छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपड़ गये चेहरे बेहाल थे। समाचार देते हुए वे रो पड़े, "सरदार धोखा हो गया। आप लोग वहाँ से निकले और शत्रुओं ने पुनः गाँव पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने गाँव को आग लगा दी और हम पूरी तरह हार गये।" "परन्तु महाराज कहाँ हैं?" "कुछ लोग कहते हैं कि बगल की खाड़ी का लाभ उठाकर महाराज निकल गये। किन्तु कुछ लोगों का कहना है कि महाराज और कविराज को शत्रु पकड़कर ले गये।" "पकड़कर? तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है?" सन्ताजी सन्तप्त हो गये। सही खबर समझ में नहीं आ रही थी। सन्ताजी और थानेदार खड़े-खड़े बातें कर रहे थे। उन्हें विश्वास होने लगा कि पीछे कुछ भयंकर घटित हुआ है। अब चिपलून में बैठे रहने में बुद्धिमानी नहीं थी। सन्ताजी पाँच सौ घुड़सवारों की सेना लेकर चिपलून से संगमेश्वर की ओर चल पड़े। सन्ताजी के साथ घोड़े संगमेश्वर की ओर भागने लगे। पहाड़ी, जंगल, झरने, खोह आदि लाँघते हुए सन्ताजी की सेना वेग से दौड़ने हुए जब संगमेश्वर पहुँची तब घना अन्धकार हो गया था। संगमेश्वर की स्थिति देखते नहीं बन रही थी। इस सुन्दर कस्बे का हुलिया ही बदल गया था। क्षेत्र मे अपना आतंक जमाने के लिए शत्रु ने आग लगा दी थी। अब भी कुछ कोठियाँ- हवेलियाँ जलती हुई दिखाई पड़ रही थीं। चारों ओर लाशें बिखरी पड़ी थीं। टिड्डियों के दल आने के बाद जैसी स्थिति होती है उसी प्रकार पूरा कस्बा तहस नहस हो गया था। कस्बे में कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ बूढ़े, कुछ लूले लँगड़े भाग न सकने के कारण आड़ में छिपकर बैठे थे। वहाँ अफवाह फैल गयी थी कि अभी फिर से औरंगजेब की सेना आने वाली है। इसी भय से बागों और जंगलों में छिपे लोग बस्ती में जाने को तैयार न थे। सन्ताजी की सेना के आने का समाचार पाकर कुछ छिपे हुए बूढ़े बाहर आये। उनसे पक्की खबर मिली कि शम्भूराजा और कविराज को शत्रु सेना जीवित पकड़कर ले गयी। यह समाचार सुनते ही सन्नाजी का चेहरा काला पड़ गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने तपते सोने पर कोयले का घोल डाल दिया। उन्हें जोर से रुलाई आ गयी। दूसरी दिशा से पाँच घोड़े दौड़ते हुए आये। उसी ओर से धनाजी जाधव अपनी सेना लेकर लौटे थे। धनाजी और सन्ताजी एक-दूसरे से मिले। घोड़ों पर से ही कुछ बातें कीं। धनाजी ने कहा, "सन्ताऽऽ मैं दो घंटे से चारों तरफ दौड़ रहा हूँ। बहुत खोज की, लेकिन समझ में ही नहीं आ रहा है कि महाराज को लेकर दुश्मन किस रास्ते से चले गये। लोग अपने अनुमान से दशों दिशाओं की ओर बताते हैं।" "पर धनाजी इस तरह रुके रहने से क्या होगा? अपने सूर्य को शत्रु लेकर सम्भाजी :: 681