छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"और महाराज ? हमारे महाराज कहाँ हैं ?'' खंडो बल्लाल ने विह्वल होकर पूछा। "महाराज शत्रु पर टूट पड़े हैं। कवि कलश की कोठी के सामने घनघोर युद्ध हो रहा है।" "हाँ-हाँ महाराज को बड़ी कुशलता से लड़ते हुए मैंने देखा है। किन्तु आक्रमण अचानक हुआ और हमारी सेना बहुत कम है। इतने में उन दो-तीन घुड़सवारों के पीछे दो-तीन सौ घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। चिपलून के सराई के समीप यह सेना रुकी। घुड़सवार छलाँग लगाकर नीचे उतरे। उनका चेहरा सम्भ्रमित था, उनके कपड़ों पर खून और धूल के धब्बे दिखाई पड़ रहे थे। उन्हें देखकर येसूबाई दौड़ती हुई आगे आयीं। उन्होंने व्यग्रता से पूछा, "सन्ताजी क्या हुआ? महाराज कहाँ हैं?" "माताजी घबराने का कोई कारण नहीं है। सवेरे अचानक शत्रु ने संगमेश्वर पर आक्रमण कर दिया। कुल सात-आठ सौ सैनिक थे। हमारी संख्या बहुत कम थी। किन्तु हमने उनका मुकाबला किया हमने उन्हें पीछे हटा दिया।" "और महाराज? महाराज कहाँ हैं?" यह पूछते हुए येसूबाई का हृदय जोर से धड़कने लगा। "चिन्ता न करें मातुश्री ! महाराज सकुशल हैं। महाराज और कविराज बीच वाले जंगल के रास्ते से सीधे रायगढ़ पहुँच जाएँगे।" "परन्तु महाराज को छोड़कर तुम आगे आये कैसे सन्ताजी?" "महारानी जी, 'महाराज वहाँ रुके नहीं हैं। उन्हें आपकी बड़ी चिन्ता थी। आकाश से अचानक बरसते बादलों की तरह शत्रु ने अचानक हमला कर दिया। यह पता ही नहीं लग पाया कि और कितने शत्रु किस दिशा से आ जाएँगे? इसलिए महाराज ने मुझे चिपलून की चौकी सँभालने का आदेश दिया। महारानी के साथ की बीस-पचीस पालकियों के लोग सकपकाये से खड़े थे। महारानी ने सन्ताजी से पूछा, "सन्ताजी हमारे शिरकान के श्रृंगारपुर के रास्ते से तो हवा भी घुसने की गुस्ताखी नहीं करती फिर दुश्मन कहाँ से घुस आये?" "महारानी जी, यह अपने लोगों द्वारा किया गया धोखा है। परन्तु अब उसका विचार न करें। यहाँ से जल्दी निकलें। नहीं तो पालकियों को रायगढ़ पहुँचने में विलम्ब हो सकता है।" कहारों ने पालकियाँ उठा लीं। वे तेज गति से आगे की ओर बढ़े। सन्ताजी बेचैन हो रहे थे। उन्होंने चिपलून के थानेदार को अपने साथ लिया और दिनभर चिपलून के बन्दोबस्त में व्यस्त रहे। शाम को दो घुड़सवार संगमेश्वर की ओर से भागते हुए आये। उनके स्याह 680 :: सम्भाजी