छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन उत्साही युवकों, बूढ़ों, स्त्रियों और बच्चों पर जमींदार लोग दृष्टि डालते थे और सूझबूझ की मुद्रा में कहते थे, "ऐसी भूल मत करो। खान की सशक्त सेना अपने गाँव पर आक्रमण कर देगी तो अपना सारा गाँव जलकर खाक हो जाएगा।" आँसू भरी आँखों से युवक कहते, "तो सरकार हम करें तो क्या करें?" "हम हैं न? चिन्ता क्यों करते हो? हमने अभी कुछ देर पहले बुध के जमींदार साहब के पास घोड़ा भेजा है। उन लोगों की भी सलाह लेंगे। थोड़ा समय लगेगा, परन्तु सभी मिलकर राजा को छुड़ाएँगे।" आवेश से प्रज्वलित युवकों के उत्साह पर बड़े कौशल से व्यवस्थित रूप से पानी डाला जा रहा था। पाँच तीसरे दिन भोर होते होते धनाजी और सन्ताजी पाचाड़ पहुँच गये। महारानी येसूबाई पाँच-छह हजार की सेना तैयार करके नीचे उतर आयी थीं। अत्यन्त दुखी धनाजी और सन्ताजी की ओर देखा न जाता था। राजमन्दिर में अनुभवी लोगों के साथ विचार-विमर्श हुआ। येसाजी कंक के साथ परामर्श करके येसूबाई ने अपनी राय प्रकट की, "अनेक गढ़ों-किलों से फौज हटाकर खान के पीछे भागना ठीक नहीं होगा। यदि दूसरी ओर से बादशाह की सेना ने आक्रमण किया तो धोखा हो जाएगा।" खंडो बल्लाल ने समर्थन करते हुए कहा, "सच है महारानी।" कुल सात-आठ हजार की फौज लेकर बाहर निकलने का निश्चय किया गया। महारानी घोड़े पर सवार हुईं। ताराऊ और राजाराम को पीछे छोड़कर, 'हर हर महादेव' का उद्घोष करती हुई सेना बाघोली घाटी के नीचे उतरने लगी। यम के दाँतों तले से अपने सत्यवान को खींच ले आने वाली सावित्री का शौर्य येसूबाई में सम्भ्रमित हो गया था। धनाजी और सन्ताजी के घोड़े रणोन्माद से उन्मत्त हो गये थे। बाघोली की घाटी पार होते न होते हंबीरराव के भाई हैबतराव सामने आ गये। वे रायगढ़ के लिए ही निकले थे। रास्ते में महारानी को घोड़े पर सवार देखकर हैबतराव मोहिते घोड़े से नीचे उतर पड़े। रकेब में पड़े महारानी के पैरों को पकड़कर वे जोर-जोर से रोने लगे। वे छोटे बच्चे से भी अधिक अधीर हो गये थे। येसूबाई को ही उनका धीरज बँधाना पड़ा। येसूबाई ने कहा, "पोंछ डालिए अपने आँसू। उल्टी दिशा में लौट पड़िए। सम्भाजी राजा को छुड़ाकर ही रायगढ़ जाएँगे।" 692 :: सम्भाजी