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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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उन्होंने बालाजी से पूछा—"काका, आपने पहले क्या कहा, कवि कलश बाघ की खाल पर बैठकर जादू टोना करते हैं?" "बाघ नहीं युवराज! भैंसे की गीली खाल पर बैठकर।" बालाजी आवजी के वाक्य पूरा होने के पहले ही युवराज जोर से हँस पड़े। उन्होंने कहा—"काका, मरे हुए चूहे की दुर्गन्ध से जिसकी धोती पीली हो जाती है उससे भैंसे की खाल की दुर्गन्ध कैसे सहन होगी?" "इनमें से कोई गया था क्या कवि कलश को देखने के लिए? इस प्रकार का भयंकर कार्य यदि हमारे कवि कलश करते तो गाय चराने वाले बच्चे भी उन्हें पत्थर मारते। आरोप लगाने वालों को क्या इतना भी नहीं समझ में आता?" "जाने दीजिए युवराज! इन सभी बातों का मतलब एक ही है। आपको बदनाम करने और अपयश देने के लिए रायगढ़ के आसपास बहुत से कारखाने रात दिन चल रहे हैं।" बालाजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा। पन्त दो दिन श्रृंगारपुर में रुके रहे। अनेक मुद्दों पर युवराज के साथ उनकी गम्भीर चर्चा हुई। उसी समय कुछ स्मरण करते हुए बालाजी ने कहा, "युवराज, आजकल आप राज्य का आर्थिक हित भूलते जा रहे हैं। कर डुबाने वाले श्रमजीवियों और किसानों को तत्काल माफीनामा लिखकर दे देते हैं। गुंडों का अभयदान देकर कर्तव्यपरायण कर्मचारियों को बार बार अपमानित करते हैं। राहुजी सोमनाथ ने इसी प्रकार शोर राजधानी में मचा रखा है।" "किस चीज का माफीनामा, बालाजी काका?" शम्भूराजा को संगमेश्वर के किसानों का प्रसंग स्मरण हो आया। वे दुखी होकर बोले, "वे नावड़ी के परिश्रमी लोग हैं। पिछले आठ वर्षों में अतिवृष्टि और बाढ़ के कारण वहाँ कोई फसल पैदा ही नहीं हुई। लिए कर्ज को चुकाने के लिए साहूकारों ने भी उन्हें सताया। ऐसी दुखी प्रजा के आँसू पोंछने का यदि मुझे अधिकार नहीं है तो हमारे इन हाथों को उखाड़कर फेंक देने में क्या बुराई है?" शम्भूराजा ने क्रोध के आवेश में पूछा। बालाजी पन्त रायगढ़ के लिए निकले तो उनके बिदा करते समय शम्भूराजा को बहुत दुख हुआ। वे अधीर स्वर में बोले, "बालाजी काका इस बदली हुई परिस्थिति का हमें सचमुच कोई अनुमान नहीं था। इन षड्यन्त्रकारियों ने मुझे अपने प्रिय पिता के साथ दक्षिण की लड़ाई में नहीं जाने दिया। युवराज होने पर भी रायगढ़ के किसी कोने में जगह नहीं दी। मुझ पर अभद्र आरोप लगाया कि मैंने अपने महल में पर स्त्री के साथ वसन्त पंचमी के दिन व्यभिचार किया। एक के बाद एक होने वाले आघातों से संभाजी कभी डगमगाया नहीं। परन्तु ।" बाढ़ के गहरे पानी में फँसी नाव की तरह शम्भूराजा की साँस अटक गयी। गरम आहें भरते हुए वे बोले "परन्तु बालाजी काका जब हमारे विरोधियों ने यह सम्भाजी 87