छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
"और महाराज ? हमारे महाराज कहाँ हैं ?'' खंडो बल्लाल ने विह्वल होकर पूछा। "महाराज शत्रु पर टूट पड़े हैं। कवि कलश की कोठी के सामने घनघोर युद्ध हो रहा है।" "हाँ-हाँ महाराज को बड़ी कुशलता से लड़ते हुए मैंने देखा है। किन्तु आक्रमण अचानक हुआ और हमारी सेना बहुत कम है। इतने में उन दो-तीन घुड़सवारों के पीछे दो-तीन सौ घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। चिपलून के सराई के समीप यह सेना रुकी। घुड़सवार छलाँग लगाकर नीचे उतरे। उनका चेहरा सम्भ्रमित था, उनके कपड़ों पर खून और धूल के धब्बे दिखाई पड़ रहे थे। उन्हें देखकर येसूबाई दौड़ती हुई आगे आयीं। उन्होंने व्यग्रता से पूछा, "सन्ताजी क्या हुआ? महाराज कहाँ हैं?" "माताजी घबराने का कोई कारण नहीं है। सवेरे अचानक शत्रु ने संगमेश्वर पर आक्रमण कर दिया। कुल सात-आठ सौ सैनिक थे। हमारी संख्या बहुत कम थी। किन्तु हमने उनका मुकाबला किया हमने उन्हें पीछे हटा दिया।" "और महाराज? महाराज कहाँ हैं?" यह पूछते हुए येसूबाई का हृदय जोर से धड़कने लगा। "चिन्ता न करें मातुश्री ! महाराज सकुशल हैं। महाराज और कविराज बीच वाले जंगल के रास्ते से सीधे रायगढ़ पहुँच जाएँगे।" "परन्तु महाराज को छोड़कर तुम आगे आये कैसे सन्ताजी?" "महारानी जी, 'महाराज वहाँ रुके नहीं हैं। उन्हें आपकी बड़ी चिन्ता थी। आकाश से अचानक बरसते बादलों की तरह शत्रु ने अचानक हमला कर दिया। यह पता ही नहीं लग पाया कि और कितने शत्रु किस दिशा से आ जाएँगे? इसलिए महाराज ने मुझे चिपलून की चौकी सँभालने का आदेश दिया। महारानी के साथ की बीस-पचीस पालकियों के लोग सकपकाये से खड़े थे। महारानी ने सन्ताजी से पूछा, "सन्ताजी हमारे शिरकान के श्रृंगारपुर के रास्ते से तो हवा भी घुसने की गुस्ताखी नहीं करती फिर दुश्मन कहाँ से घुस आये?" "महारानी जी, यह अपने लोगों द्वारा किया गया धोखा है। परन्तु अब उसका विचार न करें। यहाँ से जल्दी निकलें। नहीं तो पालकियों को रायगढ़ पहुँचने में विलम्ब हो सकता है।" कहारों ने पालकियाँ उठा लीं। वे तेज गति से आगे की ओर बढ़े। सन्ताजी बेचैन हो रहे थे। उन्होंने चिपलून के थानेदार को अपने साथ लिया और दिनभर चिपलून के बन्दोबस्त में व्यस्त रहे। शाम को दो घुड़सवार संगमेश्वर की ओर से भागते हुए आये। उनके स्याह 680 :: सम्भाजी
पड़ गये चेहरे बेहाल थे। समाचार देते हुए वे रो पड़े, "सरदार धोखा हो गया। आप लोग वहाँ से निकले और शत्रुओं ने पुनः गाँव पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने गाँव को आग लगा दी और हम पूरी तरह हार गये।" "परन्तु महाराज कहाँ हैं?" "कुछ लोग कहते हैं कि बगल की खाड़ी का लाभ उठाकर महाराज निकल गये। किन्तु कुछ लोगों का कहना है कि महाराज और कविराज को शत्रु पकड़कर ले गये।" "पकड़कर? तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है?" सन्ताजी सन्तप्त हो गये। सही खबर समझ में नहीं आ रही थी। सन्ताजी और थानेदार खड़े-खड़े बातें कर रहे थे। उन्हें विश्वास होने लगा कि पीछे कुछ भयंकर घटित हुआ है। अब चिपलून में बैठे रहने में बुद्धिमानी नहीं थी। सन्ताजी पाँच सौ घुड़सवारों की सेना लेकर चिपलून से संगमेश्वर की ओर चल पड़े। सन्ताजी के साथ घोड़े संगमेश्वर की ओर भागने लगे। पहाड़ी, जंगल, झरने, खोह आदि लाँघते हुए सन्ताजी की सेना वेग से दौड़ने हुए जब संगमेश्वर पहुँची तब घना अन्धकार हो गया था। संगमेश्वर की स्थिति देखते नहीं बन रही थी। इस सुन्दर कस्बे का हुलिया ही बदल गया था। क्षेत्र मे अपना आतंक जमाने के लिए शत्रु ने आग लगा दी थी। अब भी कुछ कोठियाँ- हवेलियाँ जलती हुई दिखाई पड़ रही थीं। चारों ओर लाशें बिखरी पड़ी थीं। टिड्डियों के दल आने के बाद जैसी स्थिति होती है उसी प्रकार पूरा कस्बा तहस नहस हो गया था। कस्बे में कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ बूढ़े, कुछ लूले लँगड़े भाग न सकने के कारण आड़ में छिपकर बैठे थे। वहाँ अफवाह फैल गयी थी कि अभी फिर से औरंगजेब की सेना आने वाली है। इसी भय से बागों और जंगलों में छिपे लोग बस्ती में जाने को तैयार न थे। सन्ताजी की सेना के आने का समाचार पाकर कुछ छिपे हुए बूढ़े बाहर आये। उनसे पक्की खबर मिली कि शम्भूराजा और कविराज को शत्रु सेना जीवित पकड़कर ले गयी। यह समाचार सुनते ही सन्नाजी का चेहरा काला पड़ गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने तपते सोने पर कोयले का घोल डाल दिया। उन्हें जोर से रुलाई आ गयी। दूसरी दिशा से पाँच घोड़े दौड़ते हुए आये। उसी ओर से धनाजी जाधव अपनी सेना लेकर लौटे थे। धनाजी और सन्ताजी एक-दूसरे से मिले। घोड़ों पर से ही कुछ बातें कीं। धनाजी ने कहा, "सन्ताऽऽ मैं दो घंटे से चारों तरफ दौड़ रहा हूँ। बहुत खोज की, लेकिन समझ में ही नहीं आ रहा है कि महाराज को लेकर दुश्मन किस रास्ते से चले गये। लोग अपने अनुमान से दशों दिशाओं की ओर बताते हैं।" "पर धनाजी इस तरह रुके रहने से क्या होगा? अपने सूर्य को शत्रु लेकर सम्भाजी :: 681
चला गया। बाकी बचा यह जनसमुद्र लेकर हम क्या करेंगे?" सन्ताजी ने घबराये स्वर में कहा। आपस में विचार-विमर्श हुआ। गोवा और चिपलून का रास्ता छोड़ दिया जाये तो आंबाघाट का एकमात्र रास्ता बचता था। निश्चित कि कोल्हापुर की ओर से शत्रु उसी दिशा से आये होंगे। यहाँ से आंबाघाट पहुँचने के लिए कम से कम पाँच- छह घंटे लगने वाले थे। रास्ता सँकरा, खड़ी चढ़ाइयों वाला और गहरी घाटियों वाला विकट रास्ता था। सन्ताजी और धनाजी के एकत्र लगभग एक हजार घोड़े आंबाघाट की ओर दौड़ पड़े। किन्तु इसी बीच कोई भीड़ से आकर सन्ताजी के घोड़े से चिपक गया। अपने रिकेब में रखे पैर को पकड़कर खड़े उस दुबले-पतले ब्राह्मण को सन्ताजी ने देखा। उसका चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था। सन्ताजी को ध्यान आया यह तो संगमेश्वर के थानेदार के सहयोगी त्र्यंबक शास्त्री थे। सन्ताजी ने शीघ्रता से पूछा, "कहिए शास्त्री बाबा, क्या कहना चाहते हैं?" "बस, एक क्षण के लिए मेरे साथ आइये।" बगल में कवि कलश की कोठी जलकर राख हो गयी थी। अन्दर उठने वाली लपटें अभी भी बाहर दरवाजे तक धधक रही थीं। सामने पचास-साठ शव गिरे पड़े थे। उसमें से एक शव पर चादर उढ़ा दी गयी थी। शास्त्री जी ने धीरे से चादर को हटाया। सामने का दृश्य देखकर सन्ताजी उलझन में पड़ गये। दिनभर की भाग-दौड़ और शम्भूराजा पर आये संकट में सन्ताजी भूल ही गये थे कि उनका कोई पिता भी है जो हिन्दवी स्वराज्य का सेनापति है। दोपहर की लड़ाई में शम्भू महाराज को बचाते-बचाते वृद्ध सेनापति म्हालोजी घोडपड़े गिर गये थे। अपने पिता का शव देखकर सन्ताजी पूरी तरह विचलित हो गये। शोक सन्तप्त सन्ताजी को सँभालने का प्रयास धनाजी कर रहे थे। सन्ताजी ने अपने मृत पिता के मुख पर हाथ फेरा, उन्हें सीने से लगा लिया। फिर अधिक समय न गँवाकर उन्होंने पिता के सिर को हल्के से नीचे रख दिया। उन्होंने अपने गले की रत्नों की माला को शास्त्रीजी को सौंपते हुए कहा, "शास्त्री महाराज, मेरे पिताजी के साथ और जितनों का सम्भव हो अन्तिम संस्कार कर दीजिए। मुझे आगे बढ़कर शत्रु का विनाश करना है।" एक घंटे तक घोड़े दौड़ते रहे। मार्ग में एक पानी का झरना मिला। दिनभर की निरन्तर भाग-दौड़ से घोड़े थक गये थे। प्यासे घोड़ों ने पानी पिया। पीठ पर बैठे सैनिकों की चिन्ता किये बिना वे मूक जानवर वहीं बैठने लगे। आगे का रास्ता अभी भी शेष था। समीप के गड़ेरियों की बस्ती से घोड़ों के लिए सूखा चारा लाया गया। वहाँ के तीस-चालीस घर जग गये थे। जल्दी जल्दी नाचनी की रोटियाँ बनाई गयीं। एक या डेढ़ रोटी सभी को मिली। सैनिकों ने उसे चटनी के साथ खा लिया। 682 :: सम्भाजी
घोड़ों को दो-ढाई घंटे का आराम मिल गया। एक-एक करके घोड़े स्वस्थ होकर खड़े होने लगे। अपने मालिकों की स्थिति उन्हें भी महसूस हुई होगी। वे फिर तैयार हो गये। आंबाघाट चढ़ते चढ़ते दोपहर ढल गयी। वहीं बीच में मराठों की चौकी थी। सन्ताजी और धनाजी को अचानक आया देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। घाट के बीच-बीच में कविराज ने अपनी सेना बिखेर रखी थी। यह सेना घाट के पार अम्बा गाँव तक फैली थी। वहाँ पर कविराज के सहयोगी कृष्णाजी कान्हेरे सन्ताजी और धनाजी का स्वागत करने आये। वहाँ सात हजार की तरोताजा सेना देखकर सन्ताजी चकित हो गये। उन्होंने शम्भूराजा के बारे में कान्हेरे से पूछताछ की। कान्हेरे ने कहा, "क्या कहते हैं, सरदार साहब ? हम पिछले बहुत दिनों से यहीं पर टिके हुए हैं। कविराज ने मुझे विशेष रूप से तैनात किया है। इस रास्ते से न कोई आया और न कोई गया।" "क्या कह रहे हैं ? शत्रु की सेना यहाँ से ऊपर नहीं चढ़ी ?" "कैसे चढ़ती सरकार ? हम छह-सात हजार सैनिक क्या यहाँ चूड़ियाँ पहनकर बैठे हैं ? हम शत्रु को यहाँ से कैसे जाने देते ? यहाँ से कोई नहीं गुजरा। हम कविराज के आदेश की राह देख रहे हैं।" उन दोनों युवा सरदारों की उलझन देखकर कान्हेरे भी घबरा गये। यह सूचना मिलते ही शम्भूराजा पर संकट आ गया है, स्वराज्य संकट में पड़ गया है, वहाँ उपस्थित सभी लोग घबरा गये। महाराज का क्या हुआ होगा ? "बहुत बड़ा धोखा हो गया।" कृष्णाजी कान्हेरे ने कहा, "रुकिए, अभी थोड़ी देर पहले रत्नागिरि के सुनार नरहरिपन्त प्रचितगढ़ के रास्ते से पहाड़ी चढ़कर आये हैं। उनकी पुत्रवधू पाटण की है उनके साथ तीस-चालीस लोग मेरे डेरे में विश्राम कर रहे हैं।" नरहरिपन्त को शीघ्रता से बुलाया गया। नरहरिपन्त बताने लगे, "अपनी बहू को लेकर हम प्रचितगढ़ और कुंडीघाट के बीच के रास्ते से तीन दिन की पहाड़ी यात्रा करके आये हैं।" धनाजी ने जल्दी पूछा, "आते समय बीच वाले पट्टे में कुछ आदमी, कोई फौज या ऐसी कोई चीज आपको दिखाई पड़ी ?" "वैसा कुछ खास नहीं दिखा। " नरहरिपन्त अपनी बगुले जैसी गर्दन हिलाते हुए कहने लगे। कुछ स्मरण करते हुए वे जल्दी से बोले, "हाँऽऽ कल शाम से पहले पाथरपुंज के जंगल में अपने दादाजी दिखाई पड़े थे।" "कौन दादाजी ?" "अपने गणोजी शिर्के, अपने शम्भूराजा के साले साहब।" धनाजी और सन्ताजी झट से आगे आ गये, उनकी साँसें तेज चलने लगीं। सन्ताजी ने हड़बड़ाकर पूछा, "गणोजी वहाँ क्या कर रहा था ?" सम्भाजी .: 683
"कुछ नहीं, सात-आठ सौ की फौज चल रही थी, कराड़ की दिशा में जा रही थी। गणोजी सबसे आगे घोड़े पर थे। उनके पीछे यवन सैनिक थे मराठा सैनिक बहुत कम थे।" "और क्या क्या देखा?" "मैं आगे क्यों जाता। मेरी बहू गहनों से लदी थी। व्यर्थ में राहजनी का संकट क्यों बुलाता? इसलिए दूर झाड़ी में छुपकर ही उस फौज को देखा। परन्तु सेना के आगे-आगे दो कैदियों को घोड़े पर लादकर ले जा रहे थे।" "देखने में कैसे थे वे कैदी?" "थे तो एकदम गोरे-चिट्टे, मजबूत कद काठी वाले पर उन पर बहुत मार- पीट हुई थी। उनके मुँह में खून सने कपड़े ठूँसे थे। पूरा शरीर रस्सियों और जंजीरों से बाँधा गया था।" "ऐसा?" "फौज के आगे निकल जाने पर मैंने गड़ेरियों के बच्चों से पूछताछ की तब उन्होंने बताया कि गणोजी ने समुद्र के किनारे दो सौदागर पकड़े हैं। उन्हें लेकर उंब्रज की ओर जा रहे हैं।" नरहरिपन्त के बयान से सारी बातें स्पष्ट हो गयीं। सुनने वालों के चेहरे पर प्रेतछाया-सी फैल गयी। सन्ताजी भाव विह्वल हो गये। उन्होंने धनाजी से लिपटकर रोना-कलपना आरम्भ कर दिया। वे विकल होकर चीख पड़े, "धनाऽऽ धोखा हो गया रेऽऽ, यह गणोजी शिर्के रूपी कालसर्प ही अपनी दौलत को डँस गया।" सभी की आँखों में-आँसू भर आये। दुख के आवेग से सैनिक अपनी जगह पर उठने-बैठने लगे। वहाँ कुछ हलचल मच गयी। सन्ताजी ने अपने गर्म आँसू पोंछ लिये। उन्होंने अपनी तलवार को म्यान से बाहर निकाल लिया और ललकारकर बोले, "चलो धनाजी! अभी भी अपने पास छह सात हजार की फौज है। ऐसे ही भागकर चलेंगे और कराड़ पर आक्रमण कर देंगे। उस हरामखोर गणोजी के साथ मुगलों को भी जलाकर खाक कर देंगे।" "सन्ताजी सुनो! मेरी बात शान्ति से सुनो। इस आड़ी-तिरछी पहाड़ी चढ़ाई से कराड़ पहुँचने में हमें कम-से-कम दो-तीन दिन लग जाएँगे। तब तक क्या शत्रु हमारी राह देखता वहाँ बैठा रहेगा।" धनाजी ने कहा। "मतलब?" "पाथरपुंज से कराड़ अधिक दूर नहीं है। रात को भोजन के समय तक मुगल महाराज को लेकर कराड़ पहुँच गये होंगे। वहाँ आसपास रहिमतपुर, इस्लामपुर, औंध जैसी जगहों पर औरंगजेब की चौकियाँ हैं। अब तक उन दुष्टों ने दस-पन्द्रह हजार की सेना साथ लेकर कराड़ भी छोड़ दिया होगा।" धनाजी ने स्पष्ट किया। 684 :: सम्भाजी
“धनाजी तुम ऐसे ही हो। हमेशा मेरे उत्साह पर पानी फेर देते हो।” सन्ताजी ने रुआँसा होकर कहा। धनाजी ने आगे बढ़कर सन्ताजी को गले से लगा लिया। धनाजी उन्हें समझाते हुए बोले, “सन्ताजी, भावना के आधार पर नहीं बुद्धि के सहारे से लड़ो। ऐसा अपने शम्भूराजा क्यों कहते थे? इस पर भी थोड़ा सोचो, थोड़ा विचार करो। अपने सेनापति, आपके पिता अभी कल ही शहीद हो गये। महाराज को मुगल ले गये। सेनापति दिवंगत हो गये। अपनी मातेश्री महारानी रायगढ़ पहुँचीं कि नहीं, इसका भी पता हमें नहीं है। “तो हम क्या करें?” “यहाँ आंबा घाटी में सुरक्षा के लिए दो हजार सैनिकों को छोड़कर बाकी सेना को लेकर हमें रायगढ़ पहुँचना है। वहाँ महारानी की राय लेंगे। सन्ताजी अपने महाराज को कराल काल खींचकर ले गया है। कम-से-कम राजधानी तो बचाएँ। वह भी चली गयी तो?—मेरे भाई तब तो संसार ही डूब जाएगा।” एक हाथ से आँसू पोंछते-पोंछते सन्ताजी ने दूसरा हाथ अपनी कमर की पेटी पर रखा। सभी ने अपनी कमर कस ली। कृष्णाजी के साथ दो हजार की फौज रख दी गयी। पुनः सभी लोग रात में ही आंबाघाट उतरने लगे। उन्हें शीघ्रातिशीघ्र राजधानी रायगढ़ पहुँचना था। तीन उस सूनी शाम को महारानी येसूबाई राजप्रासाद के भव्य तुलसी चौरे के पास बैठी थीं। वे चिन्तित होकर सोच रही थीं कि उनसे पहले पहुँचने का आश्वासन देने वाले शम्भूराजा अभी तक क्यों नहीं आये? इसी समय तीन घुड़सवार वहाँ प्रस्तुत हुए। उनके पीछे-पीछे येसाजी कंक और उनके साथी उसी ओर आते दिखाई पड़े। उन सभी के घबराये चेहरे को देखकर महारानी का कलेजा धड़कने लगा। तीनों घुड़सवार घोड़े से उतर पड़े। महारानी के पैर पकड़कर जोर-जोर से रोते हुए कहने लगे, “रानी सरकारऽऽ हमारे ऊपर पहाड़ टूट पड़ा है, गजब हो गया है गजब। शत्रु अपने महाराज को पकड़कर ले गये।” सम्भाजी 685
"क्या?" येसूबाई ऐसे थरथराई मानो उन पर बिजली गिर गयी हो। दासियों ने उन्हें सहारा देकर संभाला। "कौन पकड़कर ले गया दादासाहब को?" येसूबाई के समीप खड़ी ताराऊ ने पूछा। "मुकर्रबखान।" "मराठों के राजा को पकड़कर ले गये? क्या कहते हो तुम? वे क्या कोई गाय या घोड़ा थे? ऐसा कैसे हो गया?" कुछ समय के लिए लगा कि महारानी की रीढ़ की हड्डी ही चिपक गयी। वे उसी तरह नीचे बैठ गयीं। वे पसीने से भीग गयीं। उन्हें चक्कर आ गया। लोग भाग-दौड़ करने लगे। दासियों ने सफेद प्याज फाड़कर उनकी नाक के पास रखा। महारानी थोड़ी ही देर में मूर्च्छा से बाहर आ गयीं। राजारामसाहब भी वहाँ पर आ गये। उनकी मूर्च्छा का कारण वह धक्कादायक समाचार था। विगत नौ वर्षों तक रायगढ़ की युवराज्ञी का खून खौल गया। उन्होंने हरकारे से पूरा समाचार जान लेने का प्रयास किया। तब तक वहाँ खंडो बल्लाल, जोत्याजी केसकर, रायप्पा महार जैसे अनेक लोग एकत्र हो गये थे। रायप्पा अपना रोना रोक नहीं पा रहा था। "ऐसे स्वामी को छोड़कर मैं यहाँ आया ही किसलिए?" ऐसा कहते हुए वह जोर जोर से रोने लगा। महारानी को जब पता चला कि कविराज और महाराज को मालेघाट से लेकर गये हैं, उनका आश्चर्य और भी बढ़ गया। उन्होंने कहा, "नहीं नहीं ऐमा कभी नहीं हो सकता मालेघाट? उस भयानक जंगल से तो जाते हुए भूत प्रेत भी घबरा जाते हैं। ऐमी भयानक राह खान को मिलेगी ही कैसे?" "क्या कहें महारानीजी दाँत भी अपने और होंठ भी अपने।" "क्या हुआ ठीक-ठीक बताओ? यहाँ मेरी साँस अटक रही है।" "आपके-आपके भाई गणोजी शिर्के स्वयं मुकर्रबखान के साथ थे।" "नहीं, उस वीरान जंगल का रास्ता गणोजी को भी कहाँ पता है?" "उन्होंने ही राह दिखाने वालों की व्यवस्था की, भोजन और घोड़ों की व्यवस्था भी उन्होंने ही की थी। उनके सहयोगी गोवर्धन पन्त भी उनके साथ थे।" आँखों से गिरने वाले गर्म आँसू महारानी ने अपने पल्लू से पोंछ लिये। दूसरे ही क्षण उन्होंने हरकारे से पूछा, "धनाजी और सन्ताजी कहाँ हैं?" "महारानीजी कौन बता सकता है? महाराज पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा है, सभी ओर अफरातफरी मची है।" "परन्तु महारानीजी चिन्ता की बात नहीं है। धनाजी बहुत तेज बुद्धि के व्यक्ति हैं। वे सन्ताजी को लेकर यहीं आ रहे होंगे। आपकी आज्ञा लिए बिना वे कोई कार्य नहीं करेंगे।" खंडो बल्लाल ने कहा। 686 :: सम्भाजी
इस भयानक समाचार से पूरा रायगढ़ थरथरा गया था। हर बुर्ज हर दरवाजे से निकलकर लोग राजमहल की ओर भागे आ रहे थे। राजमहल के सामने तीन-चार हजार लोगों की भीड़ एकत्र हो गयी थी। महाराजऽऽ शम्भू महाराज कहाँ चले गये आप? ऐसी दुखभरी चीखें और दहाड़ें अन्दर सुनाई पड़ने लगीं। बाहर की आवाजें सुनकर येसूबाई सँभल गयीं। उन्हें किसी बात का ध्यान आ गया। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा, "चलो खंडोबाऽऽ चलो ताराऊऽऽ।" वे सब महल के बाहर आ गये। सभी एक ऊँचे चबूतरे पर खड़े हो गये। महारानी को देखकर सभी ने एक साथ पूछना आरम्भ कर दिया, "महारानीऽऽ हमारे महाराज कहाँ हैं?" आक्रोश में उद्विग्न प्रजा को शान्त करने के लिए महारानी ने हाथ जोड़ लिये। उन्होंने कहा, "सुनिएऽऽ आपलोग इस प्रकार का हो हल्ला मत मचाइये। औरंगजेब के साथ हमारा युद्ध चल रहा है। युद्ध में तो आगा-पीछा होता ही रहता है।" "परन्तु महाराज? हमारे महाराज?" "घबराइये नहीं। एकाध बार क्षण पल के लिए कोई दाँव उल्टा पड़ गया तो इसका मतलब यह नहीं होता कि औरंगजेब जीत गया। अब शीघ्र ही रायगढ़ से सेना निकलेगी। हम शत्रु पर टूट पड़ेंगे। महाराज को औरंगजेब की मुट्ठी से ही नहीं यमराज के जबड़े के भीतर से भी निकालकर ले आएँगे।" उस समय वहाँ एकत्र हजारों की भीड़ ने महाराज और महारानी का जयघोष किया। उन्हें शान्त करते हुए येसूबाई ने कहा, "सैनिको! आप सभी अपनी-अपनी जगह पर चले जाइये। अपने पहरे, मोर्चे, बुर्ज आदि छोड़कर कहीं भी न जाइये। अधिक होहल्ला करोगे तो शत्रु का ही लाभ होगा।" जमा हुई भीड़ बिखरने लगी। राजाराम अपने बड़े भाई पर आये संकट से बहुत विह्वल हो गये थे। वे अधीर होकर पूछने लगे, "भाभीजी! हमें दुश्मन की मुट्ठी से छुड़ाकर ले आने वाले भाईसाहब स्वयं शत्रु के हाथ कैसे लग गये?" येसूबाई ने पूछा, "खंडोबा, कम से कम दस-पन्द्रह हजार की सुदृढ़ फौज तैयार करने में कितना समय लगेगा?" "यहाँ पाँच छह हजार की फौज है। परन्तु सामान इकट्ठा करना, शस्त्रास्त्र जुटाना भी आवश्यक है। शेष सेना तो स्वराज्य में जगह-जगह तैनात की गयी है।" "ऐसा कीजिए, सुधागढ़, सागरगढ़ और क्सिवारी के किले पर शीघ्रातिशीघ्र दूत भेजिए। सुबह नाश्ते से पहले यहाँ की फौजें पाचाड़ पहुँच जानी चाहिए।" "महारानी चिन्ता न करें। निश्चित समय पर बाँधणी के मैदान पर घास-दाने के साथ फौज तैयार रखूँगा। तब तक सन्ताजी और धनाजी भी आ ही जाएँगे।" सम्भाजी :: 687
खंडो बल्लाल ने आश्वस्त किया। महारानी येसूबाई और उनकी देवरानी ताराबाई सारी रात जागती रहीं। दूसरे दिन युद्ध पर निकलने का निश्चय किया गया था। बहुत-सी तैयारी हो चुकी थी। सभी लोग अपने-अपने लिए निश्चित कार्य के लिए निकल गये थे। राजमहल सूना हो गया था। महाराज को स्मरण करते हुए महारानी को आवेश आ गया। वे देवघर की ओर दौड़ पड़ीं और भवानी माता के चरणों में गिर पड़ीं। उनके मन से मालेघाट, शिर्के लोगों का क्षेत्र और गणोजी का ध्यान हट नहीं रहा था। 'येसूऽ तुझे विधवा हुआ देखना मुझे बहुत अच्छा लगेगा।' गणोजी के इन विषैले शब्दों का उन्हें स्मरण हुआ। यह स्मरण होते ही वे थरथरा उठीं और विह्वल होकर रोने लगीं। उनके मुँह से शब्द निकले, 'भाई साहब आपने अपनी छोटी बहन पर अच्छा उपकार किया है। भैयादूज की ऐसी भयानक भेंट संसार के किस भाई ने दी होगी?' चार जैसे किसी चोर-उचक्के के हाथ अचानक कोहिनूर जैसा अनमोल हीरा लग जाये और उसकी रक्षा की चिन्ता में वह पूरी तरह घबरा जाये वही स्थिति मुकर्रब की हो रही थी। शम्भू महाराज जैसा अकल्पित शिकार उसके हाथ लग गया था। अब उसका एकमात्र लक्ष्य था उसे जल्दी से जल्दी औरंगजेब को सौंप देना। इसके लिए वह रात दिन एक कर रहा था। उसने दो दिन के भीतर ही इस्लामपुर औंध मिरज, रहिमतपुर जैसी आसपास की जगहों से पच्चीस-तीस हजार की मुगल सेना तैयार की। शम्भुराजा और कविराज को बीच में करके यह सेना जल्दी जल्दी आगे बढ़ी। कृष्णा और कोयना का क्षेत्र पीछे छूट रहा था। दोपहर का विश्राम लेकर सामने के पहाड़ की श्यामगाँव घाटी में पहुँचना था। वहाँ पहुँचने के पहले प्राकृतिक कारणों से भी रुकना नहीं है। ऐसा खान का हुक्म था। शम्भू महाराज की भावभरी दृष्टि आसपास के क्षेत्र पर बार-बार घूम रही थी। वसन्तगढ़ की तलहटी और फिर पायथे के तलबीड गाँव पर उनकी दृष्टि अटक गयी। शम्भुराजा को हंबीरमामा का स्मरण हो आया। उनके अन्तःकरण में प्रश्न 688 सम्भाजी
उभरा, 'मामा यदि आप आज होते तो?' कविराज का मन निरन्तर क्रन्दन कर रहा था। कृष्णा कोयना के आसपास का परिसर पीछे छूटता जा रहा था। शम्भू महाराज की स्थिति देखकर उनका कलेजा तार तार हो रहा था। सामने की पहाड़ी पार हुई। कराड़ के समीप का संगम स्थान पीछे छूटने लगा। फौज मुगलों के शासन क्षेत्र की ओर मुड़ गयी। इसी समय कवि कलश में आवेश आ गया। वे हाथ उठाकर जोर जोर से गा उठे मानो किसी कवि सम्मेलन में कविता पाठ कर रहे हों— गले लिपट कृष्णा नदी, कह कोयना बिलखाय। दीदी लख ये यवन खल, शिवा सुवन ले जाय।। “चलो भागो, चलो जल्दी करो,” मुकर्रब और इखलास चिल्ला रहे थे। उन्हें अभी भी इस बात का भय था कि मराठी सेना कहीं से अचानक टूट पड़ेगी और इस प्रकार आक्रमण करके अपना दुर्लभ यश छीनकर ले जाएगी। इसी चिन्ता से उनकी हालत खराब हो रही थी। साथ में पचीस तीस हजार की सेना थी फिर भी बाप-बेटे को भरोसा नहीं था। कराड़ की छावनी में मुकर्रबखान ने नागोजी और गणोजी से आग्रहपूर्वक कहा था, "आप दोनों हमारे साथ चलिए।" "कठिन परिस्थिति और दुर्गम रास्ते से बाहर निकाल दिया न ? अब आगे का खुद देखिए। अन्यथा रायगढ़ से बड़ी फौज बाहर निकली तो ये लोग हमें पत्थरों से कुचल डालेंगे।" नागोजी ने कहा। “इसके अतिरिक्त यदि कहीं दाँव उल्टा पड़ा तो हम दोनों के घर अपनी जगह पर नहीं रहेंगे।" गणोजी ने स्पष्टीकरण दिया। नागोजी और गणोजी वहाँ से भाग खड़े हुए और मुकर्रबखान की चिन्ता बढ़ गयी। श्यामगाँव की घाटी तक सेना पहुँच गयी। वहाँ से कृष्णा के तट की बस्ती पर नजर डालते हुए मुकर्रब ने अपने बेटे से कहा, "बेटे इखलास ! इतनी बड़ी फतह हासिल करने पर लोग जश्न मनाते हैं, मगर ये दोनों बदतमीज तो डरकर भाग गये। इसका मतलब यह है कि हम अभी भी खतरे से बाहर नहीं हैं।" महाराज की दृष्टि आसपास के वनों और मैदानों पर घूम रही थी। क्षण-क्षण अपना स्वराज्य पीछे छूटता जा रहा था। रास्ते में किसी नाले या झरने के आने पर जान उसमें गूँथ जाती थी। रास्ते के समीप वाले पेड़-पौधों को बाँहों में भर लेने का मन होता था। मैं कहाँ जा रहा हूँ? मेरा स्वदेश मुझ पर इस तरह क्यों क्रुद्ध हो रहा है ? विजय के यश का अधिकारी होने पर भी कर्ण का रथ ऐन मौके पर युद्धभूमि की मिट्टी में अटक गया था। कवच कुंडल का दान करते हुए, अपने रक्तरंजित कानों को देखकर कैसा लगा होगा उस महान योद्धा को ? गुरुदक्षिणा के बहाने एकलव्य का अँगूठा काट लेने वाले गुरु द्रोणाचार्य और धोखे से पीठ में खंजर भोंकने वाले गणोजी की प्रवृत्ति में अन्तर ही क्या है ? सम्भाजी .: 689
शोक सन्ताप से भरी यह यात्रा समाप्त नहीं हो रही थी। कालरूपी घड़े का पानी उठकर ऊपर आ रहा था। पश्चाताप, सन्ताप, उद्वेग और अतीत-स्मृतियों से महाराज का शरीर सन्तप्त हो रहा था। "पिताजी कितनी गहरी है यह बाणकोट की खाड़ी... इसीलिए कहता हूँ शम्भू पीठ को हाथ से मत छोड़ो पिताजी आप ही तो कहते हैं, मछली के बच्चे को तैरना सिखाना नहीं पड़ता शम्भुराजा! कभी कभी भाग्य का पासा उल्टा पड़ जाता है शान्त सागर के भीतर से लहरों के पहाड़ उठते हैं शम्भू वह देखो लहरें-ही-लहरें शम्भू कहाँ चले? शम्भुराजा? 'मराठों के राजा को शत्रु लेकर दूर चला जा रहा है। शम्भुराजा को जिन्दा पकड़ लिया है।' ऐसी चीख-पुकार गाँवों वनों जंगलों में सुनाई पड़ने लगी। रास्ते के सारे गाँव और कस्बे घबरा गये। प्रजा के मन में शिवाजी महाराज और सम्भाजी का स्थान देवता के समान था। वह अशुभ समाचार सुनकर गाँव के लोग आक्रोशित हो गये। स्त्रियाँ और बच्चे भी जोर-जोर से रोने-कलपने लगे। जिन्होंने पहले स्वराज्य के सैनिक के रूप में अपना घोड़ा नचाया था, उनके शरीर में आग भड़क उठी। म्यान से तलवारें निकालकर वे अपनी-अपनी घुड़सालों की ओर भागे। किन्तु लम्बे अकाल ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। घुड़साल में सूने खूँटे और सूनी नाँद की दशा देखी न जाती थी। उनके पास घोड़ा नहीं है, इस अनुभव से उनका कलेजा फटा जा रहा था। माथे पर धूप चिलचिला रही थी। लू की गर्मी सहन नहीं हो पा रही थी। घोड़े को लगाम लगाने की तरह दोनों के मुँह बाँधे गये थे। शरीर पर पसीने की धारा बह रही थी। गला सूखा जा रहा था। घोड़े पर बँधे शम्भुराजा का मन ग्लानिग्रस्त हो रहा था। भरी गगरी की तरह काल हिल रहा था। ए शम्भूदादा, शम्भूदादा... चुप रह पागल। तुम्हारे साथ मैं बरगद की जटाएँ खेल रहा हूँ तो क्या हुआ? हमारी शादी हो चुकी है बड़े होकर हम घर-संसार बसाएँगे। अच्छा बोल क्या चाहिए तुम्हें? शृंगारपुर के केशव पंडित का प्रयोगरूप रामायण मैंने देखा 690 :: सम्भाजी
उसमें दुष्ट रावण सीता का अपहरण कर रहा है बेचारा राम कितना दुखी दिखाई दे रहा था? चलता है बालिके, वियोग-विरह जैसे शब्दों का भी बड़ा गहरा अर्थ होता है। परन्तु देखो मुझे एक शंका होती है। हाँ शम्भूदादा देखिए बेचारी सीता माई अकेली अपनी कुटी में बैठी है और बाहर ही बाहर कोई राम को ही भगाकर ले जाये तो? पागल कहीं की। राम को भगाकर ले जाये तो? ऐसा उल्टा रामायण रचने का साहस? ऐसा साहस किसी में होगा क्या? रास्ते में अनेक गढ़ियाँ थीं। गाँव-गाँव के जमींदार कोई कोई देशमुख तो कोई देशपाण्डे थे। भयभीत प्रजाजन इन लोगों की ओर भाग रहे थे। उनके दरवाजों पर अपनी व्यथा व्यक्त कर रहे थे, "जमींदार साहब! धोखा हो गया है। कुछ कीजिए, हमारे शम्भूराजा को बचाइये।" जागीरदार और जमींदार बड़ी उलझन में पड़े थे। परन्तु अन्दर से उन्हें प्रसन्नता थी। उनके चेहरे पर भय था। वे सोच रहे थे—क्या सचमुच शम्भूराजा कैद हो गया? वे घर के भीतर जाकर खुशी से शराब का घूँट लेते थे। पिछले कुछ वर्षों में जबसे स्वराज्य आया जागीरदारी और गढ़ियों का वैभव समाप्त हो गया था। अब ऐसा नहीं था कि वे जो कुछ करें वही कानून हो। अन्यायी जागीरदारों के लिए हिन्दवी स्वराज्य एक संकट था। इसीलिए शम्भूराजा के कैद हो जाने के समाचार से उन्हें गुदगुदी होने लगी। वे ऊपरी तौर पर प्रजा को सान्त्वना देने का प्रयास कर रहे थे "भाइयो! इतनी गड़बड़ मत करो। राजा को कुछ नहीं होगा। हम किस दिन के लिए हैं?" "परन्तु सरकार! खान की सेना पुसेसावली के मैदान तक पहुँच चुकी है। राजा और कविराज को बीच में ले रखा है। चारों ओर से पचीस हजार की फौज है।" "कितनी फौज बताई?" "पचीस हजार।" "सुना आप लोगों ने इतनी बड़ी फौज शत्रु के पास है। तो यहाँ इकट्ठे हुए पचास-साठ हट्टे कट्टे लोगों से क्या होगा?" "हम जलकर राख हो जाएँगे। हम हर तरह का खतरा उठाएँगे परन्तु अपने शम्भूराजा को छुड़ाकर ले आएँगे।" सम्भाजी :: 691
उन उत्साही युवकों, बूढ़ों, स्त्रियों और बच्चों पर जमींदार लोग दृष्टि डालते थे और सूझबूझ की मुद्रा में कहते थे, "ऐसी भूल मत करो। खान की सशक्त सेना अपने गाँव पर आक्रमण कर देगी तो अपना सारा गाँव जलकर खाक हो जाएगा।" आँसू भरी आँखों से युवक कहते, "तो सरकार हम करें तो क्या करें?" "हम हैं न? चिन्ता क्यों करते हो? हमने अभी कुछ देर पहले बुध के जमींदार साहब के पास घोड़ा भेजा है। उन लोगों की भी सलाह लेंगे। थोड़ा समय लगेगा, परन्तु सभी मिलकर राजा को छुड़ाएँगे।" आवेश से प्रज्वलित युवकों के उत्साह पर बड़े कौशल से व्यवस्थित रूप से पानी डाला जा रहा था। पाँच तीसरे दिन भोर होते होते धनाजी और सन्ताजी पाचाड़ पहुँच गये। महारानी येसूबाई पाँच-छह हजार की सेना तैयार करके नीचे उतर आयी थीं। अत्यन्त दुखी धनाजी और सन्ताजी की ओर देखा न जाता था। राजमन्दिर में अनुभवी लोगों के साथ विचार-विमर्श हुआ। येसाजी कंक के साथ परामर्श करके येसूबाई ने अपनी राय प्रकट की, "अनेक गढ़ों-किलों से फौज हटाकर खान के पीछे भागना ठीक नहीं होगा। यदि दूसरी ओर से बादशाह की सेना ने आक्रमण किया तो धोखा हो जाएगा।" खंडो बल्लाल ने समर्थन करते हुए कहा, "सच है महारानी।" कुल सात-आठ हजार की फौज लेकर बाहर निकलने का निश्चय किया गया। महारानी घोड़े पर सवार हुईं। ताराऊ और राजाराम को पीछे छोड़कर, 'हर हर महादेव' का उद्घोष करती हुई सेना बाघोली घाटी के नीचे उतरने लगी। यम के दाँतों तले से अपने सत्यवान को खींच ले आने वाली सावित्री का शौर्य येसूबाई में सम्भ्रमित हो गया था। धनाजी और सन्ताजी के घोड़े रणोन्माद से उन्मत्त हो गये थे। बाघोली की घाटी पार होते न होते हंबीरराव के भाई हैबतराव सामने आ गये। वे रायगढ़ के लिए ही निकले थे। रास्ते में महारानी को घोड़े पर सवार देखकर हैबतराव मोहिते घोड़े से नीचे उतर पड़े। रकेब में पड़े महारानी के पैरों को पकड़कर वे जोर-जोर से रोने लगे। वे छोटे बच्चे से भी अधिक अधीर हो गये थे। येसूबाई को ही उनका धीरज बँधाना पड़ा। येसूबाई ने कहा, "पोंछ डालिए अपने आँसू। उल्टी दिशा में लौट पड़िए। सम्भाजी राजा को छुड़ाकर ही रायगढ़ जाएँगे।" 692 :: सम्भाजी
"अब कहाँ से और कैसे छुड़ाएँगे हम उन्हें, महारानी ? परसों दोपहर में ही मुकर्रबखान ने श्यामगाँव की घाटी छोड़ दी। उसके साथ पचीस हजार की तैयार सेना है।" "अरे यह क्या हो गया ? महाराज हमारी आँखों से दूर चले गये।" ऐसा कहकर जोत्याजी केसकर और रायप्पा रोने लगे। अब तक बहुत आघात हुए थे। उनसे कभी न डरने वाली येसूबाई हताश दिखाई देने लगीं। वे घोड़े से नीचे उतर पड़ीं। दुखी मन से उन्होंने अपनी नजर चारों ओर घुमाई। आसमान बोझिल हो गया था। ऐसा लगा मानो दुखद समाचार सुनकर बादलों ने भी अपनी यात्रा स्थगित कर दी थी। महारानी की यह अवस्था देखकर धनाजी और सन्ताजी भी घोड़े से उतर पड़े। महारानी के सामने हाथ जोड़कर उन्होंने कहा, "महारानीजी आप चिन्ता न करें। हम फौज लेकर भागते हुए आगे जाएँगे और शत्रु के कब्जे से महाराज को छुड़ाकर ले आएँगे।" येसूबाई का गला भर आया। जैसे किसी व्यक्ति के कलेजे में कटार घुस जाये और उस पीड़ा को सहन करते हुए वह बोले, उसी तरह येसूबाई बोलीं, "ऐसा नही लगता कि इसका कुछ उपयोग हो सकेगा।" "क्यों ? महारानी क्यों? हमें आगे उड़ान भरने की आज्ञा तो दीजिए।" दोनों हठ करने लगे। "महाराज ने ही एक बार अपनी काव्यमयी शैली में एक दृष्टान्त बताया था। 'यक्ष किन्नरों का महत्त्व भगवान के दरबार में होता है। वे नीचे धरती पर आ जाते हैं तो मिट्टी के पुतले बन जाते हैं'।" "इसका अभिप्राय महारानीजी ?" "कराड़ से आगे पूरब का सारा प्रदेश समतल और बिना जंगल घाटियो का है। वहाँ अपना कोई दाँव नहीं चलेगा।" "ऐसा क्यों? हंबीरमामा की फौज ने तो बागलाण से लेकर कर्नाटक तक अपना घोड़ा दौड़ाया था।" "अचानक आगे बढ़कर आक्रमण करना, शत्रु को हैरान करना एक बात है किन्तु बादशाह की चार लाख की फौज से आमने सामने मुकाबला करना एकदम दूसरी स्थिति है।" वृद्ध अनुभवी लोगों और उत्साही युवकों का एकत्र विचार विमर्श हुआ। दुर्भाग्य से मुकर्रबखान अपने प्रदेश की सीमा पार करके कब का आगे निकल गया था। इस स्थिति को बिना समझे अन्धों की तरह आगे बढ़ते जाना सह्याद्रि के भीतर बने किलों को भी गँवा देना हो सकता है। महारानी ने कहा, "ऐसे समय में सम्भाजी . 693
महाराज ही कोई उपाय सुझा सकते हैं। किन्तु मगरमच्छ की मुट्ठी में फँसे महाराज तक पहुँचें कैसे?" इस चर्चा के दौरान रायप्पा को सिसकी आ गयी। उसने कहा, "कम से कम अब तो मुझे न रोकें। बारिश हो या तूफान, महाराज के पास कैसे पहुँचना है, इसे मैं देखूँगा।" खंडो बल्लाल ने मसौदा लिखा। महारानी ने उसे मुद्रांकित किया। सभी से विदा लेकर रायप्पा अपने भाई देवप्पा को साथ लेकर वहाँ से बाहर निकला। उनके घोड़े कराड़ की दिशा में दौड़ पड़े। सूर्य पश्चिम की ओर झुक गया था। पहाड़ और घाटियों में अँधेरा भरने लगा। लिंगाणा किले की ऊँची उठी गर्दन आज टूटी-सी दिखाई दे रही थी। धनाजी और सन्ताजी बहुत मायूस हो गये थे। महारानी के ललाट का कुंकुम माथे पर बिखर गया था। उन दोनों उद्विग्न तरुणों की ओर देखकर महारानी बोलीं, "धनाजी, सन्ताजी धीरज से काम लो। हमारा कुंकुम बचाने के लिए स्वराज्य का भाग्य फूटना नहीं चाहिए।" छह दोपहर का समय, बाहर की बंजर भूमि पर लू चिलचिला रही थी। औरंगजेब का डेरा अमदनगर के बंजर मैदान में पड़ा हुआ था। इन दिनों बादशाह ने अकलूज, अमदनगर जैसे नाम रख दिए थे। अकलूज, दौंड, चांभारगोंदा जैसे क्षेत्र सदैव अकाल की चपेट में आते थे। इसी कारण से फरवरी का महीना होने पर भी यहाँ तेज धूप निकली थी। दिन अनेक स्थानों पर मृगमरीचिका दिखाई पड़ती थी। इन दिनों औरंगजेब बादशाह बड़ी उलझन में था। कितनी बड़ी फौज, कितने वर्ष का समय, कितने धन का अपव्यय और कैसा दुर्भाग्य? वह काफिर का बच्चा सम्भा हाथ ही नहीं लग रहा था। औरंगजेब की जिन्दगी की यह सबसे बड़ी मुहिम एक मृगमरीचिका ही सिद्ध हो रही थी। बादशाह दरबार में अपने मुंशियों को कुछ लिखित सूचनाएँ दे रहा था। ऐसे समय में बादशाह के कार्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान महापाप समझा जाता। उच्चासन पर बैठा बादशाह कुछ बोल रहा था और मुंशी उसे लिख रहा था। इसी बीच एक दूत साहस करके बादशाह के पास आकर खड़ा हो गया। उसका वहाँ 694 सम्भाजी
पहुँचना और बादशाह के समीप खड़ा होना सामान्य स्थिति में इसे धोखादायक और आपत्तिजनक माना जाता। इतना ही नहीं इस प्रकार की धृष्टता किसी अन्य व्यक्ति ने की होती तो पहरेदारों ने उसके सिर को मुर्गे की तरह छाँट दिया होता। किन्तु उस दूत के वहाँ तक पहुँचने के पहले ही पहरेदारों में कानाफूसी शुरू हो गयी थी। साथ ही उनके चेहरे पर प्रसन्नता झलकने लगी थी। वह समाचार ही इतना आनन्ददायी था कि सभी सैनिक आनन्द से विह्वल हो रहे थे। हँसी के ऐसे फौवारे छूट रहे थे मानो कि सन्तानहीन सम्राट को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई हो। बाहर से आने वाली आनन्द लहरियों से भीतर बैठे लोग चकित हो रहे थे। वे ठीक ठीक समझ नहीं पा रहे थे कि वहाँ क्या हो रहा है? अष्टावधानी बादशाह सावधान था। मसौदा लिखाने में व्यस्त होने पर भी दरबार की गतिविधियों पर उसकी कड़ी नजर थी। उसके सेवक कोई खुशी की खबर देने के लिए बेताब हो रहे हैं इसका अन्दाजा उसकी अनुभवी नजरों ने पहले ही कर लिया था। परन्तु यह खुशी की खबर ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकती है, इसका भी अनुमान उसने कर लिया था। इसलिए बिना विचलित हुए अपना कार्य करता रहा। परन्तु थोड़ी देर में शराब पिलाए गये ऊँट की तरह उसका सेवक बेताब होने लगा। इस बात के ध्यान में आते ही वह विचलित हुआ। अपना कार्य छोड़कर बड़े कठोर स्वर में बादशाह ने दूत से पूछा "क्या बात है?" बादशाह ने दूत की ओर नफरत से देखा और व्यंग्यपूर्ण शब्दों में बोला "ईरान में हमारे बेवकूफ अकबर का कुछ भला बुरा हुआ है क्या?" "नहीं आलमपनाह! इससे बड़ी बहुत बहुत बड़ी खुशी की खबर है। वह शैतान सम्भा कैद हो गया।" "कौन?" बादशाह ने अपनी गर्दन झट से घुमाई। "वही, शैतान सम्भा।" "क्या हुआ उसका?" "कैद हो गया। अपने हाथ लग गया।" "किसने कैद किया?" बादशाह ने धीमे स्वर में पूछा। "मुकर्रबखान ने।" "कहाँ?" "सह्याद्रि की घाटी में।" बादशाह ने अविचल भाव से उस दूत को अपने पास बुलाया। उसे अपने कानों तक आने दिया। किन्तु इसके बाद बादशाह का धैर्य छूट गया। वह झट से उठकर खड़ा हो गया और पटापट दूत के गालों पर चोटें जड़ दिये। बादशाह की गोरी चिट्टी मुखमुद्रा क्रोध और अविश्वास से तप्त हो गया। उसका हाथ रुक नहीं रहा था। किन्तु मार खाने वाले दूत की हँसी भी कम न हो सम्भाजी 695
रही थी। बादशाह ने क्रोध से कहा, “तेरी ये हिम्मत? आलमगीर का मजाक उड़ा रहा है?” औरंगजेब के मन में एक क्षण के लिए आया कि इस पागल दूत को खौलते हुए तेल के कड़ाह में फेंकने का हुक्म दे दे। बादशाह की नजर सामने गयी तो उसने देखा कि उसके पोते, सभी अमीर उमराव, नजदीकी सरदार, बादशाह के तम्बू की ओर भागते हुए आ रहे हैं। जिस प्रकार नमाज पढ़ते समय घुटनों पर झुकते हैं उसी प्रकार सभी घुटनों पर झुक गये थे। हाथ ऊपर उठाकर और आँखों में आँसू लिये सभी ने एक स्वर से कहा, “अल्लाहोऽऽ अकबर, अल्लाहोऽऽ अकबर।” बाहर हँसी के फव्वारे छूट रहे थे। बादशाह के हुक्म के बिना ही ढोल तासे बजने लगे थे। सभी किसी मंगल की सूचना दे रहे थे। समाचार की पुष्टि की आवश्यकता अब नहीं थी। बादशाह के चेहरे की क्रोधभरी वक्र रेखाएँ अब समाप्त हो गयी थीं। आनन्दातिरेक से बादशाह ने अपने मुँड़े हुए सिर पर हाथ रखा। उसके बाल अब बिलकुल पतले हो गये थे। उसके सिर पर विगत छह वर्षों में किसी ने ताज नहीं देखा था। परन्तु उसकी कोई ग्लानि अब उसके चेहरे पर नहीं थी। खुशी से उसका चेहरा रक्ताभ होकर दमक रहा था। बादशाह की आँखों से भी आनन्दाश्रु टपक पड़े। वह भी घुटने टेककर बैठ गया। आसमान की ओर आँखें उठाकर खुदा की इबादत करने लगा, “या खुदा या अल्लाह! शायद आसमान में बैठे फरिश्ते ने मेरी आवाज सुन ली होगी। अल्लाह के नाम से की गुहार जन्नत तक पहुँची होगी। दीन दुनिया के बादशाह अल्लाह तेरा लाख लाख शुक्र।” बादशाह का अभिनन्दन करने के लिए असदखान समीप आ गये, तब असदखान का हाथ अपने हाथ मे लेकर बादशाह ने प्रसन्नता से कहा, “असदखान, अल्लाहताला के हम बहुत एहसानमन्द हैं। अल्लाह ने मेरे जैसे नाचीज पर बड़ी मेहरबानी की है। उसने हमें ऐसा उपहार दिया है जिसे पाकर मैं इतना खुश हूँ कि कोई जन्मान्ध आँखें पाकर या सन्तानहीन सन्तान पाकर भी इस तरह खुशी से पागल न होगा।” सात इधर मुकर्रबखान का दल बहादुरगढ़ की ओर बढ़ रहा था और उधर बादशाह की चिन्ता बढ़ रही थी। वह अधिक सावधान होने लगा था। इतने वर्षों का संघर्ष एक 696 सम्भाजी
बार समाप्त हो गया था। खुदा ने मेहरबानी की थी। प्रसन्नता से सभी की नींद उड़ गयी थी। किन्तु बादशाह को अपनी छाया से भी भय लगता था। अनेक बार वह चिन्तित हो जाता था, अपनी चौकन्नी नजरों से इधर उधर देखते हुए डेरे से बाहर आ जाता था। भीमा नदी के विशाल तट के आसपास किसी बड़े पहाड़ या गहरी खाई जैसी छिपने की जगह नहीं थी। इसलिए टिड्डी दल की तरह अचानक मराठा फौज के टूट पड़ने की कोई सम्भावना नहीं थी। किन्तु मुकर्रबखान कोई भेड़ बकरी लेकर बादशाह के पास नहीं आ रहा था। वह बागी शिवाजी के पुत्र को बाँधकर खींचता हुआ बादशाह के पास ले आ रहा था। थोड़ी-सी असावधानी से भी रंग में भंग हो सकता था। इसका बादशाह को पूरा ज्ञान था। बादशाह वजीरे-आजम असदखान से बार-बार पूछता था, “शेख मुकर्रब के साथ कितनी फौज है?” असदखान का जवाब होता, “पचीम हजार।” अपने विश्वसनीय गुप्तचरों से बादशाह बार बार इस संख्या की पुष्टि करता। अपनी फौजी शक्ति के प्रति आश्वस्त होने पर भी बादशाह का डर कायम था। सम्भाजी की गिरफ्तारी के समाचार ने बादशाह के सैनिकों और मरदागों को खुशी से पागल कर दिया था। यह सोचकर कि दक्खिन का दशावतार समाप्त हुआ, लोग प्रसन्न हो रहे थे। उन्हें लगता था कि शीघ्र ही दक्खिन से उत्तर जाने का अवसर मिलेगा। समीपी रिश्तेदार और सरदार बादशाह की खुशी में सम्मिलित होने के लिए बहादुरगढ़ की ओर दौड़ पड़े थे। बादशाह ने एक सुबह असदखान को हुक्म दिया, “वजीरे आजम! यहाँ चंभारगोंदा, अकलूज, पंढरपुर, दौंड आदि इलाकों में शीघ्रता से एक फरमान जारी कीजिए।” “जी मेरे आका!” “सभी काफिरों को सूचित कर दीजिए कि किसी की घुड़साल में, किसी के दरवाजे पर, या रास्ते पर एक भी घोड़ा दिखाई नहीं पड़ना चाहिए।” “लेकिन-लेकिन जहाँपनाह ऐसा कैसे हो सकता है? वे अपने जानवरों को भेजेंगे कहाँ?” “कुछ दिनों के लिए उन्हें अपनी घुड़साल खाली करनी पड़ेगी। अपने अपने जानवर चाहे हट्टे-कट्टे हों या दुबले, उन्हें बाजार में या रिश्तेदारों के घर भेजना होगा। परन्तु यदि कोई मराठा बच्चा, दिन में या रात में घोड़े पर सवार दिखाई देगा तो उसके हाथ या पैर तोड़ दिये जाएँगे।” हुक्म की तामील जल्दी ही की गयी। रात मे ही आस-पास के सभी घोड़े गायब हो गये। सबेरे एक बार मसनद के साथ बैठ जाने पर दोपहर तक तम्बू में बने सम्भाजी :: 697
रहना बादशाह का रोज का नियम था। किन्तु पिछले चार दिनों से बादशाह बहुत बेचैन था। तम्बू के भीतर बैठे उससे रहा ही न जाता था। चन्दनी अम्बारी में सजे और सूँड़ से पूँछ तक स्वर्णांलंकारों को धारण किये अपने शानदार हाथी पर वह बड़े ठाट से बैठता। उसके आगे-पीछे पाँच पाँच सौ घुड़सवारों की सेना रहती। बादशाह भैरवनाथ मन्दिर के समीप वाली लम्बी सीमारेखा को पार करता। वहाँ से उसका काफिला पूरब की ओर सरस्वती के सूखे पाट में घुस जाता। वहाँ से काफिला खंडोबा के विस्तृत समतल मैदान पर पहुँच जाता। औरंगजेब अपने हाथी पर से अपनी नजर चारों ओर घुमाता। बहादुरगढ़ के आसपास की धूप उसे परेशान करती। वह मन ही मन कहता, "अल्ला करें, उस जहन्नमी सम्भा का यहाँ आना मृगजाल न बन जाय।" इन विचारों से बादशाह काँप उठता था। दोपहर के बाद बादशाह का काफिला नदीतट की दूसरी ओर एक चक्कर लगाता था। यह काफिला जब दमड़ी मस्जिद के सामने पहुँचता तो मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठा बूढ़ा फकीर अपने झुलसे होठों पर काली चिलम रखता और फूँकते हुए बादशाह को देखकर जोर से हँसता। बहादुरगढ़ और उसके आस-पास के इलाके की चार लाख की बस्ती में यह फटीचर फकीर अकेला व्यक्ति था जो औरंगजेब को दूसरों की तरह झुककर सलाम नहीं करता था। फकीर होने के बावजूद बादशाह के सामने झोली नहीं फैलाता था। उसने स्वयं एक एक दमड़ी इकट्ठी करके दमड़ी मस्जिद खड़ी कर ली। उस फकीर की अनासक्त मुद्रा देखकर बादशाह को शिवाजी महाराज का स्मरण हो आता था। शिवाजी नाम के एक जमींदार ने फकीर क़ी दमड़ी की तरह ही एक-एक व्यक्ति को एकत्र किया था और हिन्दवी स्वराज्य का एक मंगल मन्दिर खड़ा कर लिया था। शिवाजी समाप्त हुए तो बादशाह ने सन्तोष से अपनी आँखें बन्द कर ली थीं किन्तु उसकी आँखें खुलें इसके पहले ही दूसरी घटना घट गयी। सम्भाजी नाम का गरुड़ स्वराज्य मन्दिर के कलश पर अपने बलशाली डैने फैलाए जमकर बैठ गया था। उसके पंख जलाने के लिए आतुर बादशाह को निरन्तर भ्रमण करते हुए दक्षिण में अपने जीवन के आठ वर्ष गुजारने पड़े थे। उसकी दहशत बादशाह ही नहीं उसके सैनिकों और जानवरों पर इतनी गहरी बैठ गयी थी कि सम्भाजी सचमुच गिरफ्तार हुआ है क्या ? यदि हुआ है तो मुगल सेना तक पहुँचेगा क्या ? ऐसी अनेक शंकाएँ शहंशाह को घेर रही थीं। भीमा नदी के नीले पाट में बादशाह की फौज का प्रतिबिम्ब दिखाई देने लगता। बादशाह का हाथी चाँदबीबी महल के सामने रुक जाता था। नौकर जल्दी से सीढ़ियाँ लेकर, दीवार की तरह ऊँचे हाथी से लगाते थे। बादशाह बड़े अभिमान से नीचे उतरता था, फिर जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर जाकर महल के छज्जे में खड़ा हो जाता था। वहाँ से कभी नदी के विस्तृत पाट को कभी पीलखाने की 694 सम्भाजी
ओर देखता था। बीच-बीच में महल के दरवाजे के पास ढह गये भग्नावशेष को देखता था। वहीं पर कभी एक सातमंजिला महल था, जो अब मिट चुका है। उसी जगह पर एक गुप्त खजाना है, ऐसी अफवाह पूरे बहादुरगढ़ में फैली थी। वहाँ के गुप्त धन को प्राप्त करने का पागल प्रयास अनेक साहसी लोगों ने किया था। किन्तु वहाँ कुदाल मारते ही भयानक चमत्कार घटित होता था। बड़े बड़े डसने वाले जहरीले भौंरे बहुत बड़ी संख्या में निकलते थे और शरीर के अंग प्रत्यंग को बींधने लगते थे। बादशाह इन्हें मूर्खताभरी बातें मानता और उपेक्षा करता। उस दिन बादशाह बहुत देर तक छज्जे में खड़ा रहा। उस ढहे हुए अवशेष को ध्यान से देखता रहा। उसी के नीचे गुप्त धन है यह बात उसके ध्यान में आती रही। उस रात बादशाह ने एक भयानक सपना देखा— स्वयं बादशाह के हाथों में एक बड़ा गहदाला था। वह स्वयं, उसका वजीर, उसके शहजादे, पोते और सरदार बड़े परिश्रम से उस जगह को खोद रहे थे। वे भी पसीने से तरबतर हो गये थे। अन्ततः वे गुप्त धन की सन्दूक तक जा पहुँचे। सन्दूक के अन्दर बहुत कीमती जवाहरात चमक रहे थे। सबसे बड़ा तेजस्वी हीरा बादशाह ने झपटकर ले लिया। तेईस साल पहले बादशाह ने आगरे में दो पानीदार चमकती आँखे देखी थीं। उनकी चमक इन्हीं हीरों जैसी थीं। वे आँखें सम्भाजी महाराज की थीं। वही अनमोल हीरा अचानक हाथ में आ गया था। इसलिए बादशाह प्रसन्न होकर खिलखिलाकर हँसने लगा। उसके साथ दमड़ी मस्जिद वाला फकीर भी जोर जोर से हँसने लगा। इसी बीच बगल से भौंरों का दल उठा। उनकी विचित्र और विकट ध्वनि सुनाई देने लगी। एक ही साथ दसों दिशाओं में भौंरों ने बादशाह पर हल्ला बोल दिया। 'हर हर महादेव, हर हर महादेव' का उद्घोष होने लगा। जहाँ देखिए वहाँ भौंर ही भौंर। भौंरों ने बादशाह के लिए दिल्ली की राह रोक दी थी। भौंरों के झुंड के पार एक सूनी जगह पर बादशाह को अपनी कब्र दिखाई देने लगी। उस पर बिछी चादर के टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। उस भयानक सपने से बादशाह का गला सूख गया। वह आधी रात में ही बिछौने से उठ गया। बाहर बैठक में आकर उसने अपने वजीर, सेनापति और शहजादों को जगा दिया। सभी पर एक तीखी नजर डालकर केवल इतना ही कहा "असदखान जुल्फिकार, बरायदखान अभी का अभी हुक्म की तामील करो। कम से कम तीस हजार की फौज किले के बाहर तैयार करो। आसपास के सौ डेढ़ सौ गाँवों में फौज भेज दो।" "लेकिन लेकिन हुजूर! हुक्म की तामील हो गयी है। किसी भी गाँव में घोड़ा तो क्या कोई खस्ताहाल खच्चर भी नहीं बचा है।" असदखान ने कहा। सम्भाजी ७१५