भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 684, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 684

चला गया। बाकी बचा यह जनसमुद्र लेकर हम क्या करेंगे?" सन्ताजी ने घबराये स्वर में कहा। आपस में विचार-विमर्श हुआ। गोवा और चिपलून का रास्ता छोड़ दिया जाये तो आंबाघाट का एकमात्र रास्ता बचता था। निश्चित कि कोल्हापुर की ओर से शत्रु उसी दिशा से आये होंगे। यहाँ से आंबाघाट पहुँचने के लिए कम से कम पाँच- छह घंटे लगने वाले थे। रास्ता सँकरा, खड़ी चढ़ाइयों वाला और गहरी घाटियों वाला विकट रास्ता था। सन्ताजी और धनाजी के एकत्र लगभग एक हजार घोड़े आंबाघाट की ओर दौड़ पड़े। किन्तु इसी बीच कोई भीड़ से आकर सन्ताजी के घोड़े से चिपक गया। अपने रिकेब में रखे पैर को पकड़कर खड़े उस दुबले-पतले ब्राह्मण को सन्ताजी ने देखा। उसका चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था। सन्ताजी को ध्यान आया यह तो संगमेश्वर के थानेदार के सहयोगी त्र्यंबक शास्त्री थे। सन्ताजी ने शीघ्रता से पूछा, "कहिए शास्त्री बाबा, क्या कहना चाहते हैं?" "बस, एक क्षण के लिए मेरे साथ आइये।" बगल में कवि कलश की कोठी जलकर राख हो गयी थी। अन्दर उठने वाली लपटें अभी भी बाहर दरवाजे तक धधक रही थीं। सामने पचास-साठ शव गिरे पड़े थे। उसमें से एक शव पर चादर उढ़ा दी गयी थी। शास्त्री जी ने धीरे से चादर को हटाया। सामने का दृश्य देखकर सन्ताजी उलझन में पड़ गये। दिनभर की भाग-दौड़ और शम्भूराजा पर आये संकट में सन्ताजी भूल ही गये थे कि उनका कोई पिता भी है जो हिन्दवी स्वराज्य का सेनापति है। दोपहर की लड़ाई में शम्भू महाराज को बचाते-बचाते वृद्ध सेनापति म्हालोजी घोडपड़े गिर गये थे। अपने पिता का शव देखकर सन्ताजी पूरी तरह विचलित हो गये। शोक सन्तप्त सन्ताजी को सँभालने का प्रयास धनाजी कर रहे थे। सन्ताजी ने अपने मृत पिता के मुख पर हाथ फेरा, उन्हें सीने से लगा लिया। फिर अधिक समय न गँवाकर उन्होंने पिता के सिर को हल्के से नीचे रख दिया। उन्होंने अपने गले की रत्नों की माला को शास्त्रीजी को सौंपते हुए कहा, "शास्त्री महाराज, मेरे पिताजी के साथ और जितनों का सम्भव हो अन्तिम संस्कार कर दीजिए। मुझे आगे बढ़कर शत्रु का विनाश करना है।" एक घंटे तक घोड़े दौड़ते रहे। मार्ग में एक पानी का झरना मिला। दिनभर की निरन्तर भाग-दौड़ से घोड़े थक गये थे। प्यासे घोड़ों ने पानी पिया। पीठ पर बैठे सैनिकों की चिन्ता किये बिना वे मूक जानवर वहीं बैठने लगे। आगे का रास्ता अभी भी शेष था। समीप के गड़ेरियों की बस्ती से घोड़ों के लिए सूखा चारा लाया गया। वहाँ के तीस-चालीस घर जग गये थे। जल्दी जल्दी नाचनी की रोटियाँ बनाई गयीं। एक या डेढ़ रोटी सभी को मिली। सैनिकों ने उसे चटनी के साथ खा लिया। 682 :: सम्भाजी