नाते भोसले परिवार का बहुत विश्वास है। इसलिए शिवाजी महाराज और शम्भुराजा की सेवा का जो भी काम मिले उसे मन लगाकर करना। आज शत्रुओं के आक्रमण से पीड़ित भारत के तैंतीस कोटि देवी देवता शिवाजी महाराज की ओर बड़ी आशा से देख रहे हैं।" अपने पिता के आदेश को शिरोधार्य कर कवि कलश ने आगरा के लिए प्रस्थान किया। वह शिवाजी महाराज की सेवा में प्रस्तुत हुआ। एक दिन भगवान की पूजा करते समय कवि कलश के मुख से महाराज ने शुद्ध संस्कृत पाठ सुना और उसी समय उन्हें संभाजी राजा की सेवा में नियुक्त कर दिया। कवि कलश शम्भुराजा से उम्र में लगभग दस वर्ष बड़े थे। श्रृंगारपुर के उमाजी पंडित ने शम्भुराजा के मन में संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम उत्पन्न कर दिया था। किन्तु कवि कलश की सुमधुर आवाज में संस्कृत और ब्रजभाषा की काव्य पंक्तियों को सुनकर युवराज विभोर हो जाते थे। आगरा प्रवास में दोनों के बीच इतनी आत्मीयता हो गयी कि कवि कलश यदि किसी कार्य से कुछ समय के लिए अन्यत्र चले जाते थे तो युवराज अन्यमनस्क हो जाते थे। आगरा से निकलते समय बड़े महाराज ने अपनी आँखों को पोंछते हुए कवि कलश से कहा, "हम दक्षिण की ओर जा रहे हैं। हमारे जाने के बाद भी हमारे कलेजे का यह दीपक यहीं रहेगा। इसे सँभालना।" महाराज ने अपनी कनिष्ठिका से हीरे की अँगूठी निकाली और कवि कलश को भेंट स्वरूप प्रदान की। इसके बाद उन्होंने सभी से विदा ली। इसके बाद कवि कलश अपने मित्र सक्सेना के साथ कुछ दिनों तक आगरा में रहे। गुप्त रूप से वे वहाँ के समाचार एकत्र करते थे। एक दिन दोनों को संदिग्ध स्थिति में भटकते देखकर वहाँ के कोतवाल ने इन्हें कैद कर लिया। कोतवाल ने दोनों मित्रों को अनेक प्रकार की यातनाएँ देकर आगरा से बाहर निकाल दिया। आगरा से निकलकर कवि कलश अपने ननिहाल मथुरा आये। एक दिन शाम को किसी कृष्ण मन्दिर में उन्होंने शम्भुराजा सुकुमार को ब्राह्मण कुमार के वेश में देखा। उन्होंने युवराज को तत्काल पहचान लिया, किन्तु वहाँ बाजार की भीड़ में कोई गड़बड़ी पैदा न हो जाय इसलिए वे अण्णाजी पन्त त्रिमल का दबे पाँव पीछा करते हुए धीरे धीरे उनके आवास तक आ पहुँचे। मथुरा निवासी त्रिमलबन्धु युवराज को लेकर जब दक्षिण की ओर जाने लगे तो कवि कलश भी उनके साथ हो लिए। कालान्तर में कवि कलश और संभाजी का परस्पर प्रेम निरन्तर बढ़ता गया। युवराज ने कविराज से ब्रजभाषा के अनेक छन्द और गीत सीखे। कालिदास और सम्भाजी . 73

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