छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन घबराये हुए किसानों के हाथ से कविराज ने हुकुमनामा लिया। वे धीमी आवाज में बोले, "बहुत सालों से लगान न भरने के कारण ये हुकुमनामे भेजे गये होंगे।" "किन्तु, उस पर हस्ताक्षर किसके हैं?" "राहुजी सोमनाथ के। अण्णाजी दत्तोपन्त के कहने पर ये हुकुमनामे भेजे गये हैं, ऐसा इसमें स्पष्ट उल्लेख है।" पीठ से पेट चिपके किसानों में भय की लहर पुनः उमड़ पड़ी। आठ दस लोगों ने शम्भूराजा और येसूबाई के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया। वे दहाड़ें मारकर शिकायत करने लगे—"हम भी क्या कर सकते हैं मालिक? पिछले छह- सात सालों में अनाज कुछ पैदा ही नहीं हुआ। कितने ही लोगों ने निराश होकर आत्महत्या कर ली। हम पर दया करो, माई-बाप हमें न्याय दो।" उन श्रमजीवियों के दुबले पतले निष्प्राण शरीर को देख लेने पर किसी दूसरे गवाह की आवश्यकता ही नहीं थी। फिर भी युवराज ने संगमेश्वर के थानेदार को पास बुलाया और किसानों की बदहाली की पक्की जाँच की। उन्होंने कविराज को तत्काल आदेश दिया—"कलशजी, इन सभी को लिखकर माफीनामा का हुक्म दे दो।" युवराज ने उसी जगह पर तत्काल न्याय व्यवस्था की। यह देखकर मेहनती कुनबी वहीं पर आनन्द से नाचने लगे। उन किसानों ने युवराज को बहुत बहुत आशीर्वाद दिया। युवराज की सेना पुनः श्रृंगारपुर की ओर चल पड़ी। रात में कवि कलश ने हल्के से संकेत करने वाले शब्दों में शम्भूराजा से कहा, "आपके हुक्म की तामील कल प्रातः ही कर दूँगा। माफीनामा कल ही विशेष दूत से संगमेश्वर भेज दूँगा। परन्तु राजन! आपकी कार्यवाही की एक प्रति सूचनार्थ रायगढ़ को भी भेज देता हूँ।" "हमारे हुक्मनामे के सम्बन्ध में कुछ सन्देह हो रहा है क्या?" गरम तवे पर तेल पड़ने से जैसे छनछनाहट की आवाज आती है, वैसे ही शम्भूराजा उखड़े— "कविराज! हम प्रभावली के बाकायदा सूबेदार हैं। अपने अधिकार से हम यह निर्णय ले सकते हैं और हिन्दवी स्वराज्य के युवराज हैं, खेत खड़ा किया गया धोखा नहीं हैं। किसी कारण से दुखी, लाचार और जरूरतमन्द प्रजा के लिए तत्काल निर्णय लेने का अधिकार युवराज के रूप में मुझे है।" कवि कलश धीरे-से हँसे, और उतने ही शान्त स्वर में बोले, "राजन! आपके अधिकार के सम्बन्ध में प्रश्न करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। किन्तु एक प्रिय मित्र के नाते मुझे यह अवश्य कहना पड़ेगा कि जहाँ राजा होता है वहाँ दरबार होता है। दरबार की दीवारें षड्यन्त्रकारी कारनामों से खोखली होती हैं, सम्भाजी :: 79