छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 697, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहुँचना और बादशाह के समीप खड़ा होना सामान्य स्थिति में इसे धोखादायक और आपत्तिजनक माना जाता। इतना ही नहीं इस प्रकार की धृष्टता किसी अन्य व्यक्ति ने की होती तो पहरेदारों ने उसके सिर को मुर्गे की तरह छाँट दिया होता। किन्तु उस दूत के वहाँ तक पहुँचने के पहले ही पहरेदारों में कानाफूसी शुरू हो गयी थी। साथ ही उनके चेहरे पर प्रसन्नता झलकने लगी थी। वह समाचार ही इतना आनन्ददायी था कि सभी सैनिक आनन्द से विह्वल हो रहे थे। हँसी के ऐसे फौवारे छूट रहे थे मानो कि सन्तानहीन सम्राट को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई हो। बाहर से आने वाली आनन्द लहरियों से भीतर बैठे लोग चकित हो रहे थे। वे ठीक ठीक समझ नहीं पा रहे थे कि वहाँ क्या हो रहा है? अष्टावधानी बादशाह सावधान था। मसौदा लिखाने में व्यस्त होने पर भी दरबार की गतिविधियों पर उसकी कड़ी नजर थी। उसके सेवक कोई खुशी की खबर देने के लिए बेताब हो रहे हैं इसका अन्दाजा उसकी अनुभवी नजरों ने पहले ही कर लिया था। परन्तु यह खुशी की खबर ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकती है, इसका भी अनुमान उसने कर लिया था। इसलिए बिना विचलित हुए अपना कार्य करता रहा। परन्तु थोड़ी देर में शराब पिलाए गये ऊँट की तरह उसका सेवक बेताब होने लगा। इस बात के ध्यान में आते ही वह विचलित हुआ। अपना कार्य छोड़कर बड़े कठोर स्वर में बादशाह ने दूत से पूछा "क्या बात है?" बादशाह ने दूत की ओर नफरत से देखा और व्यंग्यपूर्ण शब्दों में बोला "ईरान में हमारे बेवकूफ अकबर का कुछ भला बुरा हुआ है क्या?" "नहीं आलमपनाह! इससे बड़ी बहुत बहुत बड़ी खुशी की खबर है। वह शैतान सम्भा कैद हो गया।" "कौन?" बादशाह ने अपनी गर्दन झट से घुमाई। "वही, शैतान सम्भा।" "क्या हुआ उसका?" "कैद हो गया। अपने हाथ लग गया।" "किसने कैद किया?" बादशाह ने धीमे स्वर में पूछा। "मुकर्रबखान ने।" "कहाँ?" "सह्याद्रि की घाटी में।" बादशाह ने अविचल भाव से उस दूत को अपने पास बुलाया। उसे अपने कानों तक आने दिया। किन्तु इसके बाद बादशाह का धैर्य छूट गया। वह झट से उठकर खड़ा हो गया और पटापट दूत के गालों पर चोटें जड़ दिये। बादशाह की गोरी चिट्टी मुखमुद्रा क्रोध और अविश्वास से तप्त हो गया। उसका हाथ रुक नहीं रहा था। किन्तु मार खाने वाले दूत की हँसी भी कम न हो सम्भाजी 695