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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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भवभूति की नाट्यकला का दोनों ने मिलकर अध्ययन किया। कृष्ण, राधा, मीरा ही नहीं पूरा गोकुल कविराज की जबान पर था। उनके साहचर्य में युवराज के भीतर साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। कवि कलश की संगति में युवराज ने 'नायिका भेद', 'नखशिख' और 'सात सप्तक' ग्रंथों के साथ तीन अन्य ग्रन्थ लिखे! ब्रजभाषा में लिखे गये 'नायिकाभेद' में युवराज ने श्रेष्ठतम शृंगार का वर्णन किया और बहुत-सी नायिकाओं पर मौलिक दृष्टि से विचार किया। युवराज 'नृपशंभु' के नाम से साहित्य लेखन करते थे। संस्कृत वा ब्रजभाषा में किसी कविता का प्रारम्भिक लेखन हो जाने के बाद कवि कलश उसका सूक्ष्म निरीक्षण करते थे। संभाजी राजा ने कवि कलश को अपना वाङ्मयीन गुरु माना था। इसलिए वही उनके प्रथम पाठक और प्रशंसक बनते थे। आवश्यक होने पर कविराज परिशोधन और परिष्कार भी करते थे। दिन के समय कविराज और युवराज दरबार में मिलते थे। दरबार में राज्य का कार्यव्यापार अर्थात् प्रशासन, राज्य व्यवस्था, सूबेदारी, तवारीख, पत्राचार आदि कार्य युवराज द्वारा निपटाये जाते थे। दरबार में कविराज उनके साथ ही रहते थे। किन्तु शाम के समय या रात में युवराज की काव्य-आराधना आरम्भ होती थी। सरस्वती के दरबार की घंटियों के बजते ही युवराज मुक्त होकर आनन्दित हो जाते थे। राजनीति और कविता दोनों क्षेत्रों में गुरु-शिष्य की दौड़ सभी दिशाओं में चलती रहती थी। शृंगारपुर के मनोहर स्थान में केशव पंडित, कवि कलश और शम्भुराजा की काव्य-गोष्ठी सजती थी। शम्भुराजा को छोड़कर शिवाजी महाराज दक्षिण की लड़ाई पर चले गये थे। इसके कारण युवराज के हृदय में उत्पन्न असन्तोष तात्कालिक था। अपने कर्तव्यनिष्ठ पिता, कुलदेवता, माताभवानी, विद्या के देवता गणेश, शिव और पार्वती उनके मन के कोनों को प्रकाशित करते रहने थे। काव्य की मधुर गन्ध युवराज को मिल गयी थी। श्रृंगारपुर में रहते हुए शम्भुराजा ने संस्कृत भाषा में 'बुधभूषणम्' नामक ग्रन्थ लिखने की घोषणा की। जैसे जैसे युवराज श्लोक लिखते थे वैसे वैसे कवि कलश को देखने के लिए देते जाते थे। उसी सुबह अपने पुण्यप्रतापी पिता का वर्णन एक श्लोक लिखकर युवराज ने कवि कलश को दिया। कवि कलश उसे देखकर ऊँची आवाज में पढ़ने लगे कलिकालभुजंगभावलीढं निखिलं धर्मवेक्ष्य विक्लवं यः! जगतः पतिरंशतोवतापोः (तीर्णः) स शिवछत्रपतिजयत्यजेयः! (कलिकाल भुजंग फेरा डाल रहा है। धर्म का सर्वनाश कर रहा है। 74 :: सम्भाजी