छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउभरा, 'मामा यदि आप आज होते तो?' कविराज का मन निरन्तर क्रन्दन कर रहा था। कृष्णा कोयना के आसपास का परिसर पीछे छूटता जा रहा था। शम्भू महाराज की स्थिति देखकर उनका कलेजा तार तार हो रहा था। सामने की पहाड़ी पार हुई। कराड़ के समीप का संगम स्थान पीछे छूटने लगा। फौज मुगलों के शासन क्षेत्र की ओर मुड़ गयी। इसी समय कवि कलश में आवेश आ गया। वे हाथ उठाकर जोर जोर से गा उठे मानो किसी कवि सम्मेलन में कविता पाठ कर रहे हों— गले लिपट कृष्णा नदी, कह कोयना बिलखाय। दीदी लख ये यवन खल, शिवा सुवन ले जाय।। “चलो भागो, चलो जल्दी करो,” मुकर्रब और इखलास चिल्ला रहे थे। उन्हें अभी भी इस बात का भय था कि मराठी सेना कहीं से अचानक टूट पड़ेगी और इस प्रकार आक्रमण करके अपना दुर्लभ यश छीनकर ले जाएगी। इसी चिन्ता से उनकी हालत खराब हो रही थी। साथ में पचीस तीस हजार की सेना थी फिर भी बाप-बेटे को भरोसा नहीं था। कराड़ की छावनी में मुकर्रबखान ने नागोजी और गणोजी से आग्रहपूर्वक कहा था, "आप दोनों हमारे साथ चलिए।" "कठिन परिस्थिति और दुर्गम रास्ते से बाहर निकाल दिया न ? अब आगे का खुद देखिए। अन्यथा रायगढ़ से बड़ी फौज बाहर निकली तो ये लोग हमें पत्थरों से कुचल डालेंगे।" नागोजी ने कहा। “इसके अतिरिक्त यदि कहीं दाँव उल्टा पड़ा तो हम दोनों के घर अपनी जगह पर नहीं रहेंगे।" गणोजी ने स्पष्टीकरण दिया। नागोजी और गणोजी वहाँ से भाग खड़े हुए और मुकर्रबखान की चिन्ता बढ़ गयी। श्यामगाँव की घाटी तक सेना पहुँच गयी। वहाँ से कृष्णा के तट की बस्ती पर नजर डालते हुए मुकर्रब ने अपने बेटे से कहा, "बेटे इखलास ! इतनी बड़ी फतह हासिल करने पर लोग जश्न मनाते हैं, मगर ये दोनों बदतमीज तो डरकर भाग गये। इसका मतलब यह है कि हम अभी भी खतरे से बाहर नहीं हैं।" महाराज की दृष्टि आसपास के वनों और मैदानों पर घूम रही थी। क्षण-क्षण अपना स्वराज्य पीछे छूटता जा रहा था। रास्ते में किसी नाले या झरने के आने पर जान उसमें गूँथ जाती थी। रास्ते के समीप वाले पेड़-पौधों को बाँहों में भर लेने का मन होता था। मैं कहाँ जा रहा हूँ? मेरा स्वदेश मुझ पर इस तरह क्यों क्रुद्ध हो रहा है ? विजय के यश का अधिकारी होने पर भी कर्ण का रथ ऐन मौके पर युद्धभूमि की मिट्टी में अटक गया था। कवच कुंडल का दान करते हुए, अपने रक्तरंजित कानों को देखकर कैसा लगा होगा उस महान योद्धा को ? गुरुदक्षिणा के बहाने एकलव्य का अँगूठा काट लेने वाले गुरु द्रोणाचार्य और धोखे से पीठ में खंजर भोंकने वाले गणोजी की प्रवृत्ति में अन्तर ही क्या है ? सम्भाजी .: 689