छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरना। यह मूर्खता की नहीं महामूर्खता का लक्षण है।'' पाँच युवराज-युवराज्ञी को लेकर पालकियाँ संगमेश्वर के नावड़ी बन्दगाह पर उतर गयी थीं। शम्भुराजा दूर तक फैली हुई छोटी सी खाड़ी की चमकती धारा को देख रहे थे। सन्ध्या समय वहाँ के ताड़वन में पवन ने अपना नृत्य आरम्भ कर दिया था। पश्चिम दिशा का अरुणाभ आकाश समुद्र के दर्पण में उतर आया था। इस सन्ध्या बेला में मछुवारों की छोटी-छोटी नौकाएँ लहरों पर मंथर गति से डोल रही थीं। कोली स्त्रियाँ नौ गज की साड़ी कुछ ऊपर पहने, पूरे गले में मनियों की माला पहने, बालों में जंगली फूलों को सजाये आनन्द से थिरक रही थीं। सिर पर छोटी लाल टोपी पहने या रूमाल बाँधे, घुटनों तक लुंगियाँ पहने कोली नाव की लकड़ी पर ताल से नाच रहे थे। चलाओ रे नैया, चलाओ मुरारी सागर तट थिरक रही नैया हमारी छोड़ युवराज को श्रृंगारपुर नगर में? गये क्यों महाराज दक्षिण नगर में हमको बताओ हे भगवान मल्हारी। इस गीत के कानों में पड़ते ही शम्भुराजा ने हँसते हुए येसूबाई और कवि कलश की ओर देखा। संगमेश्वर नगर ने संभाजी राजा के मन पर जादू का असर किया था। वरुणा और अलकनन्दा नदी के संगम पर बसी यह प्राचीन नगरी युवराज को बहुत अच्छी लगी। किसी समय इस नगर का नाम रामक्षेत्र था। कर्ण नामक चालुक्य राजा के शासनकाल में इस छोटे से नगर में लगभग तीन सौ नये मन्दिर और तालाब बनाये गये। शहर के चारों ओर एक प्राचीर बनाई गयी थी। शिवाजी महाराज से पहले बीजापुर के आदिलशाह का एक सूबेदार यहाँ रहता था। किन्तु जैसे जैसे हिन्दुओं का स्वराज्य बढ़ने लगा। वैसे वैसे अम्बा घाट उतरकर कोंकण में आने की आदिलशाही की हिम्मत टूटती गयी। ग०,० ३