छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंभाजी का हृदय घायल हो चुका था। इसलिए बालाजी पन्त भी कुछ लज्जित हुए। मन की बात को स्पष्ट रूप से कह देना सब के साथ सठता और उदंड के साथ उद्दंडता करना, सज्जनों के साथ विनम्र होना संभाजी का स्वभाव था। उनके स्वभाव की वह विशेषता बालाजी पन्त को अच्छी तरह ज्ञात थी। इतना ही नहीं, संभाजी का सारा बचपन बालाजी के सामने गुजरा था। इसलिए वे संभाजी के साफ मन को अच्छी तरह ज्ञात थी। इतना ही नहीं, संभाजी का सारा बचपन बालाजी के सामने गुजरा था। इसलिए वे संभाजी के साफ मन को अच्छी तरह जानते थे। वे बोले, "नहीं युवराज! लोग आपको दोष नहीं देते। उनकी दृष्टि में आपका कवि कलश ही सारी दुरावस्था का कारण है।" "ऐसा बिलकुल नहीं है। इन अष्टप्रधानों और सरकारी अधिकारियों के लिए माध्यम कलश रहते किन्तु उनका निशाना मेरी ओर ही होता है। मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ कि इसे न पहचान सकूँ।" "जाने दो युवराज! इन अधिकारियों के आक्रमण अथवा व्यर्थ की बातों से आप कभी भी विचलित नहीं होना। आज भी स्वयं को उच्च वंश का ब्राह्मण समझने वाले और मराठा लोग शिवाजी महाराज को क्षत्रिय मानने के लिए तैयार नहीं हैं। इससे पहले ही उन्होंने महाराज के राज्याभिषेक का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से विरोध ही किया था। "मतलब?" संभाजी ने आश्चर्य के साथ पूछा। इन लोगों का कहना है कि परशुराम ने सारी धरती को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। धरती पर कोई क्षत्रिय नहीं बचा था तो फिर शिवाजी कैसे क्षत्रिय कुल के हो सकते हैं? जब इन महानुभावों ने इस प्रकार का विवाद खड़ा किया था तब यह सिद्ध करने के लिए कि शिवाजी महाराज मूल में राजस्थान सिसोदिया वंश के हैं, यही बालाजी आवजी चिट्रे राजस्थान गया था और सबूत जुटाकर ले आया था।" बालाजी ने संभाजी को यह विवरण दिया। "ऐसा है क्या? तो ये बातें अण्णाजी दत्तो को समझाओ न!" युवराज ने कहा। "अण्णाजी कार्यकुशल तो हैं ही। किन्तु कार्यकुशल होने पर भी उनकी प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मराठा और प्रभुजाति कोई भी क्षत्रिय नहीं है, ऐसा मानने वालों में अण्णाजी प्रमुख हैं। युवराज और युवराज्ञी के साथ बालाजी ने गम्भीर चर्चा की। शिवाजी महाराज के कर्नाटक से लौटने के पहले शम्भूराजा को अधिक से अधिक बदनाम करने की विरोधियों की योजना थी। इसीलिए उन्होंने कवि कलश का बड़ा भूत खड़ा किया था। उनका विश्वास था कि जितना कवि कलश बदनाम होंगे उतना संभाजी राजे भी बदनाम होंगे। विचारमग्न शम्भूराजा के गम्भीर चेहरे पर अचानक हँसी खिल उठी। ४६ सम्भाजी