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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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आँखों के सामने आया। बादशाह की नाक जो स्वभावतः कुछ लाल थी अब और भी लाल दिखाई देने लगी। उसके पतले होंठ काँपने लगे। सुनहली दाढ़ी के बाल थरथराने लगे। आनन्दातिरेक से वह कुछ उन्मत्त-सा हो उठा था। अल्लाहताला से याचना करते हुए बादशाह को लोग पहली बार देख रहे थे। भरे दरबार में बादशाह सिंहासन से पहली बार नीचे उतरा था। सोलह सत्रह साल पहले शिवाजी महाराज ने रायगढ़ पर अपना राज्याभिषेक करवाया था। यह समाचार जब बादशाह को दरबार में मिला तो उसका मन घृणा से भर गया था। शर्मसार बादशाह तब भी तिलमिला कर सिंहासन से नीचे उतरा था। तब भी उसने जमीन पर झुककर कहा था—या अल्लाह! कितना बुरा समय आ गया ? कास्तकारों और किसानों के हँसिया लेकर जंगलों में घास काटने वाले बच्चे भी सिंहासनों पर बैठने लगे ? आज भी बादशाह गदगद होकर भरे दरबार में अल्लाह को पुकार रहा था। वह कृतज्ञता के भाव से भर गया था। पूर दरबार भावनाओं से आन्दोलित हो गया। जमीन पर झुके बादशाह को कवि कलश ने देखा। उनकी कल्पना जागृत हो उठी। जंजीरों से बँधे कवि कलश की छाती गर्व से फूल गयी। वे अपनी सरस मर्दानी आवाज में गा उठे— यावन रावन की सभा शम्भु बँध्यो बजरग। लहू लसत सिन्दूर सम बहु खेल्यो रण रंग।। ज्यों रवि सारी लखत ही, खद्योत होत बदरंग। त्यों तुव तेज निहारि के तख्त तज्यो अवरंग।। इसके बाद बादशाह धीमी गति से एक-एक कदम रखते उन दोनों कैदियों के सामने आकर खड़ा हो गया। वे दोनों औरंगजेब की आँखों में आँखें डालकर दहकती नजरों से उसे देख रहे थे। शरीर को जकड़कर बाँधने वाली जंजीरों की उन्हें कोई चिन्ता नहीं थी। उन्हें देखकर इखलासखान चिल्लाया, "सम्भाऽऽ! पागलऽ तुझे जिन्दगी प्यारी है या नहीं? बादशाह को तमीज से देखो। " किन्तु वे दोनों औरंगजेब को उसी तरह देखते हुए खड़े रहे। बादशाह फिर से सिंहासन की ओर मुड़ा तब फौलादखान हंटर की तरह सम्भाजी राजा पर टूट पड़ा, "पागलो! बादशाह को सलाम करो। अपनी जिन्दगी बचा लो।" परन्तु वे दोनों अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ताने दरबार की ओर देखते रहे। बादशाह के सरदार और सेवक हाथ से उनकी ओर संकेत कर रहे थे। बेचैन होकर फौलादखान कवि कलश की ओर गया। उनकी भुजा को नोंचते हुए चिल्लाया, सम्भाजी :: 709