भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

रहा था। कवि कलश इस स्थिति को भली भाँति जानते थे। इसलिए फूँक फूँक कर कदम रखते थे। वे सभी से अलग रहना पसन्द करते थे। संभाजी राजा के दरबार में कवि कलश का सम्मान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था इसलिए दरबार के बहुत से महत्त्वाकांक्षी और नये लोग कवि कलश से ईर्ष्या करने लगे थे। कवि कलश ने अपने जीवन में शम्भूराजा का नाम जब पहली बार सुना तो उस समय उनकी उम्र बीस वर्ष थी। किन्तु उसी छोटी उम्र में उन्होंने ब्रजभाषा और संस्कृत का इतना गहन अध्ययन कर लिया था कि दोनों भाषायें उनकी आज्ञाकारी दासियाँ बन गयी थीं। वे इस उम्र में ही ब्रजभाषा के एक प्रतिष्ठित कवि बन चुके थे। उनका ननिहाल मथुरा में था। अपनी छोटी उम्र में ही कवि कलश ने मथुरा, प्रयाग, बनारस जैसे स्थानों पर वरिष्ठों के सम्मेलन में भाग लिया था। अनेक प्राचीन और समकालीन कवियों की श्रेष्ठ कविताएँ और लोकगीत उन्हें कण्ठस्थ थे। देखते देखते वे ब्रजभाषा के एक श्रेष्ठ कवि ही नहीं बल्कि कवियों की सभा के कलश बन गये। इसी आधार पर इन्हें 'कवि कलश' नाम दिया गया। प्रयाग के मुरलीधर शास्त्री का पुत्र उमाजी पंडित ही कवि कलश के रूप जाना गया। मुरलीधर शास्त्री बिंबाजी भोसले के समय से भोसले परिवार के प्रयाग के पंडित थे। कवि भूषण के बाद उत्तर भारत में शिवाजी महाराज की खुलकर प्रशंसा करने वाले दूसरे विद्वान पंडित थे। इसी अपराध के लिए उन्हें एक बार इलाहाबाद की मुगल कोतवाली पर तलब किया गया था। उन्हें चेतावनी भी दी गयी थी। एक दिन कवि कलश नित्य की भाँति भोर के समय संगम पर स्नान के लिए गये थे। स्नान करके गीले वस्त्रों में ही घर लौटे। उस समय उनके पिता मुरली धर शास्त्री तुलसी के पास खड़े बड़ी व्यग्रता से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। कवि कलश के आते ही उन्होंने अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ बन्द कर लीं। वे गम्भीर किन्तु धीमी आवाज में बोले— “चल जल्दी कर। एक क्षण भी बिना नष्ट किये घोड़े को बाहर निकाल।” “बाबा! इतनी शीघ्रता क्यों?” “रायगढ़ से सन्देश आया है। शिवाजी महाराज अपने पुत्र शम्भूराजा के साथ कुछ ही दिनों में आगरे पहुँचने वाले हैं। औरंगजेब की काली करतूतों का महाराज को कोई भरोसा नहीं है। इसलिए भोसले खानदान के साथ विश्वसनीय व्यवहार रखने वाले तीन चार परिवारों के श्रेष्ठ लोगों को उन्होंने उत्तर भारत में आगरे बुलाया है। ऐसी कठिन परिस्थिति में वस्तुतः मुझे ही जाना चाहिए किन्तु इस वृद्धावस्था में यात्रा का कष्ट मैं झेल नहीं पाऊँगा।” कवि कलश ने तत्काल यात्रा के लिए आवश्यक अल्पतम सामग्री एक गठरी 72 सम्भाजी

में बाँधी। पानी पीने के लिए एक ढक्कन वाला कलश लिया। मुरलीधर शास्त्री पुत्र को विदा करते समय भाव विभोर होकर बोले, "अपने परिवार पर वर्षों से पंडित होने के नाते भोसले परिवार का बहुत विश्वास है। इसलिए शिवाजी महाराज और शम्भुराजा की सेवा का जो भी काम मिले उसे मन लगाकर करना। आज शत्रुओं के आक्रमण से पीड़ित भारत के तैंतीस कोटि देवी देवता शिवाजी महाराज की ओर बड़ी आशा से देख रहे हैं।" अपने पिता के आदेश को शिरोधार्य कर कवि कलश ने आगरा के लिए प्रस्थान किया। वह शिवाजी महाराज की सेवा में प्रस्तुत हुआ। एक दिन भगवान की पूजा करते समय कवि कलश के मुख से महाराज ने शुद्ध संस्कृत पाठ सुना और उसी समय उन्हें संभाजी राजा की सेवा में नियुक्त कर दिया। कवि कलश शम्भुराजा से उम्र में लगभग दस वर्ष बड़े थे। श्रृंगारपुर के उमाजी पंडित ने शम्भुराजा के मन में संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम उत्पन्न कर दिया था। किन्तु कवि कलश की सुमधुर आवाज में संस्कृत और ब्रजभाषा की काव्य पंक्तियों को सुनकर युवराज विभोर हो जाते थे। आगरा प्रवास में दोनों के बीच इतनी आत्मीयता हो गयी कि कवि कलश यदि किसी कार्य से कुछ समय के लिए अन्यत्र चले जाते थे तो युवराज अन्यमनस्क हो जाते थे। आगरा से निकलते समय बड़े महाराज ने अपनी आँखों को पोंछते हुए कवि कलश से कहा, "हम दक्षिण की ओर जा रहे हैं। हमारे जाने के बाद भी हमारे कलेजे का यह दीपक यहीं रहेगा। इसे सँभालना।" महाराज ने अपनी कनिष्ठिका से हीरे की अँगूठी निकाली और कवि कलश को भेंट स्वरूप प्रदान की। इसके बाद उन्होंने सभी से विदा ली। इसके बाद कवि कलश अपने मित्र सक्सेना के साथ कुछ दिनों तक आगरा में रहे। गुप्त रूप से वे वहाँ के समाचार एकत्र करते थे। एक दिन दोनों को संदिग्ध स्थिति में भटकते देखकर वहाँ के कोतवाल ने इन्हें कैद कर लिया। कोतवाल ने दोनों मित्रों को अनेक प्रकार की यातनाएँ देकर आगरा से बाहर निकाल दिया। आगरा से निकलकर कवि कलश अपने ननिहाल मथुरा आये। एक दिन शाम को किसी कृष्ण मन्दिर में उन्होंने शम्भुराजा सुकुमार को ब्राह्मण कुमार के वेश में देखा। उन्होंने युवराज को तत्काल पहचान लिया, किन्तु वहाँ बाजार की भीड़ में कोई गड़बड़ी पैदा न हो जाय इसलिए वे अण्णाजी पन्त त्रिमल का दबे पाँव पीछा करते हुए धीरे धीरे उनके आवास तक आ पहुँचे। मथुरा निवासी त्रिमलबन्धु युवराज को लेकर जब दक्षिण की ओर जाने लगे तो कवि कलश भी उनके साथ हो लिए। कालान्तर में कवि कलश और संभाजी का परस्पर प्रेम निरन्तर बढ़ता गया। युवराज ने कविराज से ब्रजभाषा के अनेक छन्द और गीत सीखे। कालिदास और सम्भाजी . 73

भवभूति की नाट्यकला का दोनों ने मिलकर अध्ययन किया। कृष्ण, राधा, मीरा ही नहीं पूरा गोकुल कविराज की जबान पर था। उनके साहचर्य में युवराज के भीतर साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। कवि कलश की संगति में युवराज ने 'नायिका भेद', 'नखशिख' और 'सात सप्तक' ग्रंथों के साथ तीन अन्य ग्रन्थ लिखे! ब्रजभाषा में लिखे गये 'नायिकाभेद' में युवराज ने श्रेष्ठतम शृंगार का वर्णन किया और बहुत-सी नायिकाओं पर मौलिक दृष्टि से विचार किया। युवराज 'नृपशंभु' के नाम से साहित्य लेखन करते थे। संस्कृत वा ब्रजभाषा में किसी कविता का प्रारम्भिक लेखन हो जाने के बाद कवि कलश उसका सूक्ष्म निरीक्षण करते थे। संभाजी राजा ने कवि कलश को अपना वाङ्मयीन गुरु माना था। इसलिए वही उनके प्रथम पाठक और प्रशंसक बनते थे। आवश्यक होने पर कविराज परिशोधन और परिष्कार भी करते थे। दिन के समय कविराज और युवराज दरबार में मिलते थे। दरबार में राज्य का कार्यव्यापार अर्थात् प्रशासन, राज्य व्यवस्था, सूबेदारी, तवारीख, पत्राचार आदि कार्य युवराज द्वारा निपटाये जाते थे। दरबार में कविराज उनके साथ ही रहते थे। किन्तु शाम के समय या रात में युवराज की काव्य-आराधना आरम्भ होती थी। सरस्वती के दरबार की घंटियों के बजते ही युवराज मुक्त होकर आनन्दित हो जाते थे। राजनीति और कविता दोनों क्षेत्रों में गुरु-शिष्य की दौड़ सभी दिशाओं में चलती रहती थी। शृंगारपुर के मनोहर स्थान में केशव पंडित, कवि कलश और शम्भुराजा की काव्य-गोष्ठी सजती थी। शम्भुराजा को छोड़कर शिवाजी महाराज दक्षिण की लड़ाई पर चले गये थे। इसके कारण युवराज के हृदय में उत्पन्न असन्तोष तात्कालिक था। अपने कर्तव्यनिष्ठ पिता, कुलदेवता, माताभवानी, विद्या के देवता गणेश, शिव और पार्वती उनके मन के कोनों को प्रकाशित करते रहने थे। काव्य की मधुर गन्ध युवराज को मिल गयी थी। श्रृंगारपुर में रहते हुए शम्भुराजा ने संस्कृत भाषा में 'बुधभूषणम्' नामक ग्रन्थ लिखने की घोषणा की। जैसे जैसे युवराज श्लोक लिखते थे वैसे वैसे कवि कलश को देखने के लिए देते जाते थे। उसी सुबह अपने पुण्यप्रतापी पिता का वर्णन एक श्लोक लिखकर युवराज ने कवि कलश को दिया। कवि कलश उसे देखकर ऊँची आवाज में पढ़ने लगे कलिकालभुजंगभावलीढं निखिलं धर्मवेक्ष्य विक्लवं यः! जगतः पतिरंशतोवतापोः (तीर्णः) स शिवछत्रपतिजयत्यजेयः! (कलिकाल भुजंग फेरा डाल रहा है। धर्म का सर्वनाश कर रहा है। 74 :: सम्भाजी

धर्म का उद्धार करने धरती पर। जग त्राता ने अवतार लिया है। होने दो जयनाद शिवा दुन्दुभि का।।। चार उस रात युवराज कुछ जल्दी बिस्तर में चले गये थे। महल के चारों ओर घना अँधेरा छाया था। शृंगारपुर मानो सामने के पहाड़ों को तकिया बनाकर सोया था। बगल के घने पेड़ों से रह-रहकर लाल किरणें दिखाई पड़ती थीं। इससे पहरेदारों के हाथों की मशालें लहराने का आभास होता था। ऐसा लगता था जैसे जंगल में बैताल की पालकी चल रही है। थोड़े ही समय में महल के बाहर एक साँड़नी सवार कुछ घुड़सवारों के साथ आकर रुके। अचानक आये मेहमानों और दरवाजे पर बैठे कर्मचारियों के बीच धीमी आवाज में कुछ बात चल रही थी। उनके ठीक बाद कवि कलश का घोड़ा आकर रुका। कविराज ऊपर कमरे में पहुँचे उसके पहले ही युवराज ने वस्त्र धारण कर लिए। घर में रखी कौड़ियों की माला पहन ली और अपने वस्त्राभूषण ठीक करते हुए द्वार पर आ पहुँचे। वहाँ तेज दीपकों के प्रकाश में चार पाँच लोग बैठे थे, सफेद दाढ़ी वाला लगभग पचास वर्ष का एक मुसलमान युवराज की प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी प्रत्येक गतिविधि पर कवि कलश अपनी सूक्ष्म दृष्टि टिकाए हुए थे। युवराज द्वार पर उपस्थित हुए तो सभी लोग उठकर खड़े हो गये। सभी ने युवराज का अभिवादन किया। संभाजी राजा ने बैठते हुए कवि कलश से आँखों के संकेत से पूछा। कविराज ने संकोच में कहा, "दिलेरखान के यहाँ से एक लिफाफा आया है।" कवि कलश की बात सुनकर शम्भुराजा ने एक गहरी साँस छोड़ी। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वे चुपचाप बैठे रहे। दिलेरखान कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था। गंगा यमुना से लेकर भीमा कावेरी तक अनेक नदियों का पानी पिया हुआ साठ साल का अनुभवी बुड्ढा था। इस प्रकार का कुशल सरदार दो वर्ष पूर्व दक्षिण का सूबेदार बनकर आया था। तभी से वह संभाजी राजा से मित्रता करने का प्रयास कर रहा था। शम्भुराजा ने कौड़ियों की माला हाथ में लेकर मन में ही मन्त्र का जाप किया। सम्भाजी 75

उन्होंने दिलेरखान द्वारा दी गयी लिफाफे की थैली खोलकर देखी। अन्य लोग कमरे से निकलकर बाहर चले गये। शम्भूराजा ने कवि कलश को लिफाफा देकर पढ़ने के लिए कहा। कविराज की नजर उस सुन्दर हस्तलेख पर घूमने लगी। "राजाधिराज, शेरसमशेर, संभाजी राजा भोसले।" कोई व्यक्ति जब मित्रता के लिए अपना हाथ बढ़ाता है तो उसके मन का शत्रुता वाला ग्रंथिजाल जलकर खाक हो जाता है। यह बात हम आप जैसे शायर मराठा शहजादे को हम क्या समझाएँगे। किन्तु आप भी इस बात को गाँठ बाँध लीजिएगा कि कमल के सुन्दर फूल केवल तालाब में ही खिलते हैं। शेर का बच्चा जंगल में ही शोभा पाता है। इस सम्बन्ध में हम आपसे सवाल करना चाहते हैं कि मराठी राज्य के योग्य शहजादे होते हुए भी श्रृंगारपुर की अँधेरी गुफा में अपने को बन्द करके आप क्यों बैठे हैं? "रायगढ़ के अपने हक से वंचित होकर आप विस्थापित हैं। शेर शिवाजी जैसे पिता के होने पर भी आप प्यार के लिए यतीम हो गये हैं। आपके दिल की धड़कन हम जान गये हैं। आजतक आपने मुसलमानों की सिर्फ दुश्मनी के बारे में सुना होगा, दोस्ती के बारे में नहीं। हमारी दोस्ती की कोशिश को ठुकराना नहीं। आप पर जो तकलीफ आये मुझे सूचित करना, हमें आधी रात को जगा देना। उम्र और तजुर्बे की परवाह किये बिना यह बन्दा आपकी सेवा में हाजिर हो जाएगा।" कवि कलश का चेहरा उतर गया। उनसे पत्र का अगला भाग पढ़ा नहीं जा रहा था। शम्भूराजा मन ही-मन मुस्करा रहे थे। स्वयं को रोकने का प्रयास कर रहे थे। किन्तु पानी के बाँध की तरह उनकी हँसी बेकाबू हो गयी। वे पेट पकड़कर हाः हाः करके हँसने लगे। दुष्ट और अनोखा सूबेदार शेर शिवाजी के पुत्र को ही प्यार मुहब्बत का न्योता दे रहा है। इसकी कल्पना ही कितनी उपहासास्पद है। युवराज के साथ ही कवि कलश भी जोर जोर से हँसने लगे। येसूबाई दौड़ते हुए आकर दरवाजे के पास खड़ी हो गयीं। पत्र के सन्देश से पूरे महल में एक अप्रिय सन्नाटा फैल गया। पत्र का उत्तर पाने के लिए दिलेरखान के दूत महल के बाहर रुके हुए थे। दूसरे दिन दोपहर हो गयी। दिलेरखान के दूतों से श्रृंगारपुर की तेज गर्मी सहन नहीं हो रही थी। उन्होंने शम्भूराजा से बार बार पूछना शुरू किया। तब युवराज दूत पर बरसते हुए बोले, "जाओ और अपने दिलेरखान से कहो कि छत से गिरे पानी का वापस छत पर चढ़ना जितना असम्भव है, नदी का सागर की बाँहों में समाने के बदले साँप की तरह उद्गम की ओर जाना जितना असम्भव है, उतना ही किसी मुसलमान सूबेदार के लिए शिवाजी महाराज के पुत्र से मित्रता की इच्छा 76 :. सम्भाजी

करना। यह मूर्खता की नहीं महामूर्खता का लक्षण है।'' पाँच युवराज-युवराज्ञी को लेकर पालकियाँ संगमेश्वर के नावड़ी बन्दगाह पर उतर गयी थीं। शम्भुराजा दूर तक फैली हुई छोटी सी खाड़ी की चमकती धारा को देख रहे थे। सन्ध्या समय वहाँ के ताड़वन में पवन ने अपना नृत्य आरम्भ कर दिया था। पश्चिम दिशा का अरुणाभ आकाश समुद्र के दर्पण में उतर आया था। इस सन्ध्या बेला में मछुवारों की छोटी-छोटी नौकाएँ लहरों पर मंथर गति से डोल रही थीं। कोली स्त्रियाँ नौ गज की साड़ी कुछ ऊपर पहने, पूरे गले में मनियों की माला पहने, बालों में जंगली फूलों को सजाये आनन्द से थिरक रही थीं। सिर पर छोटी लाल टोपी पहने या रूमाल बाँधे, घुटनों तक लुंगियाँ पहने कोली नाव की लकड़ी पर ताल से नाच रहे थे। चलाओ रे नैया, चलाओ मुरारी सागर तट थिरक रही नैया हमारी छोड़ युवराज को श्रृंगारपुर नगर में? गये क्यों महाराज दक्षिण नगर में हमको बताओ हे भगवान मल्हारी। इस गीत के कानों में पड़ते ही शम्भुराजा ने हँसते हुए येसूबाई और कवि कलश की ओर देखा। संगमेश्वर नगर ने संभाजी राजा के मन पर जादू का असर किया था। वरुणा और अलकनन्दा नदी के संगम पर बसी यह प्राचीन नगरी युवराज को बहुत अच्छी लगी। किसी समय इस नगर का नाम रामक्षेत्र था। कर्ण नामक चालुक्य राजा के शासनकाल में इस छोटे से नगर में लगभग तीन सौ नये मन्दिर और तालाब बनाये गये। शहर के चारों ओर एक प्राचीर बनाई गयी थी। शिवाजी महाराज से पहले बीजापुर के आदिलशाह का एक सूबेदार यहाँ रहता था। किन्तु जैसे जैसे हिन्दुओं का स्वराज्य बढ़ने लगा। वैसे वैसे अम्बा घाट उतरकर कोंकण में आने की आदिलशाही की हिम्मत टूटती गयी। ग०,० ३

शम्भुराजा ने कर्णेश्वर मन्दिर में सपत्नीक जाकर दर्शन किया। युवराज ने नगर की बगल में एक कुछ ऊँची जगह देखी। इसके चारों ओर सुपारी और नारियल के पेड़ थे। पीछे ही ओर पास ही कल कल निनादनी नदी थी। चारों ओर पहरेदारों की तरह खड़े घने वृक्षों से घिरी यह हरी पहाड़ी थी। शम्भुराजा ने कहा, "कविराज, यह जगह मुझे बहुत पसन्द आयी है। यहीं पर हमारे लिए एक सुन्दर सा घर बनवाइए। यहाँ पर प्रकृति का साहचर्य मिलेगा साथ ही गोवा और कोल्हापुर से आने वाले रास्ते की अच्छी निगरानी भी रख सकेंगे।" रात्रि भोजन के लिए युवराज को शृंगारपुर के महल में वापस जाना था। इसके लिए शम्भुराजा और येसूबाई ने पालकियों को छोड़कर मजबूत कद काठी वाले अरबी घोड़ों पर सवारी की। युवराज ने घोड़े की लगाम खींचकर शृंगारपुर की ओर दौड़ाया। उस समय अगल बगल ताड़वृक्षों से घिरी घाटियों और खाइयों में अँधेरा उतर रहा था। झरनों और नालों के बीच से राह दिखाने वाले मशालची आगे-पीछे दौड़ने लगे। शम्भुराजा नगर की सीमा पार कर रहे थे, उसी समय अचानक दो तीन सौ किसानों और कोलियों का झुंड युवराज के रास्ते में आकर खड़ा हो गया। तभी संगमेश्वर में नियुक्त पहरेदारों ने 'चलो ! पीछे चलो, पीछे हटो।' कहकर उन्हें ढकेलना आरम्भ किया। किन्तु उसी समय 'ओ युवराज, ओ मालिक, ओ माई बाप, थोड़ा रुक जाओ' ऐसी चीख युवराज के कानों में पड़ी। इस व्याकुल और आर्त चीख को सुनते ही युवराज ने अपने घोड़े की लगाम खींचकर उसे पीछे की ओर घुमाया। युवराज को रुकता देखकर, पहरेदारों के बिना कोई चिन्ता किये, उन गरीब श्रमजीवियों ने चीखना-चिल्लाना शुरू किया- "माई बाप, सरकार हमको बचाओ।" संभाजी राजा को किसी गम्भीर प्रसंग की आशंका हुई। वे घोड़े से उतर गये। उनके पीछे कवि कलश भी घोड़े से उतरे। उन दोनों को किसानों ने घेर लिया। एक बूढ़ा किसान दहाड़ मारकर चिल्लाया- "माई बाप, सरकार, हम कैसे जियें ? ये जप्ती के हुकुमनामे देखिये।" "किसने भेजे हैं इन्हें ?" "देखिये सीधे रायगढ़ से आये हैं।" दुबले पतले दो तीन किसान एक साथ बोल पड़े। "कविराज देखिए तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है।" शम्भुराजा व्यग्र होकर बोले, "यहाँ प्रभावली की सूबेदारी महाराज ने मुझे दी है। ऐसी स्थिति में बिना मुझसे पूछे ये हुकुमनामे रायगढ़ से कैसे आये ?" 78 :: सम्भाजी

उन घबराये हुए किसानों के हाथ से कविराज ने हुकुमनामा लिया। वे धीमी आवाज में बोले, "बहुत सालों से लगान न भरने के कारण ये हुकुमनामे भेजे गये होंगे।" "किन्तु, उस पर हस्ताक्षर किसके हैं?" "राहुजी सोमनाथ के। अण्णाजी दत्तोपन्त के कहने पर ये हुकुमनामे भेजे गये हैं, ऐसा इसमें स्पष्ट उल्लेख है।" पीठ से पेट चिपके किसानों में भय की लहर पुनः उमड़ पड़ी। आठ दस लोगों ने शम्भूराजा और येसूबाई के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया। वे दहाड़ें मारकर शिकायत करने लगे—"हम भी क्या कर सकते हैं मालिक? पिछले छह- सात सालों में अनाज कुछ पैदा ही नहीं हुआ। कितने ही लोगों ने निराश होकर आत्महत्या कर ली। हम पर दया करो, माई-बाप हमें न्याय दो।" उन श्रमजीवियों के दुबले पतले निष्प्राण शरीर को देख लेने पर किसी दूसरे गवाह की आवश्यकता ही नहीं थी। फिर भी युवराज ने संगमेश्वर के थानेदार को पास बुलाया और किसानों की बदहाली की पक्की जाँच की। उन्होंने कविराज को तत्काल आदेश दिया—"कलशजी, इन सभी को लिखकर माफीनामा का हुक्म दे दो।" युवराज ने उसी जगह पर तत्काल न्याय व्यवस्था की। यह देखकर मेहनती कुनबी वहीं पर आनन्द से नाचने लगे। उन किसानों ने युवराज को बहुत बहुत आशीर्वाद दिया। युवराज की सेना पुनः श्रृंगारपुर की ओर चल पड़ी। रात में कवि कलश ने हल्के से संकेत करने वाले शब्दों में शम्भूराजा से कहा, "आपके हुक्म की तामील कल प्रातः ही कर दूँगा। माफीनामा कल ही विशेष दूत से संगमेश्वर भेज दूँगा। परन्तु राजन! आपकी कार्यवाही की एक प्रति सूचनार्थ रायगढ़ को भी भेज देता हूँ।" "हमारे हुक्मनामे के सम्बन्ध में कुछ सन्देह हो रहा है क्या?" गरम तवे पर तेल पड़ने से जैसे छनछनाहट की आवाज आती है, वैसे ही शम्भूराजा उखड़े— "कविराज! हम प्रभावली के बाकायदा सूबेदार हैं। अपने अधिकार से हम यह निर्णय ले सकते हैं और हिन्दवी स्वराज्य के युवराज हैं, खेत खड़ा किया गया धोखा नहीं हैं। किसी कारण से दुखी, लाचार और जरूरतमन्द प्रजा के लिए तत्काल निर्णय लेने का अधिकार युवराज के रूप में मुझे है।" कवि कलश धीरे-से हँसे, और उतने ही शान्त स्वर में बोले, "राजन! आपके अधिकार के सम्बन्ध में प्रश्न करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। किन्तु एक प्रिय मित्र के नाते मुझे यह अवश्य कहना पड़ेगा कि जहाँ राजा होता है वहाँ दरबार होता है। दरबार की दीवारें षड्यन्त्रकारी कारनामों से खोखली होती हैं, सम्भाजी :: 79

महत्त्वाकांक्षा की भूख मे बेचैन होती हैं। यह खेल बहुत पुराने जमाने से चला आ रहा है। आगे पीछे कोई समस्या न उत्पन्न हो इसलिए रायगढ दूत भेजकर सूचना दे देनी चाहिए, ऐसा मेरा विचार है। " छह आसमान मे उड़ने वाले सफेद बादलों की तरह दिन तेजी से गुजर रहे थे। श्रृंगारपुर की दिनचर्या मे कोई विशेष अन्तर नही आया था। इसी बीच एक दिन दोपहर के समय बालाजी आवजी चिटणीस की पालकी महल के दरवाजे पर आ पहुँची। पतले शरीर, गहरे गोरे रंग, मजबूत काठी वाले साठ वर्षीय बालाजी पालकी से उतरे। बीस वर्षीय तरुण की भाँति तेजी से महल की पचीस सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आये। बालाजी बीच के चौक पर आये तो येसूबाई ने सामने आकर उनका स्वागत किया। शम्भूराजा भी बालाजी के अचानक आगमन से चौंक गये। दोनो एक-दूसरे की बाँहों में समा गये। शम्भूराजा ने हँसते हुए पूछा, "बालाजी काका एकदम बिना सूचना के कैसे आ गये?" "शम्भूराजा! गढ़ पर अब मन नहीं लगता। महाराज का कर्नाटक गये कई महीने हो गये। सोचा कम से कम युवराज के ही साहचर्य मे दो दिन बिता लें।" स्वराज्य की स्थापना करते समय शिवाजी महाराज ने अपने आसपास बहुत से नर रत्नों का समूह एकत्र कर रखा था। उनमें से तानाजी बाजीप्रभु देशपांडे शिवा काशीद जैसे अनेक रत्न शहीद हो चुके थे। कुछ वृद्धावस्था के कारण समाप्त हो गये थे। इस समय राजदरबार में हबीरराव, येसाजी कंक हिरोजी फर्जन्द, अण्णाजी दत्तो, मोरोपन्त पिंगले, राहुजी सोमनाथ जैसे उँगलियों पर गिने जा सकने वाले लोग ही पुराने समय के बचे थे। उन्हीं मे बालाजी आवजी चिटणीस का समावेश था। चिटणीस खानदान का स्वराज्य की सेवा में प्रवेश एक दुर्घटना और योगायोग का परिणाम था। बालाजी के कर्मठ पिता आवजी हरि चित्रे जंजीरा के सिद्दी के यहाँ दीवान थे। मराठी प्रदेश पर भयानक अत्याचार करने के लिए सिद्दी कुख्यात था। किन्तु अपनी कार्यकुशलता और निष्ठा के कारण आवजी हरि सिद्दी के दीवान बने रहे। आवजी की दिनोंदिन बढ़ती समृद्धि और प्रगति से अनेक मुसलमान कर्मचारी ४० सम्भाजी

और सरदार स्वभावतः ईर्ष्या करने लगे थे। जेजुरी के खंडोबा आवजी हरि के पूज्य देवता थे। एक बार उनके सपने में मल्हारी मार्तंड के आने की घटना घटी। तभी अपनी सेवा के अनुशासन को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने बीमार मालिक के सामने नियमानुसार प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। अवकाश लेकर वे जेजुरी गये और खंडोबा की पूजा करके जंजीरा वापस लौट आये। इसके पश्चात् सिद्दी बाबशीखान की तबीयत और भी खराब हो गयी। आवजी हरि से ईर्ष्या करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को अच्छा अवसर मिल गया। उन्होंने षड्यन्त्र रचकर यह कहना शुरू किया कि आवजी ने जेजुरी जाकर मालिक पर कुछ जादू टोना किया है। वे एक ही बात दोहराते थे-‘आवजी ने सुल्तान पर भयानक जादू टोना किया है। वह राज्य को डुबाना चाहता है।‘' संयोग बाबशीखान मर गया। गद्दी पर कम उम्र का नया सिद्दी बैठा। कर्मचारियों ने उससे भी शिकायत करनी आरम्भ की कि आवजी ही सुल्तान की मृत्यु का कारण है। नये सिद्दी ने शिकायत को सच मान लिया। आवजी ने हाथ पैर जोड़कर सुल्तान से स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने की प्रार्थना की किन्तु सिद्दी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत नये सिद्दी ने जहर का प्याला आवजी के हाथ में देकर उसे पीने के लिए सख्त आदेश दिया। आवजी और उनके भाई खण्डोजी को बोरे में बाँधकर समुद्र में फेंक दिया गया। हब्शी लोगों ने आवजी हरि का घर लूट लिया। उन्होंने आवजी के बालाजी चिमणाजी और श्यामजी तीनों पुत्रों को गुलाम के बच्चे मानकर ईरान इराक में बेचने का निश्चय किया। एक रात आवजी की पत्नी रखमाबाई के भाग्य फूट गये। उस समय बालाजी केवल ग्यारह वर्ष के थे। अभागी माता के साथ तीनों बच्चे नाव पर चीख-चिल्ला रहे थे। भरे समुद्र और आसमान को देख देखकर भाग्य और भगवान से सहायता की प्रार्थना कर रहे थे। भाग्य का फेर था या कुछ और स्वयं प्रकृति ही उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़ी। नाव राजापुर के किनारे तक पहुँची थी तभी अचानक हवा उल्टी दिशा में बहने लगी। विवश होकर नाविकों को किनारे की ओर जाना पड़ा। यह योगायोग ही था कि रखमाबाई के भाई विसाजी शंकर राजापुर में व्यापार करते थे। वे ऐन मौके पर बहन की सहायता के लिए दौड़ पड़े। नाविकों और कर्मचारियों से बहुत-बहुत प्रार्थना करके और बहुत-सा धन उनकी झोली में डालकर विसाजी ने अपनी बहन और भांजों को मुक्त करा लिया। एक बार बालाजी ने अपने मोतियों जैसे सुन्दर अक्षरों में शिवाजी महाराज को एक पत्र लिखा-‘महाराज! हिन्दवी स्वराज्य के एक सिपाही के रूप में सेवा करने से मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।’ सम्भाजी :: 81

संयोग से शिवाजी महाराज कुछ समय बाद राजापुर की लड़ाई पर आये। उन्होंने एक जौहरी की भाँति हीरे को पहचाना। उन्होंने रखमाबाई से कहा कि वे बालाजी को स्वराज्य की सेवा में ले रहे हैं। अपने परिवार के साथ घटित हादसे से वे अभी तक उबर नहीं पायी थीं। उनके करुण रुदन से महाराज का हृदय द्रवित हो उठा। महाराज ने बालाजी की माता को अभयदान देते हुए कहा, ‘‘माताजी आपके तीन पुत्र हैं। मुझे आप अपना चौथा पुत्र मानिए। आपका सुपुत्र स्वराज्य की चिन्ता करेगा, मैं आपकी चिन्ता करूँगा।’’ अपनी ईमानदारी, परिश्रम और कार्य कौशल से बालाजी पन्त राजसत्ता की एक एक सीढ़ी चढ़ते ऊपर गये। स्वराज्य के ब्राह्मण प्रधानों के प्रच्छन्न विरोध की अनदेखी करके महाराज ने बालाजी को सचिव (चिटणीस) बना दिया और राज्य के सभी किलों और गढ़ों का कार्यभार उन्हें सौंप दिया। बालाजी पन्त ने प्रत्येक किले पर अपनी प्रभु जाति के योग्य और कर्मठ व्यक्तियों को नियुक्त किया। उन्हें महत्त्वपूर्ण पद दिये। अष्टप्रधानों में दो दल बन गये थे। एक ओर बालाजी आवजी चिटणीस तो दूसरी ओर अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त पिंगले थे। प्रभु और ब्राह्मण जाति में आश्चर्यजनक आन्तरिक बैर था। किन्तु शिवाजी महाराज के कठोर अनुशासन और निर्णायक दृष्टि के सम्मुख किसी की कुछ न चलती थी। बालाजी आवजी को शम्भुराजा से पहले से ही बहुत स्नेह था। शम्भुराजा मातृ विहीन पुत्र और बड़े महाराज हमेशा अपने राज-काज में व्यस्त रहते थे। ऐसी स्थिति में पहले राजगढ़ में और बाद में रायगढ़ में शम्भुराजा की हित चिन्ता करने वाले जो इने गिने लोग थे उनमें बालाजी आवजी एक थे। सागौन का वृक्ष जिस गति से बढ़ता है, शम्भुराजा भी उसी गति से दिनोंदिन हृष्ट-पुष्ट होते जा रहे थे। राज्याभिषेक के पूर्व बड़े महाराज ने रायगढ़ और स्थानीय राज्य का कार्यभार सँभालने के लिए कहा था। शम्भुराजा ने बड़े उत्साह और बड़ी कुशलता से चार वर्षों तक यह कार्य सफलतापूर्वक सँभाला। कर्नाटक की कोलार और चिक्कबालापुर की जागीर भी स्वयं सँभाली थी। आगे अथणी, रायबाग गोलकुंडा से लेकर हुबली, फोंडा और अकोला तक कर्नाटक और गोवा की सीमा तक धावा बोला था। कुतुब शाह के दीवान मादण्णा से मित्रता करके बहुत सा धन लूटकर रायगढ़ ले आये थे। शम्भुराजा के इस वीरता भरे उत्साह से बालाजी पन्त बहुत प्रभावित हुए थे। कुछ समय बाद बालाजी पन्त शम्भुराजा के साथ भोजन कर रहे थे। सुस्वादु भोजन से उनका मन बहुत प्रसन्न था। परन्तु भोजन करते-करते यकायक जैसे मुँह में कोई पत्थर का टुकड़ा आ गया। बालाजी ने क्रुद्ध स्वर में पूछा- ‘‘वह अघोरघट कपालिक कहाँ है?’’ 82 सम्भाजी

" 'कौन अघोरघट और कौन कापालिक ?' ' इस नये प्रसंग को लेकर बालाजी पन्त की मुद्रा अपना लुभावनापन छोड़कर क्रोधावेश में भयानक हो गयी। वे चिल्लाए- " 'जो हमेशा तुम पर अपना जादू चलाता है। जिसने अपनी पापी बुद्धि मे तुम्हें पागल बना दिया है। जो भैंसे की गीली पीठ पर सवारी करता है, जो काले जादू के काले-कारनामे करता है।' ' " 'मगर है कौन ?' ' " 'जो अघोरी कार्य के लिए बैतालों के झुंड बुलाता है।' ' संभाजी ने मुस्कराते हुए येसूबाई की ओर देखा। फिर दानों जोर से हँसने लगे। अपनी हँसी को रोकते हुए शम्भूराजा ने कहा, " 'औरों की तरह आपको भी संशय और ईर्ष्या के साँप ने डस लिया है क्या ? इसीलिए कविराज आपको पराये लगने लगे हैं क्या ?' ' " 'सच कहूँ युवराज ! इस सन्दर्भ में मैं अपने अष्टप्रधानों को जरा भी दोष नहीं देता। यह कलुष के रूप में शिवाजी महाराज के स्वराज्य में कलि प्रविष्ट हो गया है। यह पूरी तरह मच है। यदि ऐसा नहीं होता तो आपके जैसा कर्तव्यपरायण राजकुमार ने इतनी भयंकर चाल न चली होती।' ' " 'कैसी चाल ? बालाजी काका !' ' " 'किसी अच्छे व्यक्ति के बुरी संगति में पड़ने से बुराइयों का प्रभाव पड़ता ही है। इस श्रृंगारपुर के परिसर में मांस मच्छी खाने वाले, जादू-टोना करने वाले अधर्मी शाक्तपन्थियों ने उत्पात मचा रखा है। आप जैसा विद्वान युवराज उनका अन्धा शिकार हो जाय, यह बड़ा दुर्भाग्य है।' ' " 'बालाजी काका मनुष्य के आचरण की शुद्धता के लिए ही प्रत्येक धर्म और पथ प्रयत्न करते हैं। कालान्तर में लोग धर्म को वशवर्ती बनाकर अनुचित मार्ग को अपनाते हैं। किन्तु धर्म का विकृत रूप वास्तविक धर्म नहीं होता। यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि केवल शाक्त पन्थियों में ही सारी बुराइयाँ हैं और वैदिक धर्म इससे पूर्णतया मुक्त हैं।' ' शम्भूराजा ने आगे कहा, " 'शाक्त पंथ को हम कुछ अन्य नहीं समझते। वह तो वस्तुतः जगदम्बा की, शक्ति की ही पूजा है। उसमें हमारे भोसले खानदान की कुलदेवी तुलजा भवानी भी हैं। वे शस्त्रधारिणी और दुष्टों का नाश करने वाली हैं। उसे भोग लगता है तो उसी रक्त मांस का," बोलते-बोलते शम्भूराजा क्षणभर के लिए रुके फिर भरे हुए गले से बोले, " 'आज हमारा कोई अपराध न होने पर भी बहुतों की उपहास करने वाली दुष्ट दृष्टि हमें शाप देती है। बहुत से लोगों के द्वेष के, शाप के और उनकी गालियों के हम शिकार होते हैं। ऐसी दुष्ट प्रवृत्ति का सामना करने के लिए किसी शक्ति के आशीर्वाद और वरदान की आवश्यकता तो पड़ेगी ही, बालाजी काका।' ' सम्भाजी • 83

"शम्भूराजा ! बड़े महाराज ने ऐसा सहारा कहाँ ढूँढ़ा था ?" "आपके जैसे व्यक्ति को क्या बताएँ चिटणीस काका ?" शम्भूराजा आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोले, "गागाभट्ट से पिताजी ने अपना राज्याभिषेक करवाया था। किन्तु उसमें कुछ दोष रह गये थे, कुछ अपूर्णताएँ थीं। यह ध्यान में आने पर पिताजी ने फिर दुबारा निश्चल गिरि गोसावी से तान्त्रिक अभिषेक करवाया था। आप इस बात को भूल गये क्या? यहीं पर महाराज ने निश्चल गिरि के लिए आश्रम बनवाया था और उनके लिए हर प्रकार की सुविधा करके दी थी। आपको इसे नहीं भूलना चाहिए।" बालाजी कुछ नरम पड़े किन्तु तत्काल उन्होंने पूछा- "मुझे यह नहीं मालूम था कि तुम्हें राजा बनने की इतनी जल्दी पड़ी है।" "काका, आप यह क्या कह रहे हैं? अपने पिताजी राजगद्दी पर बैठे हैं तो राजपद के हम क्यों उतावले होंगे? इस तरह का आचरण करने वाले क्या हम आपको किसी सुल्तान या मुसलमान के दुष्ट शहजादे लग रहे हैं? "यदि ऐसा नहीं था तो वह महाभयंकर अभिषेक क्यों करवाये ?" "कौन सा ?" "वह कलशाभिषेक था क्या ?" आँखें सिकोड़ते हुए बालाजी ने पूछा। "हाँ, वह किया मैंने।" शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में कहा। "अरे यह क्या किया शम्भूराजा आपने ?" बालाजी आवजी व्याकुल हो गये। उनका चेहरा उतर गया। "क्या करते बालाजी काका ? कद काठी का मजबूत तगड़ा घोड़ा दौड़ते दौड़ते अचानक ठोकर लगने से मर कैसे जाता है ? हमारे महल के आगे पीछे हल्दी कुमकुम लगे नींबू, सुई से गुदे हुए भल्लातक, काली जादू टोने की गुड़ियाँ जैसी अशुभ वस्तुएँ कहाँ से आकर भरी पड़ी रहती हैं ?" "परन्तु इसके लिए कलशाभिषेक ?" बालाजी आवजी ने आँखें मटकायीं। "दूसरा करते भी क्या काका ? अन्तःपुर में, दरबार में घोड़ों के तबेलों में कहीं भी शान्ति नहीं, बहनोई गणोजी अलग नाराज। जिन्दगी को शर्मनाक बना देने वाली दरबारियों द्वारा की गयी बदनामी, व्यभिचार के गन्दे आरोप, मुझे हमेशा नीचा दिखाने की ताक में बैठे अष्टप्रधान और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह कि सारी दुनिया के लिए पहाड़ जैसा आधार देने वाले किन्तु मुझसे निरन्तर दूर होते जा रहे मेरे पिताजी, इन सारी परेशानियों का कटु अनुभव करते हुए सोचा एक बार शान्ति कर डालूँ।" "शान्ति ? इस प्रकार की शान्ति ?" बालाजी आवजी संकुचित हुए। उनकी पुतलियाँ तेजी से गोल-गोल घूमने लगीं। उनका गला भर आया। वे व्याकुल स्वर 84 : सम्भाजी

में चीखे- "इसका मतलब यह है युवराज कि जिन शिवाजी महाराज ने इस महाराष्ट्र का निर्माण किया उनको हमेशा के लिए शान्त करने को निकले हैं आप।" बालाजी पन्त ने जो निष्कर्ष निकाला था उसकी कल्पना मात्र से शम्भूराजा के प्राण सूख गये। ऐसा लगा जैसे किसी ने तेज छुरी उनके कलेजे में उतार दी। आसन से उठकर वे दरी पर बैठ गये और अत्यन्त भयभीत स्वर में बोले, "कितनी भयंकर बात कर रहें है काका आप? "युवराज! कलशाभिषेक फिर दूसरा अभिप्राय क्या है?" बालाजी पन्त दहाड़ें मारकर रोने जैसे स्वर में बोले, "एक राजा के गद्दी पर रहते दूसरा राजा उस गद्दी पर नहीं बैठ सकता। जिसको राजसत्ता प्राप्त करने की उतावली रहती है वही कलश जैसे धूर्त मात्रिकों को एकत्र करता है और तन्त्र-मन्त्र की अघोरी विद्या के बल पर जीवित राजा का नाश करता है। दिवंगत राजा के श्राद्ध के दिन ही नये राजा का सिंहासनाारोहण होता है। इसी के साथ कलशाभिषेक की पूर्णाहुति होती है। शास्त्रज्ञ पंडितों का ऐसा ही मानना है।" शम्भूराजा की आँखों में धारासार आँसू गिरने लगे। उन्होंने बालाजी से तत्काल पूछा, "कलशाभिषेक अनुष्ठान यह भयंकर आशय आपको किसने बताया?" "अजी अब बताना किसको रह गया है। रायगढ़ से लेकर पन्हालगढ़ तक हर जगह यह बात फैल गयी है। आपके इस भयंकर कृत्य का समाचार राज्य के कुछ कर्मचारियों ने महाराज के पास कर्नाटक भी भेजा है। अण्णाजी दत्तो और राहुजी सोमनाथ की शिष्यमंडली, उनके भांजे-भतीजे, स्वयं आपकी सौतेली माता सोयराबाई रानी सभी हर किसी से आपके इस कृत्य का वर्णन करते हैं। बच्चे बूढ़े सभी इस चर्चा में लिप्त हैं। बालाजी आवजी ने कपड़े से अपना चेहरा पोंछा। बालाजी के मुँह से निकले धक्का देने वाले प्रत्येक शब्द को सुनकर युवराज और युवराज्ञी दोनों आश्चर्यचकित रह गये। अपनी आँसुओं और रुलाई के वेग को रोकते हुए शम्भूराजा ने कहा, "जिन नीच और दुष्ट लोगों के विकृत मस्तिष्क से ऐसे विषैले विचार निकलते हैं, कल उनके मुँह में राख भरने में गधे भी पाप कर्म का अनुभव करेंगे। अच्छा हुआ, आपने इतनी दूर आकर हमें सावधान किया।" मरणासन्न, घायल मराठा सरदार की तरह शम्भूराजा नीचे गिर गये। जैसे किसी ने कलेजे पर गरम सरिया रख दिया हो। ऐसी पीड़ा से वे छटपटाये। "बालाजी काका! जिस जीजा माता ने मेरी माँ के मरने के बाद मुझे पाल पोस कर छोटे से बड़ा किया उसी जीजा माता के पुत्र की मृत्यु का सपना संभाजी देखता होगा; ऐसा आप सोच कैसे सकते हैं?" "नहीं-नहीं, एकदम असम्भव।" बालाजी पराजित स्वर में बोले। सम्भाजी · ४९

संभाजी का हृदय घायल हो चुका था। इसलिए बालाजी पन्त भी कुछ लज्जित हुए। मन की बात को स्पष्ट रूप से कह देना सब के साथ सठता और उदंड के साथ उद्दंडता करना, सज्जनों के साथ विनम्र होना संभाजी का स्वभाव था। उनके स्वभाव की वह विशेषता बालाजी पन्त को अच्छी तरह ज्ञात थी। इतना ही नहीं, संभाजी का सारा बचपन बालाजी के सामने गुजरा था। इसलिए वे संभाजी के साफ मन को अच्छी तरह ज्ञात थी। इतना ही नहीं, संभाजी का सारा बचपन बालाजी के सामने गुजरा था। इसलिए वे संभाजी के साफ मन को अच्छी तरह जानते थे। वे बोले, "नहीं युवराज! लोग आपको दोष नहीं देते। उनकी दृष्टि में आपका कवि कलश ही सारी दुरावस्था का कारण है।" "ऐसा बिलकुल नहीं है। इन अष्टप्रधानों और सरकारी अधिकारियों के लिए माध्यम कलश रहते किन्तु उनका निशाना मेरी ओर ही होता है। मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ कि इसे न पहचान सकूँ।" "जाने दो युवराज! इन अधिकारियों के आक्रमण अथवा व्यर्थ की बातों से आप कभी भी विचलित नहीं होना। आज भी स्वयं को उच्च वंश का ब्राह्मण समझने वाले और मराठा लोग शिवाजी महाराज को क्षत्रिय मानने के लिए तैयार नहीं हैं। इससे पहले ही उन्होंने महाराज के राज्याभिषेक का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से विरोध ही किया था। "मतलब?" संभाजी ने आश्चर्य के साथ पूछा। इन लोगों का कहना है कि परशुराम ने सारी धरती को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। धरती पर कोई क्षत्रिय नहीं बचा था तो फिर शिवाजी कैसे क्षत्रिय कुल के हो सकते हैं? जब इन महानुभावों ने इस प्रकार का विवाद खड़ा किया था तब यह सिद्ध करने के लिए कि शिवाजी महाराज मूल में राजस्थान सिसोदिया वंश के हैं, यही बालाजी आवजी चिट्रे राजस्थान गया था और सबूत जुटाकर ले आया था।" बालाजी ने संभाजी को यह विवरण दिया। "ऐसा है क्या? तो ये बातें अण्णाजी दत्तो को समझाओ न!" युवराज ने कहा। "अण्णाजी कार्यकुशल तो हैं ही। किन्तु कार्यकुशल होने पर भी उनकी प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मराठा और प्रभुजाति कोई भी क्षत्रिय नहीं है, ऐसा मानने वालों में अण्णाजी प्रमुख हैं। युवराज और युवराज्ञी के साथ बालाजी ने गम्भीर चर्चा की। शिवाजी महाराज के कर्नाटक से लौटने के पहले शम्भूराजा को अधिक से अधिक बदनाम करने की विरोधियों की योजना थी। इसीलिए उन्होंने कवि कलश का बड़ा भूत खड़ा किया था। उनका विश्वास था कि जितना कवि कलश बदनाम होंगे उतना संभाजी राजे भी बदनाम होंगे। विचारमग्न शम्भूराजा के गम्भीर चेहरे पर अचानक हँसी खिल उठी। ४६ सम्भाजी

उन्होंने बालाजी से पूछा—"काका, आपने पहले क्या कहा, कवि कलश बाघ की खाल पर बैठकर जादू टोना करते हैं?" "बाघ नहीं युवराज! भैंसे की गीली खाल पर बैठकर।" बालाजी आवजी के वाक्य पूरा होने के पहले ही युवराज जोर से हँस पड़े। उन्होंने कहा—"काका, मरे हुए चूहे की दुर्गन्ध से जिसकी धोती पीली हो जाती है उससे भैंसे की खाल की दुर्गन्ध कैसे सहन होगी?" "इनमें से कोई गया था क्या कवि कलश को देखने के लिए? इस प्रकार का भयंकर कार्य यदि हमारे कवि कलश करते तो गाय चराने वाले बच्चे भी उन्हें पत्थर मारते। आरोप लगाने वालों को क्या इतना भी नहीं समझ में आता?" "जाने दीजिए युवराज! इन सभी बातों का मतलब एक ही है। आपको बदनाम करने और अपयश देने के लिए रायगढ़ के आसपास बहुत से कारखाने रात दिन चल रहे हैं।" बालाजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा। पन्त दो दिन श्रृंगारपुर में रुके रहे। अनेक मुद्दों पर युवराज के साथ उनकी गम्भीर चर्चा हुई। उसी समय कुछ स्मरण करते हुए बालाजी ने कहा, "युवराज, आजकल आप राज्य का आर्थिक हित भूलते जा रहे हैं। कर डुबाने वाले श्रमजीवियों और किसानों को तत्काल माफीनामा लिखकर दे देते हैं। गुंडों का अभयदान देकर कर्तव्यपरायण कर्मचारियों को बार बार अपमानित करते हैं। राहुजी सोमनाथ ने इसी प्रकार शोर राजधानी में मचा रखा है।" "किस चीज का माफीनामा, बालाजी काका?" शम्भूराजा को संगमेश्वर के किसानों का प्रसंग स्मरण हो आया। वे दुखी होकर बोले, "वे नावड़ी के परिश्रमी लोग हैं। पिछले आठ वर्षों में अतिवृष्टि और बाढ़ के कारण वहाँ कोई फसल पैदा ही नहीं हुई। लिए कर्ज को चुकाने के लिए साहूकारों ने भी उन्हें सताया। ऐसी दुखी प्रजा के आँसू पोंछने का यदि मुझे अधिकार नहीं है तो हमारे इन हाथों को उखाड़कर फेंक देने में क्या बुराई है?" शम्भूराजा ने क्रोध के आवेश में पूछा। बालाजी पन्त रायगढ़ के लिए निकले तो उनके बिदा करते समय शम्भूराजा को बहुत दुख हुआ। वे अधीर स्वर में बोले, "बालाजी काका इस बदली हुई परिस्थिति का हमें सचमुच कोई अनुमान नहीं था। इन षड्यन्त्रकारियों ने मुझे अपने प्रिय पिता के साथ दक्षिण की लड़ाई में नहीं जाने दिया। युवराज होने पर भी रायगढ़ के किसी कोने में जगह नहीं दी। मुझ पर अभद्र आरोप लगाया कि मैंने अपने महल में पर स्त्री के साथ वसन्त पंचमी के दिन व्यभिचार किया। एक के बाद एक होने वाले आघातों से संभाजी कभी डगमगाया नहीं। परन्तु ।" बाढ़ के गहरे पानी में फँसी नाव की तरह शम्भूराजा की साँस अटक गयी। गरम आहें भरते हुए वे बोले "परन्तु बालाजी काका जब हमारे विरोधियों ने यह सम्भाजी 87

आरोप लगाया कि राजगद्दी के लोभ में मैं अपने जन्मदाता शिवाजी महाराज जैसे युग प्रर्वतक पिता की जान का दुश्मन बन गया तो मेरे हृदय के टुकड़े टुकड़े हो गये। " " रहने दें युवराज, आप शान्त रहें।" "पिताजी की जान लेने का नीच विचार तो छोड़ ही दें, किन्तु कभी समय आने पर पिताजी के सपनों के लिए, उनके राष्ट्रधर्म के लिए और भगवान के लिए यह संभाजी अपने शरीर के फूल को काल की खाई में चढ़ाये बिना नहीं रहेगा। सात बड़े महाराज की याद आ गयी। याद आते ही शम्भूराजा की आँखों के सामने दुर्गम रायगढ़ आडा तिरछा खड़ा हो गया। वे गहरी साँस लेकर बोले "युवराज्ञी, कितना विचित्र है यह मानव स्वभाव ? समय के साथ लोग किस तरह बदल जाते हैं ? इसी रायगढ़ ने यह दृश्य भी देखा है जब युवराज के साथ खेलते हुए माता सोयराबाई बच्चों से भी बच्चा बन जाती थी। कभी कभी शम्भूराजा के लिए सोयराबाई जीजा माता से भी झगड़ पड़ती थीं। किन्तु ..।" "किन्तु क्या?" • "जब से राजमहल में राजाराम का रोना सुना तब से राजमहल की दीवारों का रंग बदल गया। "युवराज, मुझे तो ससुरजी साहब के राज्याभिषेक का वह भव्य समारोह याद आता है, जब ससुर जी ने आपको हिन्दवी स्वराज्य के युवराज अर्थात् भविष्य के उत्तराधिकारी के रूप में सम्मानित किया था। तब पटरानी के रूप में वहाँ बैठी थीं तब बुवा साहब ने कोई रुकावट पैदा नहीं की थी। "युवराज्ञी, आपने अच्छा स्मरण दिलाया।" वह प्रसंग अपनी आँखों के आगे प्रत्यक्ष करते हुए शम्भूराजा बोले, "आप कहें तो मैं सौगन्धपूर्वक कह सकता हूँ कि राज्याभिषेक के उस समारोह के बाद हमारी इन माताजी ने कभी भी पहले की तरह दिल खोलकर हँसी या बोलीं हों ऐसा मुझे स्मरण नहीं है।" येसूबाई ने युवराज की हथेली पर अपनी कोमल उँगलियों को घुमाते हुए और युवराज को धीरज बँधाते हुए कहा, "आप इस तरह निराश और रुष्ट क्यों होते ४४ सम्भाजी

हैं? जो ससुरजी मेरी जैसी पराये घर की लड़की को इतना प्यार देते हैं वे आप जैसे अपने होनहार पुत्र को कैसे भूल सकते हैं?'' "नहीं येसू, इस शम्भू के लिए अपने पिता के राज्य में न्याय नहीं है। उल्टे यह राज्य के बहुत से लोग उसके चेहरे पर कलंक के काले दाग लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। हमारे शत्रु मुझे एक दुष्ट, मद्यप, उदंड, अहंकारी युवराज सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं।" "युवराज भगवान पर भरोसा रखें।" "हम बहुत से देवी-देवताओं की पूजा रोज करते हैं किन्तु सच्चे मन से शिवाजी महाराज नामक देवता के अतिरिक्त संभाजी ने न किसी देवता को अपने हृदय के मन्दिर में बिठाया और न ही पूजा की। उन्हें एक विशाल वटवृक्ष मानकर हम उनकी छाया के लिए व्यग्र हैं। किन्तु कुछ विरोधी शक्तियाँ इस महावृक्ष को मेरी जिन्दगी से दूर ले जाकर, मुझे जड़ से उखाड़ देने का प्रयास कर रही हैं।" कोमल बिछौने पर भी शम्भुराजा को चैन की नींद नहीं आ रही थी। उनका जागना, मछली की तरह तड़पना, गरम और गहरी साँसें लेना आदि येसूबाई निकट से अनुभव कर रही थीं। उन्होंने धीरे से कहा- "युवराज, राज्य के इन अधिकारियों ने भी स्वराज्य का निर्माण करने के लिए अपने जीवन को समर्पित किया है। आप स्वयं उनके साथ बात क्यों नहीं करते? आप स्वयं जाकर अण्णाजी से क्यों नहीं मिलते?'' "क्या करेंगे उनसे मिलकर? उस अभागी हंसा ने आत्महत्या की और उसका सारा दोष मुझ पर लगाया गया। उसी समय वह गोदू आयी, वह अण्णाजी के साढ़ू की लड़की निकली। यहाँ सारी परिस्थिति ने ही ऐसा विचित्र मोड़ लिया है कि समझदारी अँधेरे में अपना मुँह छुपा रही है।" पुरानी पीड़ादायक स्मृतियाँ शम्भुराजा का पीछा नहीं छोड़ रही थीं। युवराज और युवराज्ञी सारी रात जागते रहे। दूसरे दिन शम्भुराजा कुछ विलम्ब से बैठक में गये। कवि कलश पहले से ही उनकी प्रतीक्षा में वहाँ खड़े थे। उनके साथ संगमेश्वर का थानेदार भी खड़ा था। सवेरे-सवेरे देर तक दौड़कर आने के कारण वह पसीने से तर हो रहा था। वह युवराज से मिलने के लिए उपस्थित हुआ था। शम्भुराजा उससे कुछ पूछें उससे पहले वही विनम्र शब्दों में निवेदन करने लगा- "युवराज! सब कुछ गड़बड़-घोटाला हो गया है। कल रायगढ़ से एक सेना की टुकड़ी आयी। सैनिकों ने गरीब किसानों के बर्तन-भाँड़े जब्त कर लिये। दूध देने वाली गायों और भैंसों को भी सरकारी क़ब्ज़े में ले लिया।" सम्भाजी . ४१

"जप्ती! मगर किस लिए?" आश्चर्यचकित शम्भूराजा ने कवि कलश की ओर देखा। कविराज भी क्रुद्ध मुद्रा में नजरें झुकाए नीचे की ओर देख रहे थे। शम्भूराजा के मस्तिष्क में बात कौंधी। उन्होंने दाँत पीसते हुए कहा, "मैंने गरीब और मेहनती प्रजा को माफीनामा लिखकर दिया सम्भवतः इसीलिए इन बेचारे पर यह विपत्ति आयी है।" "हाँ! हाँ सरकार।" थानेदार डरते हुए बोला, "मैंने उनको बहुत समझाया, उनसे कहा कि यह निर्णय स्वयं युवराज ने लिया है और किसानों की हालत वास्तव में बहुत खराब है। मगर उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे बोले बोले " "बताओ, बताओ, कुछ भी छुपाओ नहीं, साफ साफ बोलो।" "उनका कहना है मतलब सैन टुकड़ी के साथ आया हुआ राहुजी सोमनाथ का कार्य व्यापार सँभालने वाला कह रहा था कि शम्भूराजा अभी तो गद्दी पर बैठे नहीं हैं जब बैठेंगे तब कर लेना मुजरा।" "रुक क्यों गये? बोलो बोलो !" "वे कर्मचारी कहते थे कि यहाँ महाराज के जाने के बाद युवराज का हुक्म चलाना था तो महाराज ने कर्नाटक जाते समय रायगढ़ का कार्यभाग शम्भूराजा को न दिया होता? उन्हें कंकड की तरह अलग करके शृंगारपुर के जंगलों में थोडे ही फेका होता?" थानेदार किसी प्रकार घटित घटना का विवरण देकर मुक्त हो गया। शम्भूराजा की मुख मुद्रा वेदनायुक्त और सम्भ्रमित बनी रही। किन्तु येसूबाई और कवि कलश के चेहरे उतर गये थे। युवराज के अपमान से दोनों बहुत क्रुद्ध हो गये थे। शम्भूराजा कुछ अधिक नहीं कह पाये। उन्होंने धीमी किन्तु कठोर आवाज में कवि कलश से कहा, "कविराज साथ में एक हजार सैनिक ले लो और इसी वक्त संगमेश्वर की ओर कूच करो। राहुजी सोमनाथ के कार्यभागी के साथ रायगढ़ के उन हृदयहीन गुंडों को गिरफ्तार करके यहाँ लेकर आओ और शृंगारपुर के कारागार में बन्द कर दो।" उसी दिन सूर्यास्त के पूर्व ही कवि कलश ने अपने मालिक के हुक्म की तामील कर दी। जब कविराज ने शम्भूराजा को आकर अभिवादन किया तो युवराज ने कहा "उन बदमाशों को चार दिन तक भूखे प्यासे रखो। उनको खूब पीटो।" शम्भूराजा की इस कार्यवाही से शृंगारपुर उनकी ख्याति फैल गयी। इससे पहले जावली प्रान्त के सूबेदार स्वयं अण्णाजी दत्तो ही थे। उनके कार्यकाल में वसूली करने वाले कर्मचारियों ने अनेक स्थानों पर अकारण किसानों को सताना आरम्भ कर दिया था। ऐसे लोगों को सबक सिखाने वाला कोई मिला था, इसलिए प्रभावली प्रान्त के परिश्रमी किसान बहुत प्रसन्न थे। ९० सम्भाजी

रात को शम्भुराजा ने येसूबाई से कहा, "येसू परसों बालाजी काका चिटणीम जो बताकर गये उसमें कुछ भी झूठ नहीं था। हवा का रुख बदल रहा है।" येसूबाई ने अपने सात महीने के पेट पर शम्भुराजा का हाथ रखा। वे भरे गले से बोलीं, "युवराज! हवा के इस रुख से हमें अकारण ही भय लग रहा है। इसलिए थोड़ा धीरज रखें। मसूरजी के कर्नाटक से वापस आ जाने तक कोई भी साहसी कदम न उठाइए।"

सम्भाजी १७ |