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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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“धनाजी तुम ऐसे ही हो। हमेशा मेरे उत्साह पर पानी फेर देते हो।” सन्ताजी ने रुआँसा होकर कहा। धनाजी ने आगे बढ़कर सन्ताजी को गले से लगा लिया। धनाजी उन्हें समझाते हुए बोले, “सन्ताजी, भावना के आधार पर नहीं बुद्धि के सहारे से लड़ो। ऐसा अपने शम्भूराजा क्यों कहते थे? इस पर भी थोड़ा सोचो, थोड़ा विचार करो। अपने सेनापति, आपके पिता अभी कल ही शहीद हो गये। महाराज को मुगल ले गये। सेनापति दिवंगत हो गये। अपनी मातेश्री महारानी रायगढ़ पहुँचीं कि नहीं, इसका भी पता हमें नहीं है। “तो हम क्या करें?” “यहाँ आंबा घाटी में सुरक्षा के लिए दो हजार सैनिकों को छोड़कर बाकी सेना को लेकर हमें रायगढ़ पहुँचना है। वहाँ महारानी की राय लेंगे। सन्ताजी अपने महाराज को कराल काल खींचकर ले गया है। कम-से-कम राजधानी तो बचाएँ। वह भी चली गयी तो?—मेरे भाई तब तो संसार ही डूब जाएगा।” एक हाथ से आँसू पोंछते-पोंछते सन्ताजी ने दूसरा हाथ अपनी कमर की पेटी पर रखा। सभी ने अपनी कमर कस ली। कृष्णाजी के साथ दो हजार की फौज रख दी गयी। पुनः सभी लोग रात में ही आंबाघाट उतरने लगे। उन्हें शीघ्रातिशीघ्र राजधानी रायगढ़ पहुँचना था। तीन उस सूनी शाम को महारानी येसूबाई राजप्रासाद के भव्य तुलसी चौरे के पास बैठी थीं। वे चिन्तित होकर सोच रही थीं कि उनसे पहले पहुँचने का आश्वासन देने वाले शम्भूराजा अभी तक क्यों नहीं आये? इसी समय तीन घुड़सवार वहाँ प्रस्तुत हुए। उनके पीछे-पीछे येसाजी कंक और उनके साथी उसी ओर आते दिखाई पड़े। उन सभी के घबराये चेहरे को देखकर महारानी का कलेजा धड़कने लगा। तीनों घुड़सवार घोड़े से उतर पड़े। महारानी के पैर पकड़कर जोर-जोर से रोते हुए कहने लगे, “रानी सरकारऽऽ हमारे ऊपर पहाड़ टूट पड़ा है, गजब हो गया है गजब। शत्रु अपने महाराज को पकड़कर ले गये।” सम्भाजी 685