छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज ही कोई उपाय सुझा सकते हैं। किन्तु मगरमच्छ की मुट्ठी में फँसे महाराज तक पहुँचें कैसे?" इस चर्चा के दौरान रायप्पा को सिसकी आ गयी। उसने कहा, "कम से कम अब तो मुझे न रोकें। बारिश हो या तूफान, महाराज के पास कैसे पहुँचना है, इसे मैं देखूँगा।" खंडो बल्लाल ने मसौदा लिखा। महारानी ने उसे मुद्रांकित किया। सभी से विदा लेकर रायप्पा अपने भाई देवप्पा को साथ लेकर वहाँ से बाहर निकला। उनके घोड़े कराड़ की दिशा में दौड़ पड़े। सूर्य पश्चिम की ओर झुक गया था। पहाड़ और घाटियों में अँधेरा भरने लगा। लिंगाणा किले की ऊँची उठी गर्दन आज टूटी-सी दिखाई दे रही थी। धनाजी और सन्ताजी बहुत मायूस हो गये थे। महारानी के ललाट का कुंकुम माथे पर बिखर गया था। उन दोनों उद्विग्न तरुणों की ओर देखकर महारानी बोलीं, "धनाजी, सन्ताजी धीरज से काम लो। हमारा कुंकुम बचाने के लिए स्वराज्य का भाग्य फूटना नहीं चाहिए।" छह दोपहर का समय, बाहर की बंजर भूमि पर लू चिलचिला रही थी। औरंगजेब का डेरा अमदनगर के बंजर मैदान में पड़ा हुआ था। इन दिनों बादशाह ने अकलूज, अमदनगर जैसे नाम रख दिए थे। अकलूज, दौंड, चांभारगोंदा जैसे क्षेत्र सदैव अकाल की चपेट में आते थे। इसी कारण से फरवरी का महीना होने पर भी यहाँ तेज धूप निकली थी। दिन अनेक स्थानों पर मृगमरीचिका दिखाई पड़ती थी। इन दिनों औरंगजेब बादशाह बड़ी उलझन में था। कितनी बड़ी फौज, कितने वर्ष का समय, कितने धन का अपव्यय और कैसा दुर्भाग्य? वह काफिर का बच्चा सम्भा हाथ ही नहीं लग रहा था। औरंगजेब की जिन्दगी की यह सबसे बड़ी मुहिम एक मृगमरीचिका ही सिद्ध हो रही थी। बादशाह दरबार में अपने मुंशियों को कुछ लिखित सूचनाएँ दे रहा था। ऐसे समय में बादशाह के कार्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान महापाप समझा जाता। उच्चासन पर बैठा बादशाह कुछ बोल रहा था और मुंशी उसे लिख रहा था। इसी बीच एक दूत साहस करके बादशाह के पास आकर खड़ा हो गया। उसका वहाँ 694 सम्भाजी