छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघोड़ों को दो-ढाई घंटे का आराम मिल गया। एक-एक करके घोड़े स्वस्थ होकर खड़े होने लगे। अपने मालिकों की स्थिति उन्हें भी महसूस हुई होगी। वे फिर तैयार हो गये। आंबाघाट चढ़ते चढ़ते दोपहर ढल गयी। वहीं बीच में मराठों की चौकी थी। सन्ताजी और धनाजी को अचानक आया देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। घाट के बीच-बीच में कविराज ने अपनी सेना बिखेर रखी थी। यह सेना घाट के पार अम्बा गाँव तक फैली थी। वहाँ पर कविराज के सहयोगी कृष्णाजी कान्हेरे सन्ताजी और धनाजी का स्वागत करने आये। वहाँ सात हजार की तरोताजा सेना देखकर सन्ताजी चकित हो गये। उन्होंने शम्भूराजा के बारे में कान्हेरे से पूछताछ की। कान्हेरे ने कहा, "क्या कहते हैं, सरदार साहब ? हम पिछले बहुत दिनों से यहीं पर टिके हुए हैं। कविराज ने मुझे विशेष रूप से तैनात किया है। इस रास्ते से न कोई आया और न कोई गया।" "क्या कह रहे हैं ? शत्रु की सेना यहाँ से ऊपर नहीं चढ़ी ?" "कैसे चढ़ती सरकार ? हम छह-सात हजार सैनिक क्या यहाँ चूड़ियाँ पहनकर बैठे हैं ? हम शत्रु को यहाँ से कैसे जाने देते ? यहाँ से कोई नहीं गुजरा। हम कविराज के आदेश की राह देख रहे हैं।" उन दोनों युवा सरदारों की उलझन देखकर कान्हेरे भी घबरा गये। यह सूचना मिलते ही शम्भूराजा पर संकट आ गया है, स्वराज्य संकट में पड़ गया है, वहाँ उपस्थित सभी लोग घबरा गये। महाराज का क्या हुआ होगा ? "बहुत बड़ा धोखा हो गया।" कृष्णाजी कान्हेरे ने कहा, "रुकिए, अभी थोड़ी देर पहले रत्नागिरि के सुनार नरहरिपन्त प्रचितगढ़ के रास्ते से पहाड़ी चढ़कर आये हैं। उनकी पुत्रवधू पाटण की है उनके साथ तीस-चालीस लोग मेरे डेरे में विश्राम कर रहे हैं।" नरहरिपन्त को शीघ्रता से बुलाया गया। नरहरिपन्त बताने लगे, "अपनी बहू को लेकर हम प्रचितगढ़ और कुंडीघाट के बीच के रास्ते से तीन दिन की पहाड़ी यात्रा करके आये हैं।" धनाजी ने जल्दी पूछा, "आते समय बीच वाले पट्टे में कुछ आदमी, कोई फौज या ऐसी कोई चीज आपको दिखाई पड़ी ?" "वैसा कुछ खास नहीं दिखा। " नरहरिपन्त अपनी बगुले जैसी गर्दन हिलाते हुए कहने लगे। कुछ स्मरण करते हुए वे जल्दी से बोले, "हाँऽऽ कल शाम से पहले पाथरपुंज के जंगल में अपने दादाजी दिखाई पड़े थे।" "कौन दादाजी ?" "अपने गणोजी शिर्के, अपने शम्भूराजा के साले साहब।" धनाजी और सन्ताजी झट से आगे आ गये, उनकी साँसें तेज चलने लगीं। सन्ताजी ने हड़बड़ाकर पूछा, "गणोजी वहाँ क्या कर रहा था ?" सम्भाजी .: 683