छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 690, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंखंडो बल्लाल ने आश्वस्त किया। महारानी येसूबाई और उनकी देवरानी ताराबाई सारी रात जागती रहीं। दूसरे दिन युद्ध पर निकलने का निश्चय किया गया था। बहुत-सी तैयारी हो चुकी थी। सभी लोग अपने-अपने लिए निश्चित कार्य के लिए निकल गये थे। राजमहल सूना हो गया था। महाराज को स्मरण करते हुए महारानी को आवेश आ गया। वे देवघर की ओर दौड़ पड़ीं और भवानी माता के चरणों में गिर पड़ीं। उनके मन से मालेघाट, शिर्के लोगों का क्षेत्र और गणोजी का ध्यान हट नहीं रहा था। 'येसूऽ तुझे विधवा हुआ देखना मुझे बहुत अच्छा लगेगा।' गणोजी के इन विषैले शब्दों का उन्हें स्मरण हुआ। यह स्मरण होते ही वे थरथरा उठीं और विह्वल होकर रोने लगीं। उनके मुँह से शब्द निकले, 'भाई साहब आपने अपनी छोटी बहन पर अच्छा उपकार किया है। भैयादूज की ऐसी भयानक भेंट संसार के किस भाई ने दी होगी?' चार जैसे किसी चोर-उचक्के के हाथ अचानक कोहिनूर जैसा अनमोल हीरा लग जाये और उसकी रक्षा की चिन्ता में वह पूरी तरह घबरा जाये वही स्थिति मुकर्रब की हो रही थी। शम्भू महाराज जैसा अकल्पित शिकार उसके हाथ लग गया था। अब उसका एकमात्र लक्ष्य था उसे जल्दी से जल्दी औरंगजेब को सौंप देना। इसके लिए वह रात दिन एक कर रहा था। उसने दो दिन के भीतर ही इस्लामपुर औंध मिरज, रहिमतपुर जैसी आसपास की जगहों से पच्चीस-तीस हजार की मुगल सेना तैयार की। शम्भुराजा और कविराज को बीच में करके यह सेना जल्दी जल्दी आगे बढ़ी। कृष्णा और कोयना का क्षेत्र पीछे छूट रहा था। दोपहर का विश्राम लेकर सामने के पहाड़ की श्यामगाँव घाटी में पहुँचना था। वहाँ पहुँचने के पहले प्राकृतिक कारणों से भी रुकना नहीं है। ऐसा खान का हुक्म था। शम्भू महाराज की भावभरी दृष्टि आसपास के क्षेत्र पर बार-बार घूम रही थी। वसन्तगढ़ की तलहटी और फिर पायथे के तलबीड गाँव पर उनकी दृष्टि अटक गयी। शम्भुराजा को हंबीरमामा का स्मरण हो आया। उनके अन्तःकरण में प्रश्न 688 सम्भाजी