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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

उभरा, 'मामा यदि आप आज होते तो?' कविराज का मन निरन्तर क्रन्दन कर रहा था। कृष्णा कोयना के आसपास का परिसर पीछे छूटता जा रहा था। शम्भू महाराज की स्थिति देखकर उनका कलेजा तार तार हो रहा था। सामने की पहाड़ी पार हुई। कराड़ के समीप का संगम स्थान पीछे छूटने लगा। फौज मुगलों के शासन क्षेत्र की ओर मुड़ गयी। इसी समय कवि कलश में आवेश आ गया। वे हाथ उठाकर जोर जोर से गा उठे मानो किसी कवि सम्मेलन में कविता पाठ कर रहे हों— गले लिपट कृष्णा नदी, कह कोयना बिलखाय। दीदी लख ये यवन खल, शिवा सुवन ले जाय।। “चलो भागो, चलो जल्दी करो,” मुकर्रब और इखलास चिल्ला रहे थे। उन्हें अभी भी इस बात का भय था कि मराठी सेना कहीं से अचानक टूट पड़ेगी और इस प्रकार आक्रमण करके अपना दुर्लभ यश छीनकर ले जाएगी। इसी चिन्ता से उनकी हालत खराब हो रही थी। साथ में पचीस तीस हजार की सेना थी फिर भी बाप-बेटे को भरोसा नहीं था। कराड़ की छावनी में मुकर्रबखान ने नागोजी और गणोजी से आग्रहपूर्वक कहा था, "आप दोनों हमारे साथ चलिए।" "कठिन परिस्थिति और दुर्गम रास्ते से बाहर निकाल दिया न ? अब आगे का खुद देखिए। अन्यथा रायगढ़ से बड़ी फौज बाहर निकली तो ये लोग हमें पत्थरों से कुचल डालेंगे।" नागोजी ने कहा। “इसके अतिरिक्त यदि कहीं दाँव उल्टा पड़ा तो हम दोनों के घर अपनी जगह पर नहीं रहेंगे।" गणोजी ने स्पष्टीकरण दिया। नागोजी और गणोजी वहाँ से भाग खड़े हुए और मुकर्रबखान की चिन्ता बढ़ गयी। श्यामगाँव की घाटी तक सेना पहुँच गयी। वहाँ से कृष्णा के तट की बस्ती पर नजर डालते हुए मुकर्रब ने अपने बेटे से कहा, "बेटे इखलास ! इतनी बड़ी फतह हासिल करने पर लोग जश्न मनाते हैं, मगर ये दोनों बदतमीज तो डरकर भाग गये। इसका मतलब यह है कि हम अभी भी खतरे से बाहर नहीं हैं।" महाराज की दृष्टि आसपास के वनों और मैदानों पर घूम रही थी। क्षण-क्षण अपना स्वराज्य पीछे छूटता जा रहा था। रास्ते में किसी नाले या झरने के आने पर जान उसमें गूँथ जाती थी। रास्ते के समीप वाले पेड़-पौधों को बाँहों में भर लेने का मन होता था। मैं कहाँ जा रहा हूँ? मेरा स्वदेश मुझ पर इस तरह क्यों क्रुद्ध हो रहा है ? विजय के यश का अधिकारी होने पर भी कर्ण का रथ ऐन मौके पर युद्धभूमि की मिट्टी में अटक गया था। कवच कुंडल का दान करते हुए, अपने रक्तरंजित कानों को देखकर कैसा लगा होगा उस महान योद्धा को ? गुरुदक्षिणा के बहाने एकलव्य का अँगूठा काट लेने वाले गुरु द्रोणाचार्य और धोखे से पीठ में खंजर भोंकने वाले गणोजी की प्रवृत्ति में अन्तर ही क्या है ? सम्भाजी .: 689

शोक सन्ताप से भरी यह यात्रा समाप्त नहीं हो रही थी। कालरूपी घड़े का पानी उठकर ऊपर आ रहा था। पश्चाताप, सन्ताप, उद्वेग और अतीत-स्मृतियों से महाराज का शरीर सन्तप्त हो रहा था। "पिताजी कितनी गहरी है यह बाणकोट की खाड़ी... इसीलिए कहता हूँ शम्भू पीठ को हाथ से मत छोड़ो पिताजी आप ही तो कहते हैं, मछली के बच्चे को तैरना सिखाना नहीं पड़ता शम्भुराजा! कभी कभी भाग्य का पासा उल्टा पड़ जाता है शान्त सागर के भीतर से लहरों के पहाड़ उठते हैं शम्भू वह देखो लहरें-ही-लहरें शम्भू कहाँ चले? शम्भुराजा? 'मराठों के राजा को शत्रु लेकर दूर चला जा रहा है। शम्भुराजा को जिन्दा पकड़ लिया है।' ऐसी चीख-पुकार गाँवों वनों जंगलों में सुनाई पड़ने लगी। रास्ते के सारे गाँव और कस्बे घबरा गये। प्रजा के मन में शिवाजी महाराज और सम्भाजी का स्थान देवता के समान था। वह अशुभ समाचार सुनकर गाँव के लोग आक्रोशित हो गये। स्त्रियाँ और बच्चे भी जोर-जोर से रोने-कलपने लगे। जिन्होंने पहले स्वराज्य के सैनिक के रूप में अपना घोड़ा नचाया था, उनके शरीर में आग भड़क उठी। म्यान से तलवारें निकालकर वे अपनी-अपनी घुड़सालों की ओर भागे। किन्तु लम्बे अकाल ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। घुड़साल में सूने खूँटे और सूनी नाँद की दशा देखी न जाती थी। उनके पास घोड़ा नहीं है, इस अनुभव से उनका कलेजा फटा जा रहा था। माथे पर धूप चिलचिला रही थी। लू की गर्मी सहन नहीं हो पा रही थी। घोड़े को लगाम लगाने की तरह दोनों के मुँह बाँधे गये थे। शरीर पर पसीने की धारा बह रही थी। गला सूखा जा रहा था। घोड़े पर बँधे शम्भुराजा का मन ग्लानिग्रस्त हो रहा था। भरी गगरी की तरह काल हिल रहा था। ए शम्भूदादा, शम्भूदादा... चुप रह पागल। तुम्हारे साथ मैं बरगद की जटाएँ खेल रहा हूँ तो क्या हुआ? हमारी शादी हो चुकी है बड़े होकर हम घर-संसार बसाएँगे। अच्छा बोल क्या चाहिए तुम्हें? शृंगारपुर के केशव पंडित का प्रयोगरूप रामायण मैंने देखा 690 :: सम्भाजी

उसमें दुष्ट रावण सीता का अपहरण कर रहा है बेचारा राम कितना दुखी दिखाई दे रहा था? चलता है बालिके, वियोग-विरह जैसे शब्दों का भी बड़ा गहरा अर्थ होता है। परन्तु देखो मुझे एक शंका होती है। हाँ शम्भूदादा देखिए बेचारी सीता माई अकेली अपनी कुटी में बैठी है और बाहर ही बाहर कोई राम को ही भगाकर ले जाये तो? पागल कहीं की। राम को भगाकर ले जाये तो? ऐसा उल्टा रामायण रचने का साहस? ऐसा साहस किसी में होगा क्या? रास्ते में अनेक गढ़ियाँ थीं। गाँव-गाँव के जमींदार कोई कोई देशमुख तो कोई देशपाण्डे थे। भयभीत प्रजाजन इन लोगों की ओर भाग रहे थे। उनके दरवाजों पर अपनी व्यथा व्यक्त कर रहे थे, "जमींदार साहब! धोखा हो गया है। कुछ कीजिए, हमारे शम्भूराजा को बचाइये।" जागीरदार और जमींदार बड़ी उलझन में पड़े थे। परन्तु अन्दर से उन्हें प्रसन्नता थी। उनके चेहरे पर भय था। वे सोच रहे थे—क्या सचमुच शम्भूराजा कैद हो गया? वे घर के भीतर जाकर खुशी से शराब का घूँट लेते थे। पिछले कुछ वर्षों में जबसे स्वराज्य आया जागीरदारी और गढ़ियों का वैभव समाप्त हो गया था। अब ऐसा नहीं था कि वे जो कुछ करें वही कानून हो। अन्यायी जागीरदारों के लिए हिन्दवी स्वराज्य एक संकट था। इसीलिए शम्भूराजा के कैद हो जाने के समाचार से उन्हें गुदगुदी होने लगी। वे ऊपरी तौर पर प्रजा को सान्त्वना देने का प्रयास कर रहे थे "भाइयो! इतनी गड़बड़ मत करो। राजा को कुछ नहीं होगा। हम किस दिन के लिए हैं?" "परन्तु सरकार! खान की सेना पुसेसावली के मैदान तक पहुँच चुकी है। राजा और कविराज को बीच में ले रखा है। चारों ओर से पचीस हजार की फौज है।" "कितनी फौज बताई?" "पचीस हजार।" "सुना आप लोगों ने इतनी बड़ी फौज शत्रु के पास है। तो यहाँ इकट्ठे हुए पचास-साठ हट्टे कट्टे लोगों से क्या होगा?" "हम जलकर राख हो जाएँगे। हम हर तरह का खतरा उठाएँगे परन्तु अपने शम्भूराजा को छुड़ाकर ले आएँगे।" सम्भाजी :: 691

उन उत्साही युवकों, बूढ़ों, स्त्रियों और बच्चों पर जमींदार लोग दृष्टि डालते थे और सूझबूझ की मुद्रा में कहते थे, "ऐसी भूल मत करो। खान की सशक्त सेना अपने गाँव पर आक्रमण कर देगी तो अपना सारा गाँव जलकर खाक हो जाएगा।" आँसू भरी आँखों से युवक कहते, "तो सरकार हम करें तो क्या करें?" "हम हैं न? चिन्ता क्यों करते हो? हमने अभी कुछ देर पहले बुध के जमींदार साहब के पास घोड़ा भेजा है। उन लोगों की भी सलाह लेंगे। थोड़ा समय लगेगा, परन्तु सभी मिलकर राजा को छुड़ाएँगे।" आवेश से प्रज्वलित युवकों के उत्साह पर बड़े कौशल से व्यवस्थित रूप से पानी डाला जा रहा था। पाँच तीसरे दिन भोर होते होते धनाजी और सन्ताजी पाचाड़ पहुँच गये। महारानी येसूबाई पाँच-छह हजार की सेना तैयार करके नीचे उतर आयी थीं। अत्यन्त दुखी धनाजी और सन्ताजी की ओर देखा न जाता था। राजमन्दिर में अनुभवी लोगों के साथ विचार-विमर्श हुआ। येसाजी कंक के साथ परामर्श करके येसूबाई ने अपनी राय प्रकट की, "अनेक गढ़ों-किलों से फौज हटाकर खान के पीछे भागना ठीक नहीं होगा। यदि दूसरी ओर से बादशाह की सेना ने आक्रमण किया तो धोखा हो जाएगा।" खंडो बल्लाल ने समर्थन करते हुए कहा, "सच है महारानी।" कुल सात-आठ हजार की फौज लेकर बाहर निकलने का निश्चय किया गया। महारानी घोड़े पर सवार हुईं। ताराऊ और राजाराम को पीछे छोड़कर, 'हर हर महादेव' का उद्घोष करती हुई सेना बाघोली घाटी के नीचे उतरने लगी। यम के दाँतों तले से अपने सत्यवान को खींच ले आने वाली सावित्री का शौर्य येसूबाई में सम्भ्रमित हो गया था। धनाजी और सन्ताजी के घोड़े रणोन्माद से उन्मत्त हो गये थे। बाघोली की घाटी पार होते न होते हंबीरराव के भाई हैबतराव सामने आ गये। वे रायगढ़ के लिए ही निकले थे। रास्ते में महारानी को घोड़े पर सवार देखकर हैबतराव मोहिते घोड़े से नीचे उतर पड़े। रकेब में पड़े महारानी के पैरों को पकड़कर वे जोर-जोर से रोने लगे। वे छोटे बच्चे से भी अधिक अधीर हो गये थे। येसूबाई को ही उनका धीरज बँधाना पड़ा। येसूबाई ने कहा, "पोंछ डालिए अपने आँसू। उल्टी दिशा में लौट पड़िए। सम्भाजी राजा को छुड़ाकर ही रायगढ़ जाएँगे।" 692 :: सम्भाजी

"अब कहाँ से और कैसे छुड़ाएँगे हम उन्हें, महारानी ? परसों दोपहर में ही मुकर्रबखान ने श्यामगाँव की घाटी छोड़ दी। उसके साथ पचीस हजार की तैयार सेना है।" "अरे यह क्या हो गया ? महाराज हमारी आँखों से दूर चले गये।" ऐसा कहकर जोत्याजी केसकर और रायप्पा रोने लगे। अब तक बहुत आघात हुए थे। उनसे कभी न डरने वाली येसूबाई हताश दिखाई देने लगीं। वे घोड़े से नीचे उतर पड़ीं। दुखी मन से उन्होंने अपनी नजर चारों ओर घुमाई। आसमान बोझिल हो गया था। ऐसा लगा मानो दुखद समाचार सुनकर बादलों ने भी अपनी यात्रा स्थगित कर दी थी। महारानी की यह अवस्था देखकर धनाजी और सन्ताजी भी घोड़े से उतर पड़े। महारानी के सामने हाथ जोड़कर उन्होंने कहा, "महारानीजी आप चिन्ता न करें। हम फौज लेकर भागते हुए आगे जाएँगे और शत्रु के कब्जे से महाराज को छुड़ाकर ले आएँगे।" येसूबाई का गला भर आया। जैसे किसी व्यक्ति के कलेजे में कटार घुस जाये और उस पीड़ा को सहन करते हुए वह बोले, उसी तरह येसूबाई बोलीं, "ऐसा नही लगता कि इसका कुछ उपयोग हो सकेगा।" "क्यों ? महारानी क्यों? हमें आगे उड़ान भरने की आज्ञा तो दीजिए।" दोनों हठ करने लगे। "महाराज ने ही एक बार अपनी काव्यमयी शैली में एक दृष्टान्त बताया था। 'यक्ष किन्नरों का महत्त्व भगवान के दरबार में होता है। वे नीचे धरती पर आ जाते हैं तो मिट्टी के पुतले बन जाते हैं'।" "इसका अभिप्राय महारानीजी ?" "कराड़ से आगे पूरब का सारा प्रदेश समतल और बिना जंगल घाटियो का है। वहाँ अपना कोई दाँव नहीं चलेगा।" "ऐसा क्यों? हंबीरमामा की फौज ने तो बागलाण से लेकर कर्नाटक तक अपना घोड़ा दौड़ाया था।" "अचानक आगे बढ़कर आक्रमण करना, शत्रु को हैरान करना एक बात है किन्तु बादशाह की चार लाख की फौज से आमने सामने मुकाबला करना एकदम दूसरी स्थिति है।" वृद्ध अनुभवी लोगों और उत्साही युवकों का एकत्र विचार विमर्श हुआ। दुर्भाग्य से मुकर्रबखान अपने प्रदेश की सीमा पार करके कब का आगे निकल गया था। इस स्थिति को बिना समझे अन्धों की तरह आगे बढ़ते जाना सह्याद्रि के भीतर बने किलों को भी गँवा देना हो सकता है। महारानी ने कहा, "ऐसे समय में सम्भाजी . 693

महाराज ही कोई उपाय सुझा सकते हैं। किन्तु मगरमच्छ की मुट्ठी में फँसे महाराज तक पहुँचें कैसे?" इस चर्चा के दौरान रायप्पा को सिसकी आ गयी। उसने कहा, "कम से कम अब तो मुझे न रोकें। बारिश हो या तूफान, महाराज के पास कैसे पहुँचना है, इसे मैं देखूँगा।" खंडो बल्लाल ने मसौदा लिखा। महारानी ने उसे मुद्रांकित किया। सभी से विदा लेकर रायप्पा अपने भाई देवप्पा को साथ लेकर वहाँ से बाहर निकला। उनके घोड़े कराड़ की दिशा में दौड़ पड़े। सूर्य पश्चिम की ओर झुक गया था। पहाड़ और घाटियों में अँधेरा भरने लगा। लिंगाणा किले की ऊँची उठी गर्दन आज टूटी-सी दिखाई दे रही थी। धनाजी और सन्ताजी बहुत मायूस हो गये थे। महारानी के ललाट का कुंकुम माथे पर बिखर गया था। उन दोनों उद्विग्न तरुणों की ओर देखकर महारानी बोलीं, "धनाजी, सन्ताजी धीरज से काम लो। हमारा कुंकुम बचाने के लिए स्वराज्य का भाग्य फूटना नहीं चाहिए।" छह दोपहर का समय, बाहर की बंजर भूमि पर लू चिलचिला रही थी। औरंगजेब का डेरा अमदनगर के बंजर मैदान में पड़ा हुआ था। इन दिनों बादशाह ने अकलूज, अमदनगर जैसे नाम रख दिए थे। अकलूज, दौंड, चांभारगोंदा जैसे क्षेत्र सदैव अकाल की चपेट में आते थे। इसी कारण से फरवरी का महीना होने पर भी यहाँ तेज धूप निकली थी। दिन अनेक स्थानों पर मृगमरीचिका दिखाई पड़ती थी। इन दिनों औरंगजेब बादशाह बड़ी उलझन में था। कितनी बड़ी फौज, कितने वर्ष का समय, कितने धन का अपव्यय और कैसा दुर्भाग्य? वह काफिर का बच्चा सम्भा हाथ ही नहीं लग रहा था। औरंगजेब की जिन्दगी की यह सबसे बड़ी मुहिम एक मृगमरीचिका ही सिद्ध हो रही थी। बादशाह दरबार में अपने मुंशियों को कुछ लिखित सूचनाएँ दे रहा था। ऐसे समय में बादशाह के कार्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान महापाप समझा जाता। उच्चासन पर बैठा बादशाह कुछ बोल रहा था और मुंशी उसे लिख रहा था। इसी बीच एक दूत साहस करके बादशाह के पास आकर खड़ा हो गया। उसका वहाँ 694 सम्भाजी

पहुँचना और बादशाह के समीप खड़ा होना सामान्य स्थिति में इसे धोखादायक और आपत्तिजनक माना जाता। इतना ही नहीं इस प्रकार की धृष्टता किसी अन्य व्यक्ति ने की होती तो पहरेदारों ने उसके सिर को मुर्गे की तरह छाँट दिया होता। किन्तु उस दूत के वहाँ तक पहुँचने के पहले ही पहरेदारों में कानाफूसी शुरू हो गयी थी। साथ ही उनके चेहरे पर प्रसन्नता झलकने लगी थी। वह समाचार ही इतना आनन्ददायी था कि सभी सैनिक आनन्द से विह्वल हो रहे थे। हँसी के ऐसे फौवारे छूट रहे थे मानो कि सन्तानहीन सम्राट को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई हो। बाहर से आने वाली आनन्द लहरियों से भीतर बैठे लोग चकित हो रहे थे। वे ठीक ठीक समझ नहीं पा रहे थे कि वहाँ क्या हो रहा है? अष्टावधानी बादशाह सावधान था। मसौदा लिखाने में व्यस्त होने पर भी दरबार की गतिविधियों पर उसकी कड़ी नजर थी। उसके सेवक कोई खुशी की खबर देने के लिए बेताब हो रहे हैं इसका अन्दाजा उसकी अनुभवी नजरों ने पहले ही कर लिया था। परन्तु यह खुशी की खबर ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकती है, इसका भी अनुमान उसने कर लिया था। इसलिए बिना विचलित हुए अपना कार्य करता रहा। परन्तु थोड़ी देर में शराब पिलाए गये ऊँट की तरह उसका सेवक बेताब होने लगा। इस बात के ध्यान में आते ही वह विचलित हुआ। अपना कार्य छोड़कर बड़े कठोर स्वर में बादशाह ने दूत से पूछा "क्या बात है?" बादशाह ने दूत की ओर नफरत से देखा और व्यंग्यपूर्ण शब्दों में बोला "ईरान में हमारे बेवकूफ अकबर का कुछ भला बुरा हुआ है क्या?" "नहीं आलमपनाह! इससे बड़ी बहुत बहुत बड़ी खुशी की खबर है। वह शैतान सम्भा कैद हो गया।" "कौन?" बादशाह ने अपनी गर्दन झट से घुमाई। "वही, शैतान सम्भा।" "क्या हुआ उसका?" "कैद हो गया। अपने हाथ लग गया।" "किसने कैद किया?" बादशाह ने धीमे स्वर में पूछा। "मुकर्रबखान ने।" "कहाँ?" "सह्याद्रि की घाटी में।" बादशाह ने अविचल भाव से उस दूत को अपने पास बुलाया। उसे अपने कानों तक आने दिया। किन्तु इसके बाद बादशाह का धैर्य छूट गया। वह झट से उठकर खड़ा हो गया और पटापट दूत के गालों पर चोटें जड़ दिये। बादशाह की गोरी चिट्टी मुखमुद्रा क्रोध और अविश्वास से तप्त हो गया। उसका हाथ रुक नहीं रहा था। किन्तु मार खाने वाले दूत की हँसी भी कम न हो सम्भाजी 695

रही थी। बादशाह ने क्रोध से कहा, “तेरी ये हिम्मत? आलमगीर का मजाक उड़ा रहा है?” औरंगजेब के मन में एक क्षण के लिए आया कि इस पागल दूत को खौलते हुए तेल के कड़ाह में फेंकने का हुक्म दे दे। बादशाह की नजर सामने गयी तो उसने देखा कि उसके पोते, सभी अमीर उमराव, नजदीकी सरदार, बादशाह के तम्बू की ओर भागते हुए आ रहे हैं। जिस प्रकार नमाज पढ़ते समय घुटनों पर झुकते हैं उसी प्रकार सभी घुटनों पर झुक गये थे। हाथ ऊपर उठाकर और आँखों में आँसू लिये सभी ने एक स्वर से कहा, “अल्लाहोऽऽ अकबर, अल्लाहोऽऽ अकबर।” बाहर हँसी के फव्वारे छूट रहे थे। बादशाह के हुक्म के बिना ही ढोल तासे बजने लगे थे। सभी किसी मंगल की सूचना दे रहे थे। समाचार की पुष्टि की आवश्यकता अब नहीं थी। बादशाह के चेहरे की क्रोधभरी वक्र रेखाएँ अब समाप्त हो गयी थीं। आनन्दातिरेक से बादशाह ने अपने मुँड़े हुए सिर पर हाथ रखा। उसके बाल अब बिलकुल पतले हो गये थे। उसके सिर पर विगत छह वर्षों में किसी ने ताज नहीं देखा था। परन्तु उसकी कोई ग्लानि अब उसके चेहरे पर नहीं थी। खुशी से उसका चेहरा रक्ताभ होकर दमक रहा था। बादशाह की आँखों से भी आनन्दाश्रु टपक पड़े। वह भी घुटने टेककर बैठ गया। आसमान की ओर आँखें उठाकर खुदा की इबादत करने लगा, “या खुदा या अल्लाह! शायद आसमान में बैठे फरिश्ते ने मेरी आवाज सुन ली होगी। अल्लाह के नाम से की गुहार जन्नत तक पहुँची होगी। दीन दुनिया के बादशाह अल्लाह तेरा लाख लाख शुक्र।” बादशाह का अभिनन्दन करने के लिए असदखान समीप आ गये, तब असदखान का हाथ अपने हाथ मे लेकर बादशाह ने प्रसन्नता से कहा, “असदखान, अल्लाहताला के हम बहुत एहसानमन्द हैं। अल्लाह ने मेरे जैसे नाचीज पर बड़ी मेहरबानी की है। उसने हमें ऐसा उपहार दिया है जिसे पाकर मैं इतना खुश हूँ कि कोई जन्मान्ध आँखें पाकर या सन्तानहीन सन्तान पाकर भी इस तरह खुशी से पागल न होगा।” सात इधर मुकर्रबखान का दल बहादुरगढ़ की ओर बढ़ रहा था और उधर बादशाह की चिन्ता बढ़ रही थी। वह अधिक सावधान होने लगा था। इतने वर्षों का संघर्ष एक 696 सम्भाजी

बार समाप्त हो गया था। खुदा ने मेहरबानी की थी। प्रसन्नता से सभी की नींद उड़ गयी थी। किन्तु बादशाह को अपनी छाया से भी भय लगता था। अनेक बार वह चिन्तित हो जाता था, अपनी चौकन्नी नजरों से इधर उधर देखते हुए डेरे से बाहर आ जाता था। भीमा नदी के विशाल तट के आसपास किसी बड़े पहाड़ या गहरी खाई जैसी छिपने की जगह नहीं थी। इसलिए टिड्डी दल की तरह अचानक मराठा फौज के टूट पड़ने की कोई सम्भावना नहीं थी। किन्तु मुकर्रबखान कोई भेड़ बकरी लेकर बादशाह के पास नहीं आ रहा था। वह बागी शिवाजी के पुत्र को बाँधकर खींचता हुआ बादशाह के पास ले आ रहा था। थोड़ी-सी असावधानी से भी रंग में भंग हो सकता था। इसका बादशाह को पूरा ज्ञान था। बादशाह वजीरे-आजम असदखान से बार-बार पूछता था, “शेख मुकर्रब के साथ कितनी फौज है?” असदखान का जवाब होता, “पचीम हजार।” अपने विश्वसनीय गुप्तचरों से बादशाह बार बार इस संख्या की पुष्टि करता। अपनी फौजी शक्ति के प्रति आश्वस्त होने पर भी बादशाह का डर कायम था। सम्भाजी की गिरफ्तारी के समाचार ने बादशाह के सैनिकों और मरदागों को खुशी से पागल कर दिया था। यह सोचकर कि दक्खिन का दशावतार समाप्त हुआ, लोग प्रसन्न हो रहे थे। उन्हें लगता था कि शीघ्र ही दक्खिन से उत्तर जाने का अवसर मिलेगा। समीपी रिश्तेदार और सरदार बादशाह की खुशी में सम्मिलित होने के लिए बहादुरगढ़ की ओर दौड़ पड़े थे। बादशाह ने एक सुबह असदखान को हुक्म दिया, “वजीरे आजम! यहाँ चंभारगोंदा, अकलूज, पंढरपुर, दौंड आदि इलाकों में शीघ्रता से एक फरमान जारी कीजिए।” “जी मेरे आका!” “सभी काफिरों को सूचित कर दीजिए कि किसी की घुड़साल में, किसी के दरवाजे पर, या रास्ते पर एक भी घोड़ा दिखाई नहीं पड़ना चाहिए।” “लेकिन-लेकिन जहाँपनाह ऐसा कैसे हो सकता है? वे अपने जानवरों को भेजेंगे कहाँ?” “कुछ दिनों के लिए उन्हें अपनी घुड़साल खाली करनी पड़ेगी। अपने अपने जानवर चाहे हट्टे-कट्टे हों या दुबले, उन्हें बाजार में या रिश्तेदारों के घर भेजना होगा। परन्तु यदि कोई मराठा बच्चा, दिन में या रात में घोड़े पर सवार दिखाई देगा तो उसके हाथ या पैर तोड़ दिये जाएँगे।” हुक्म की तामील जल्दी ही की गयी। रात मे ही आस-पास के सभी घोड़े गायब हो गये। सबेरे एक बार मसनद के साथ बैठ जाने पर दोपहर तक तम्बू में बने सम्भाजी :: 697

रहना बादशाह का रोज का नियम था। किन्तु पिछले चार दिनों से बादशाह बहुत बेचैन था। तम्बू के भीतर बैठे उससे रहा ही न जाता था। चन्दनी अम्बारी में सजे और सूँड़ से पूँछ तक स्वर्णांलंकारों को धारण किये अपने शानदार हाथी पर वह बड़े ठाट से बैठता। उसके आगे-पीछे पाँच पाँच सौ घुड़सवारों की सेना रहती। बादशाह भैरवनाथ मन्दिर के समीप वाली लम्बी सीमारेखा को पार करता। वहाँ से उसका काफिला पूरब की ओर सरस्वती के सूखे पाट में घुस जाता। वहाँ से काफिला खंडोबा के विस्तृत समतल मैदान पर पहुँच जाता। औरंगजेब अपने हाथी पर से अपनी नजर चारों ओर घुमाता। बहादुरगढ़ के आसपास की धूप उसे परेशान करती। वह मन ही मन कहता, "अल्ला करें, उस जहन्नमी सम्भा का यहाँ आना मृगजाल न बन जाय।" इन विचारों से बादशाह काँप उठता था। दोपहर के बाद बादशाह का काफिला नदीतट की दूसरी ओर एक चक्कर लगाता था। यह काफिला जब दमड़ी मस्जिद के सामने पहुँचता तो मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठा बूढ़ा फकीर अपने झुलसे होठों पर काली चिलम रखता और फूँकते हुए बादशाह को देखकर जोर से हँसता। बहादुरगढ़ और उसके आस-पास के इलाके की चार लाख की बस्ती में यह फटीचर फकीर अकेला व्यक्ति था जो औरंगजेब को दूसरों की तरह झुककर सलाम नहीं करता था। फकीर होने के बावजूद बादशाह के सामने झोली नहीं फैलाता था। उसने स्वयं एक एक दमड़ी इकट्ठी करके दमड़ी मस्जिद खड़ी कर ली। उस फकीर की अनासक्त मुद्रा देखकर बादशाह को शिवाजी महाराज का स्मरण हो आता था। शिवाजी नाम के एक जमींदार ने फकीर क़ी दमड़ी की तरह ही एक-एक व्यक्ति को एकत्र किया था और हिन्दवी स्वराज्य का एक मंगल मन्दिर खड़ा कर लिया था। शिवाजी समाप्त हुए तो बादशाह ने सन्तोष से अपनी आँखें बन्द कर ली थीं किन्तु उसकी आँखें खुलें इसके पहले ही दूसरी घटना घट गयी। सम्भाजी नाम का गरुड़ स्वराज्य मन्दिर के कलश पर अपने बलशाली डैने फैलाए जमकर बैठ गया था। उसके पंख जलाने के लिए आतुर बादशाह को निरन्तर भ्रमण करते हुए दक्षिण में अपने जीवन के आठ वर्ष गुजारने पड़े थे। उसकी दहशत बादशाह ही नहीं उसके सैनिकों और जानवरों पर इतनी गहरी बैठ गयी थी कि सम्भाजी सचमुच गिरफ्तार हुआ है क्या ? यदि हुआ है तो मुगल सेना तक पहुँचेगा क्या ? ऐसी अनेक शंकाएँ शहंशाह को घेर रही थीं। भीमा नदी के नीले पाट में बादशाह की फौज का प्रतिबिम्ब दिखाई देने लगता। बादशाह का हाथी चाँदबीबी महल के सामने रुक जाता था। नौकर जल्दी से सीढ़ियाँ लेकर, दीवार की तरह ऊँचे हाथी से लगाते थे। बादशाह बड़े अभिमान से नीचे उतरता था, फिर जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर जाकर महल के छज्जे में खड़ा हो जाता था। वहाँ से कभी नदी के विस्तृत पाट को कभी पीलखाने की 694 सम्भाजी

ओर देखता था। बीच-बीच में महल के दरवाजे के पास ढह गये भग्नावशेष को देखता था। वहीं पर कभी एक सातमंजिला महल था, जो अब मिट चुका है। उसी जगह पर एक गुप्त खजाना है, ऐसी अफवाह पूरे बहादुरगढ़ में फैली थी। वहाँ के गुप्त धन को प्राप्त करने का पागल प्रयास अनेक साहसी लोगों ने किया था। किन्तु वहाँ कुदाल मारते ही भयानक चमत्कार घटित होता था। बड़े बड़े डसने वाले जहरीले भौंरे बहुत बड़ी संख्या में निकलते थे और शरीर के अंग प्रत्यंग को बींधने लगते थे। बादशाह इन्हें मूर्खताभरी बातें मानता और उपेक्षा करता। उस दिन बादशाह बहुत देर तक छज्जे में खड़ा रहा। उस ढहे हुए अवशेष को ध्यान से देखता रहा। उसी के नीचे गुप्त धन है यह बात उसके ध्यान में आती रही। उस रात बादशाह ने एक भयानक सपना देखा— स्वयं बादशाह के हाथों में एक बड़ा गहदाला था। वह स्वयं, उसका वजीर, उसके शहजादे, पोते और सरदार बड़े परिश्रम से उस जगह को खोद रहे थे। वे भी पसीने से तरबतर हो गये थे। अन्ततः वे गुप्त धन की सन्दूक तक जा पहुँचे। सन्दूक के अन्दर बहुत कीमती जवाहरात चमक रहे थे। सबसे बड़ा तेजस्वी हीरा बादशाह ने झपटकर ले लिया। तेईस साल पहले बादशाह ने आगरे में दो पानीदार चमकती आँखे देखी थीं। उनकी चमक इन्हीं हीरों जैसी थीं। वे आँखें सम्भाजी महाराज की थीं। वही अनमोल हीरा अचानक हाथ में आ गया था। इसलिए बादशाह प्रसन्न होकर खिलखिलाकर हँसने लगा। उसके साथ दमड़ी मस्जिद वाला फकीर भी जोर जोर से हँसने लगा। इसी बीच बगल से भौंरों का दल उठा। उनकी विचित्र और विकट ध्वनि सुनाई देने लगी। एक ही साथ दसों दिशाओं में भौंरों ने बादशाह पर हल्ला बोल दिया। 'हर हर महादेव, हर हर महादेव' का उद्घोष होने लगा। जहाँ देखिए वहाँ भौंर ही भौंर। भौंरों ने बादशाह के लिए दिल्ली की राह रोक दी थी। भौंरों के झुंड के पार एक सूनी जगह पर बादशाह को अपनी कब्र दिखाई देने लगी। उस पर बिछी चादर के टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। उस भयानक सपने से बादशाह का गला सूख गया। वह आधी रात में ही बिछौने से उठ गया। बाहर बैठक में आकर उसने अपने वजीर, सेनापति और शहजादों को जगा दिया। सभी पर एक तीखी नजर डालकर केवल इतना ही कहा "असदखान जुल्फिकार, बरायदखान अभी का अभी हुक्म की तामील करो। कम से कम तीस हजार की फौज किले के बाहर तैयार करो। आसपास के सौ डेढ़ सौ गाँवों में फौज भेज दो।" "लेकिन लेकिन हुजूर! हुक्म की तामील हो गयी है। किसी भी गाँव में घोड़ा तो क्या कोई खस्ताहाल खच्चर भी नहीं बचा है।" असदखान ने कहा। सम्भाजी ७१५

“घोड़ों को नहीं दो पैर वाले गधों को कोड़े लगाओ। हर हट्टे कट्टे आदमी को लाठी-डंडे से पीटो। दो ही दिनों में मुकर्रबखान उस काफिर बच्चे सम्भा को लेकर आने वाला है। उस दुष्ट के हमारे पास आने तक पूरी सावधानी बरतिए। आसपास की पंचकोसी में कोई भी मरगट्ठा गर्दन सीधी करके चलते नहीं दिखाई देना चाहिए। सभी मूर्ख मराठों को सबक सिखाना जरूरी है।” इस जारी किये गये हुक्म की तामील तत्काल की गयी। मुकर्रबखान की फौज भीमा नदी के दूसरे तट पर पहुँच गयी। इसके पहले ही बादशाह ने वहाँ के मराठों की हड्डी पसली एक कर दी थी। रास्ते के आष्टी और लिंपनगाँव जैसे गाँव तो सिपाहियों की मार से पथरा गये थे। भीमा नदी की दाहिनी ओर बायीं ओर केवल विह्वलताभरी चीखें और कराहें ही सुनाई दे रही थीं। कोई भी पुरुष गली कूचों से निकलकर रास्ते पर चलता दिखाई नहीं दे रहा था। यहाँ तक कि कुत्ते भी बाहर निकलने से घबरा रहे थे। वे बीच बीच मे अपने करुण स्वर में चिल्ला उठते थे। उनकी अशुभसूचक करुण चिल्लाहट को सुनकर पेड़ पर बैठे उल्लू भी पत्तों के पीछे छिपने लगे। आठ केवल इस समाचार से कि सम्भाजी को जिन्दा पकड़ा गया है और उसे बादशाह का कैदी बनाया गया है, बहादुरगढ़ की फौजी छावनी में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया था। सभी लोग अत्यन्त हर्षित थे। एक बड़ा तमाशा, जुलूस और उत्सव देखने को मिलेगा, इस कल्पना से लोगों को चार दिन से नींद नहीं आ रही थी। पागल तो पूरे पागल बने ही थे, सयानों को भी पागलपन के दौरे आने लगे थे। जिन्हें सर्दी, खाँसी और हल्के ज्वर जैसी छोटी-मोटी बीमारियाँ थीं, वे भी इस समाचार से भले चंगे हो गये। सभी की नजरें मुकर्रबखान के आगमन पर लगी थीं। कैसी अजीब थी यह शैतानी मुहिम। पिछले आठ सालों में सिपाहियों ने अधूरी नींद ही ली थी। लम्बी- लम्बी दौड़ों, रामदरी जैसी घाटियों की घोर यातनाओं, प्लेग जैसी भयंकर बीमारियों आदि से दक्षिण में सिपाहियों का दम घुटने लगा था। राजपूतों को अपने प्रदेश के सपने आने लगे थे। जोधपुर, बीकानेर की अपनी-सी लगने वाली रूपहली बालू, 700 .: सम्भाजी

कँटीली झाड़ियाँ, अरावली की ओर से बहने वाली शीतल हवायें उन्हें अपनी ओर खींचते थे। मुसलमान सिपाही सोचते थे कि कब आगरा और बरेली की ओर जायें और अपने बाल-बच्चों को एक बार फिर देखें। वे सोचते थे कि दरवाजे पर खेलने वाले बच्चे अब कितने बड़े हो गये होंगे? बड़े बूढ़ों का क्या हुआ होगा? सभी रोज की फौजी जिन्दगी से ऊब गये थे। इसके पहले काबुल कन्दहार की लड़ाई में बर्फ के ऊपर तलवारबाजी करके आठ-दस महीने में ही अपने बीवी बच्चों में वापस आ गये थे। परन्तु दक्षिण की यह मुहिम तो बहुत पीड़ादायी साबित हुई। एक बार कभी बादशाह बूढ़ा होकर अल्लाह को प्याग हो गया तो उसका भूत उठ खड़ा होगा और फौज को चलाएगा। ऐसा सभी फौजियों का विश्वास था। फौज के भीतर घुसुर फुसुर बहुत होती थी किन्तु बगावत करने का साहस किसी में भी नहीं था। जिस किसी के मन में भी ऐसा विचार उठा, उमका सिर हाथी के पैर के नीचे कुचलकर नारियल की तरह चूर-चूर कर दिया गया। पिछले दो-तीन सालों में गोलकुंडा और बीजापुर के अनेक सरदार आकर औरंगजेब से मिल गये थे। उन्हें अपनी-अपनी जागीरें पाने की बड़ी उतावली थी। गाँवों और कस्बों के किसान भी प्रमन्न थे। वे सोचते थे जो कुछ भी हो, एक बार यह युद्ध तो रुक जाएगा। पिछले मात आठ वर्षों में खेती में कुछ अधिक पैदावार नहीं हो पायी थी। सूखे के कारण समय पर बोवाई ही नहीं हो पायी। अब यह आपदा समाप्त होने वाली थी। पिछले चार दिनों से फौज में ईद से भी बढ़कर उत्सवी वातावरण बना हुआ था। फौज के बाजार खुशी से जगमगा रहे थे। लोगों को नींद ही नहीं आ रही थी। सभी आँखें मुकर्रब की राह देख रही थीं। बाजा बजाने वालों ने अपने तासों पर नया चमड़ा चढ़ाया था। शहनाई की पत्तियाँ बदली गयी थीं। खिलाड़ी अपने खेलों का अभ्यास कर रहे थे। नमाज में सभी लोग हाजिर रहते थे। फौज के साथ जो सुनार, दर्जी जैसे व्यवसायी थे, उनके कार्य में बड़ी बरकत आ गयी थी। अपने प्राणप्रिय बालसखा को शत्रु पकड़कर ले गया, यह समाचार पाते ही रायप्पा महार काँप गया था। महारानी ने उससे कहा था, "राय मामा! प्राणों पर संकट आ जाये तो भी यह पत्र महाराज तक पहुँचा दो।" महारानी के ये शब्द रायप्पा के कानों में गूँज रहे थे। सम्भाजी के साथ हुए धोखे के कारण रायप्पा को कुछ सूझ नहीं रहा था। देवप्पा के साथ घोड़े पर सवार वह रात में ही पंढरपुर की ओर निकला। रास्ते में पूछ-पूछ कर उन्होंने बहादुरगढ़ के रास्ते का पता किया। परन्तु भीमा नदी के किनारे उन्होंने जो स्थिति देखी उससे वे पानी-पानी हो गये। आसपास के गाँव भय से तितर-बितर हो गये थे। घुड़सालें खाली हो गयी थीं। सम्भाजी :: 701

अपने-अपने घरों को ताला लगाकर प्रजा गाँव छोड़कर चली गयी थी। गाँव श्मशान बन गये थे। लोग कहीं बाँधों की आड़ में या नदी-नालों की खोहों में छिपे हुए थे। जो भी हो रायप्पा को तो बहादुरगढ़ पहुँचना था। उसी इलाके में उसकी भिश्तियों की एक टोली से भेंट हुई। चमड़े के बड़े-बड़े थैलों में पानी भरकर ले जाना और फौजियों को पिलाना उनका मुख्य कार्य था। इन दोनों ने भी कहीं से चमड़े की बड़ी मशक उपलब्ध की। साथ में मशक, फटी हुई पगड़ी बढ़ी हुई दाढ़ी और काले रंग के कारण ये दोनों भाई बड़ी सहजता से उन दक्खिनी भिश्तियों में मिल गये। रायप्पा अन्दर का भेद जानने की कोशिश कर रहा था किन्तु दहशत के कारण कोई कुछ बोलने को तैयार न था। भावनाविकल रायप्पा को रात-बेरात हमेशा सम्भाजी राजा का स्मरण होता था। कालनदी की समतलभूमि और निजामपुर की पहाड़ियों में किये गये शिकार का स्मरण उसे होता। वह विकल होकर पगड़ी का कपड़ा मुँह में डालकर रोता था। उसकी यह अवस्था देखकर देवप्पा ने उसके पास का पत्र निकाल लिया। उस चिट्ठी को देवप्पा ने बड़ी सावधानी से अपनी कमर में खोंस लिया। जुलूस के दिन भिश्तियों के मुखिया को फौजदार का आदेश आया आज किसी बड़े राजबन्दी को लेकर सेना किले में प्रवेश करेगी। उन्हें जो टोली पानी पिलाने के लिए तैनात हुई, उसमें रायप्पा सम्मिलित हो गया। उसी टोली को किले के अन्दर भी जाना था। यह जानकर इन दोनों भाइयों को बड़ा सुख मिला। दोपहर में धूप बढ़ने लगी थी। गर्मी भी बढ़ी, प्यास लगने लगी, पानी की माँग बढ़ गयी। बगल में भैंसेगाड़ी पर पानी से भरी बड़ी-बड़ी पखालें रखी थीं। भिश्ती अपने चमड़े के थैलों में पखाल से पानी भरते थे और फौजियों को पिलाते थे। बादशाह के हुक्म के अनुसार मुकर्रबखान के स्वागत के लिए सभी प्रमुख सरदार गाँव के बाहर मैदान में एकत्र हुए थे। ढोल-तासे आदि जोर-जोर से बज रहे थे। तब तक रायप्पा को यह पता नहीं था कि यह जुलूस किसके लिए निकाला जा रहा है। पानी बाँटते-बाँटते वह किले में अन्दर की ओर जा रहा था। सम्भाजी राजा के शरीर की जंजीरें खड़खड़ाईं। सामने दो बदरंग ऊँट खड़े थे। उन खस्ताहाल जानवरों की पीठ पर जीन काठी नहीं थी। पाँच-छह जनों ने जंजीरों से जकड़े सम्भाजी राजा को ऊपर उठाया और उन्हें ऊँट पर बिठाया। राजा ने अपनी दृष्टि इधर-उधर घुमाई। सामने हजारों फौजियों के हाथों में नंगी तलवारें दिखीं। मैदान में सैकड़ों तम्बू और छोलदारियाँ थीं। बीच में दोनों ओर मार करने वाली तोपों की पंक्तियाँ थीं। तोपों के पीछे काले-कलूटे रंग के गोलन्दाज खड़े थे। उस दुष्ट नगरी में राजा के जुलूस की नहीं उनके उपहास की तैयारी चल रही थी। 702 :: सम्भाजी

सामने की ओर से फौजी पंक्तियों का जुलूस जाने वाला था। समुद्र के उमड़ते प्रवाह की तरह जुलूस निकलने वाला था जिसमें गाँव के लोग, सैनिक और देखने वालों की भीड़ के बीच से सैनिक आगे निकलने वाले थे। उनकी सुरक्षा का दायित्व बहादुरगढ़ के थानेदार महादजी निंबालकर को सौंपा गया था। विशेष रूप से शिवाजी के जामाता और सम्भाजी के बहनोई यह दायित्व बड़ी ईमानदारी से निभा रहे थे। वे व्यवस्था की निगरानी करते इधर-उधर घूम रहे थे किन्तु सम्भाजी से आँखें मिलाना टाल रहे थे। खुले ऊँट पर बिठाए गये सम्भाजी को रस्सियों और जंजीरों से कसकर बाँधा गया था। बाँधने का यह काम एक राजपूत सरदार अमरसिंह स्वयं कर रहा था। सम्भाजी राजा ने बहुत दिनों से बन्दी होने के कारण बाहर का प्रकाश ही नहीं देखा था। पिछले कुछ दिनों से न उनके हाथ खुले थे और न ही वे ठीक से साँस ले पा रहे थे। किसी से बात करने का तो प्रश्न ही नहीं था। परिस्थिति ने ही उन्हें मौन बना दिया था। अपने शरीर के चारों ओर रस्सी बाँधने वाले, लम्बी सुघड़ दाढ़ी वाले अमरसिंह को सम्भाजी राजा ने देखा। उन्होंने अमरसिंह का हाथ पकड़ा और भावविभोर होकर बोले, “तुम जाति से राजपूत लग रहे हो हमारे दुर्गादास के प्रदेश के?'' “जी हाँ" उसने हुंकारी भरी। “मित्र! तुम्हें तुम्हारे ईश्वर का वास्ता देकर कहता हूँ। बहुत हो गया यह अपमान, हमें इस बेइज्जती से, इस यातना से मुक्त कर दो।'' “लेकिन शाही हुक्म महाराज!" “बन्धु ! एक हिन्दू के नाते तुम्हें खून की सौगन्ध है। शिवाजी के बेटे को इस तरह कुत्ते की मौत मरते देखना क्या तुम्हें शोभा देगा? चलो दोस्त बस एक उपकार कर दो।" सम्भाजी ने बड़ी हताशा से कहा। “क्या करूँ महाराज ?" “झट से उठाओ अपनी तलवार और कर दो हमारे टुकड़े-टुकड़े। रुको मत बन्धु ।" अमरसिंह भावविभोर हो गया। उसने सम्भाजी राजा की आँखों में उमड़ते आँसुओं को देखा, तत्काल उसका हाथ म्यान पर पड़ा। वह तलवार निकालने ही वाला था कि किसी दूसरे के मजबूत हाथों का पंजा पड़ा। परिणामस्वरूप यह प्रयास वहीं रुक गया। बगल में क्रूर चेहरे वाला इखलासखान खड़ा था। उसने पूछा, “क्यों सरदारजी क्या इरादा है?" सचमुच अमरसिंह को सम्भाजी पर बड़ी दया आ गयी थी। किन्तु मुक्ति का यह अवसर वहीं पर समाप्त हो गया। विडम्बना और अपमान की कोई सीमा न रही। जिस राजा के शरीर पर महँगे सम्भाजी :: 703

से महँगे जेवरात और कपड़े अपने हाथ सें पहनाने के लिए सूरत से पणजी तक के दर्जी टूट पड़ते थे, उसी सम्भाजी राजा और कविराज के वस्त्र रास्ते पर उतार दिए गये। उन्हें विदूषकों वाले रंग-बिरंगे कपड़े पहनाए गये। जिनके गले में हीरे-मोती के हार चमकते थे उनके गले में गाय-बैल के गले में भी चुभने वाली ईरान में जिस तरह बड़े अपराधियों के सिर पर लकड़ी की लम्बी टोपियाँ रखी जाती थीं उसी प्रकार इन दोनों के सिर पर लकड़ी की लम्बी टोपियाँ रख दी गयी थीं। उन पर अनेक छोटे-छोटे चिह्न रंग दिए गये थे। उन पर छोटे-छोटे घुँघरू बाँध दिये गये थे। कुछ नौकर दोनों ऊँटों को पकड़कर आगे चलने लगे। तासे-तुरुहियाँ जोर-जोर से बज रही थीं। राजा और कविराज को ऊँट पर उल्टा बिठाया गया था। उन्हें उन जानवरों से बड़ी क्रूरता के साथ बाँधा गया था। राजा का हाथ ऊपर उठवाकर उसमें एक सुराख वाली पट्टी डाल दी गयी थी। पट्टी में दोनों हाथ फँसा दिए गये थे। उन दोनों की गर्दनें भी लकड़ी की पट्टी में अटका दी गयी थीं। इसलिए वे अपनी गर्दन भी इधर-उधर हिला नहीं सकते थे। एक समय के रायगढ़ के राजेश्वर को, करोड़ों मुहरों के धनी को, बत्तीस माणिक सोने से बने सिंहासन पर बैठने वाले मराठों के नरेश कां, उनके मुख्य प्रधान को, मरियल ऊँट पर बिठाया गया था। उन्हें विदूषकों के भड़कीले कपड़े और लकड़ी की टोपी पहनाए गये थे। ये दोनों कैदी स्त्रियों और बच्चों के लिए अच्छे खासे मनोरंजन बन गये थे। उद्धृत बच्चे उन कैदियों पर छोटे-छोटे पत्थर और कीचड़ के गोले फेंक रहे थे। जैसे किसी पेड़ पर बैठे घायल बन्दर को बच्चे चिढ़ाते हैं, उसी तरह इनके साथ भी बन्दर उपहास चल रहा था। ढोल-तासे बज रहे थे इनका कोलाहल सुनाई दे रहा था। जुलूस में सबसे आगे महादजी थानेदार चल रहा था। अब नपुंसकों में भी बड़ा जोश आ गया था। नौकर भी ऊँटों को जोर-जोर से भगा रहे थे। यह उनकी शरारत थी। भगाते-भगाते वे ऊँटों को अचानक घुमा देते थे। ऊँची पीठ वाले ऊँटों के अचानक घूमने से बन्दियों को झटका लगता था। शरीर से बँधी रस्सियाँ और जंजीरें शरीर में चुभ रही थीं। सम्भाजी राजा और कविराज की आँखों के सामने लाल-पीला दिखाई पड़ रहा था, उन्हें चक्कर आ रहा था। वे एक ओर लटक जाते थे। उन मूक जानवरों का भी बुरा हाल हो रहा था। बार-बार लगनेवाले धक्कों और हिचकोलों से राजा के शरीर में भयानक वेदना उठ रही थी। उनकी यह स्थिति देखकर मूर्ख लोग उनका मजाक उड़ा रहे थे। रायप्पा पानी की थैलियाँ देते और पानी पिलाते आगे बढ़ रहा था। 'मरगट्ठे दो कैदी' ऐसे शब्द उसके कानों में पड़े। बहुत देर के बाद 'सम्भा' शब्द उसके कानों तक आया। यह शब्द सुनते ही वह थरथरा उठा। वह भीड़ में अपना रास्ता बनाता हुआ और पानी देने का नाटक करता हुआ सम्भाजी के ऊँट के पीछे-पीछे 704 :: सम्भाजी

चलने लगा। एक मोड़ पर उसने सम्भाजी राजा की ओर देखा। राजा की अत्यन्त तेजस्वी, बड़ी-बड़ी आँखें उसने देखीं, आँख से आँख मिली। राजा अत्यन्त उदासी से हँसे। उन्होंने सोचा, 'होगा कोई अपने रायप्पा जैसा दिखाई देनेवाला भिश्ती।' सरस्वती नदी के किनारे खंडोवा का मैदान इससे पहले कभी भी इतना भयभीत नहीं हुआ था। बहादुरगढ़ के आसपास रहने वाले बड़े विश्वास से कहते थे कि इस मैदान में अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भूतों का जुलूस निकलता है। इस जुलूस के आगे-आगे बैताल अपनी जटाएँ हवा में लहराते हुए भयानक नृत्य करते हैं। किन्तु आज का यह कबन्धों का नंगा नाच अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण था। आज का दुर्भाग्यपूर्ण जुलूस ढोल-तासे बजाता आगे निकल रहा था। शिवाजी महाराज की मृत्यु के केवल नौ वर्षों बाद उनके राजहंसी बेटे का खुलेआम अपमानजनक जुलूस निकाला जा रहा था। वह भयानक दृश्य, वे मरियल ऊँट, विदूषकों का वह पहनावा और मराठों की इज्जत की धज्जियाँ उड़ते देखकर बहादुरगढ़ की मिट्टी तक काँप उठी थी। श्मशान और मैदान के भूत पिशाच शर्मिन्दा होकर बाहर निकल गये थे। अपने आपको तैमूर का वंशज कहने वाले, दिल्ली की राजगद्दी की पाँच सौ वर्षों की परम्परा का उत्तराधिकारी मानने वाले इस निरंकुश और बेवकूफ बादशाह पर सभी जड़-चेतन हँस रहे थे। जुलूस आगे निकला। नासमझ बच्चे और स्त्रियाँ सम्भाजी राजा पर थूक रहे थे। इस प्रकार का अभद्र व्यवहार कर रहे थे। अपने राजा की यह अपमानजनक स्थिति देखकर निष्ठावान रायप्पा का कलेजा टुकड़े टुकड़े हो रहा था। जंजीर की कड़ियाँ और रस्सियाँ राजा के शरीर में चुभ रही थीं। पहले तो राजा के शरीर मे असह्य पीड़ा उठी परन्तु धीरे-धीरे उनका शरीर संवेदनशून्य हो गया। मानो वह सूखा काठ हो गया हो। उस दुर्देवी जीव को अब किसी का भय, कोई शर्म शेष ही नहीं रहा। अब न किसी के प्रति क्रोध था, न ही अस्वीकार। बड़ी बड़ी गम्भीर आँखें सीधे सामने की ओर देख रही थीं। कहाँ गयीं वे पालकियों ? राज्यारोहण के समय रायगढ़ पर निकली वह शोभा यात्रा ? कहाँ गये वे हाथ जिन्होंने राजा को देवता की तरह पालकी में बिठाकर घुमाया था, राजा को स्वराज्य भर में गौरव दिया था। कहाँ वह माणिक मोतियों से सजा राजमुकुट ? और कहाँ यह घुँघरूओ वाली विदूषक की लकड़ी की टोपी ? कहाँ गले में चमकने वाले हीरे जवाहरात के गहने ? और कहाँ यह शरीर मे चुभने वाली, जगखाई जंजीरों का अशोभनीय बोझ ? माघ मास का तपता सूर्य सिर पर अंगारे बरसा रहा था। जिस सिर पर देवो की भाँति पुष्प वृष्टि होती थी, उसी सिर पर आज फटे जूतों और पत्थरों से प्रहार हो रहा था। यह कैसा जुलूस ? यह तो देवदूतों का सिर फोड़ने वाली शोकयात्रा थी। वे बड़ी बड़ी आँखें झपक नहीं रही थीं। उन्हीं खुली आँखों से हांकर अतीत सम्भाजी 705

के अनेक दृश्य मन-पटल पर उभर रहे थे। डचों, पुर्तगालियों या अँग्रेजों का कोई प्रतिनिधि जब रायगढ़ आने लगता था तो उसके वरिष्ठ सुझाव देते थे, 'वहाँ जा हो रहे हो तो शिवाजी से मिलने के पहले राजपुत्र सम्भाजी से अवश्य मिलना। सम्भाजी नाम का यह युवराज बहुत होशियार, तेजस्वी और आत्मीय है। वह शिवाजी की तरह ही तेजपुंज, नीतिज्ञ और काव्यशास्त्र निपुण है। ऐसा लगता है मानो सम्भाजी शिवाजी महाराज के ताज में चमकने वाला तुर्रा है।' इस प्रकार के अनेक प्रसंग स्मृतिलोक में सगुण-साकार होने लगे। 'पिताजी जहाँ-जहाँ आप अनुपस्थित रहेंगे वहाँ यह सम्भा दौड़कर पहुँच जाएगा।' आगरा में बालक सम्भाजी के मुख से निकले इस उद्गार को काल भी विस्मृत नहीं कर सकता। केवल नौ वर्ष का वह चुलबुला बच्चा अपने पिता की अनुपस्थिति की रिक्तता को भरने के लिए दौड़ पड़ा था। बादशाह की आँखों में आँख डालकर देखने वाले राजकुमार को विदूषकों का लिबास पहनाकर शैतान के दरबार में ले जाया जा रहा था। उस जुलूस में पहरा देने वाले मुगल सिपाही भी डरे हुए थे। इस मरियल ऊँट पर लदा हुआ व्यक्ति सम्भाजी ही है, इस बात को अच्छी तरह जानने पर भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। उनमें से अनेक पिछले आठ सालों में बुरहानपुर, सोलापुर, गोवा, कल्याण जैसे किसी न किसी स्थान पर सम्भाजी की सेना से लड़े थे। उस समय की सम्भाजी की दहशत, उनका दबदबा वे अभी तक भूल न पाए थे। उस समय उनकी रातों की नींद उड़ गयी थी। ढोल-तासों की कान फाड़ने वाली आवाज बहादुरगढ़ के शाही द्वार पर गूँजने लगी। छतों पर, छज्जों पर, स्त्रियों और बच्चों की भीड़ बढ़ गयी। बहादुरगढ़ के एक महल में महाराष्ट्र के तीन दुष्ट व्यक्ति इस तरह मुँह लटकाए खड़े थे मानो उनका बाप मर गया है। उनके साथ महाराष्ट्र के कुछ स्वार्थी मराठा और कुछ ब्राह्मण जागीरदार, कुछ शास्त्रीपंडित भी गम्भीरता से राह देखते खड़े थे। आसमान में काले मेघों की सेना जमा हो गयी थी। उन काली घटाओं के पीछे मानो देवता और दानव भी रो रहे थे। यहाँ की मिट्टी पर सोने का मुलम्मा चढ़ाने वाले शिवाजी महाराज के योग्य पुत्र का इस प्रकार खुला अपमान किया जा रहा था। यह कृत्य देवादिकों को भी असह्य था। उस मरियल ऊँट पर से सम्भाजी राजा ने आसमान में छाए काले मेघों की ओर देखा। उन काले बादलों में उन्हें जीजामाता की काली आँखों का आभास हुआ। उनका स्मरण होते ही उनकी सूनी आँखों से आँसुओं के चार फूल गालों पर टपक पड़े। जीजामाता ने शिवाजी के आठ विवाह इस दृष्टिकोण से किये थे कि इन सभी जागीरदार घरानों का शिवाजी को सहयोग मिलेगा। यह उनकी व्यावहारिक सोच थी कि संकट के ये सारे घराने शिवाजी के सहाय बनेंगे। परन्तु संसार की 706 . सम्भाजी

अलग है। मराठे हों या अन्य, जागीर और धन के लोभ ने उन्हें पागल बना दिया था। हड्डियाँ चबाने वाले कुत्ते जिस प्रकार किसी भी हालत में हड्डियाँ छोड़ने को तैयार नहीं होते वैसे ही ये जागीरदार थे। इसलिए पहाड़ जैसे उपकारों को भूलकर यहाँ के अनेक जागीरदार अपनी बुद्धि को शत्रु की सेज पर सुलाकर पूरी तरह रिक्त हो गये थे। जुलूस आगे बढ़ रहा था। रायप्पा सम्भाजी की घायल और वेदनामय अवस्था को बार बार देख रहा था। उसे एक घटना का स्मरण हुआ। जब सम्भाजी केवल बीस वर्ष के थे तो सांदोशी के जंगल में एक बाघ उत्पात मचा रहा था। दूसरी ओर दृष्टि केन्द्रित किये सम्भाजी इस बाघ के शिकार के लिए बैठे थे। उस समय पीछे की ओर से बाघ ने सम्भाजी पर छलाँग लगा दी थी। उसी क्षण रायप्पा ने अपने तेज कोयते से चौड़ी पीठ वाले बाघ के टुकड़े टुकड़े कर दिये थे। अब मुगल बैतालों के घेरे में वह अपने राजा की नौका डूबते देख रहा था। यह उसकी आँखों से सहा नहीं जा रहा था। जुलूस किसी तरह बहादुरगढ़ के नगर द्वार तक पहुँचा। सामने का महादरवाजा खुला। राजा के लिए कुछ करने का यही अवसर था। रायप्पा का निष्ठावान खून खौल उठा, कान गर्म हो गये, नसें जलने लगीं। सोचने समझने में कुछ समय लगे इसके पहले ही उसने बन्दोबस्त में लगे एक राजपूत की तेज धार वाली तलवार खींच ली। लोग कुछ समझ पाएँ इससे पहले ही उसने बगल के अधिकारियों को सपासप छाँट दिया। 'महाराजऽऽ शम्भू महाराजऽऽ' ऐसा उद्घोष करता हुआ वह आगे बढ़ा। अपनी तलवार से राजा के शरीर पर बँधी जंजीर को काटने का व्यर्थ प्रयास करने लगा। इतने में 'सम्भा का आदमी.. दुश्मन...' ऐसा शोर मुगलों ने किया। ऊँट से अकेले जूझने वाले रायप्पा की ओर एक साथ असंख्य तलवारें खिंच गयीं। रायप्पा के सिर, बाँहें, पीठ आदि सभी अंगों पर तलवारों के घाव हुए। खून के फव्वारे उड़े। एक ही क्षण में रायप्पा के शरीर के तीस- चालीस टुकड़े हो गये। मगरूर मुगलों पर इस घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रास्ते में पड़े रायप्पा के मांस के टुकड़ों को कुचलते हुए जुलूस आगे निकल गया। घटना का ज्ञान सम्भाजी को हो गया था। रायप्पा के गर्म खून की धार सम्भाजी के पैरों पर पड़ी थी। शिवाजी, सम्भाजी और हिन्दवी स्वराज्य को बनाने वाले सच्चे और निष्ठावान श्रमिकों के खून से किया गया यह आखिरी अभिनन्दन था। उन ईमानदार गरीबों के परिश्रम और साहस का स्मरण सम्भाजी को हुआ। उनका हृदय कृतज्ञता से भर आया। सम्भाजी :: 707

भीमातट की करुण कथा एक शीर्ष भाग पर चाँद तारों की मीनार से सुशोभित सज धज शानदार दिखने वाले महल के सामने से जुलूस आगे निकल रहा था। उस महल के भीतर तीन प्राणियों को कैद किया गया था। ढोल, तासों और तुरुहियों की आवाज इन तीनों बन्दियों के कानों में पड़ रही थी। तीनों व्याकुल हो गये। यदि उनके धक्के से सामने की दीवार टूट सकती तो उन्होंने यह प्रयास भी किया होता। उन्हें सूचना मिल गयी थी कि सम्भाजी को कैद कर लिया गया। उनकी मुश्कें बाँधकर उन्हें बहादुरगढ़ लाया जा रहा है। उस दुखद समाचार से तीनों निरन्तर विलाप कर रही थीं। बादशाह के हुक्म के अनुसार इखलासखान और हमीदुद्दीनखान सम्भाजी राजा और कविराज को दीवाने खास की ओर जुलूम के साथ ले जा रहे थे। बादशाह के दरबार में मक्का मदीना जैसे उत्सव का वातावरण बन गया था। दरबार में सभी अमीर उमराव, शहजादे, पोते, रिश्तेदार आदि उपस्थित थे। इसी समय मुकर्रबखान, इखलासखान और बहादुरखान बादशाह के सामने प्रस्तुत हुए। उन्होंने झुककर बादशाह को सलाम किया। बादशाह ने पिता पुत्र को अनेक मूल्यवान उपहार देकर मालामाल कर दिया। वे दोनों झुके झुके ही बगल में सरक गये। बादशाह ने सामने की ओर नजर उठाई। जंजीरों से पूरी तरह जकड़े हुए सम्भाजी राजा और कवि कलश खड़े थे। इस दृश्य को देखकर बादशाह बहुत प्रसन्न हो गया। उसकी भावभरी प्रसन्न अवस्था को देखकर दरबार में उपस्थित अनेक लोगों की आँखों में आँसू उमड़ पड़े। बादशाह से रहा नहीं गया। वह अत्यधिक भाव विभोर हो अपने रत्नजड़ित सिंहासन से उठकर खड़ा हो गया। कौड़ियों की माला सीने से चिपकाए सिंहासन की सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया। पूरा दरबार उसकी ओर उत्सुकता से देखने लगा। बादशाह ने जमीन पर अपना माथा टेका। अल्लाहताला का एक धुँधला बिम्ब उसकी 708 . सम्भाजी