छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"पागलऽ अपने बाप को सलाम कर।" खान के शब्द कविराज के सीने में घाव कर गये। कविराज ने क्रोधावेश में आकर खान की कमर पर जोर से लात मारी। फौलादखान मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ा। गिरने की आवाज सुनकर बादशाह ने पीछे मुड़कर देखा तो फौलादखान अपना अँगरखा झाड़ते हुए खड़ा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। औरंगजेब ने जुल्फिकारखान को अपने पास बुलाया। सिंहासन के पास जाकर जुल्फिकार नीचे घुटनों के बल बैठ गया। बादशाह ने उसके कान में कुछ महत्त्वपूर्ण बात कही। जुल्फिकार ने विनम्र आज्ञाकारी की भाँति सिर हिलाया। जुल्फिकार बड़ी तेजी से कदम बढ़ाते हुए दरबार से बाहर निकल गया। उन दोनों राजबन्दियों को बन्दीखाने में भेज दिया गया। बहादुरगढ़ पर उत्सव का वातावरण था। शर्बत के बड़े-बड़े बर्तन खाली हो रहे थे। हिन्दुओं की दीवाली की तरह रोशनी की जा रही थी। बादशाह की बहुत बड़ी विपत्ति टल गयी थी। अब लोग दिल्ली की ओर लौट सकेंगे, इस कल्पना से ही सभी प्रसन्न हो गये थे। इस खुशी के भीतर एक डरावना सन्नाटा भी छा गया था। मुगल और दक्खिनी सिपाही, एक-दूसरे के कान में कुछ खुसुर फुसुर कर रहे थे। "शायद जहन्नमी सम्भा के लिए यह रात आखिरी रात साबित होगी।" "बिलकुल, क्यों नहीं? दारा जैसे अपने सगे भाई का सिर दो तीन दिनों में ही छाँट दिया था।" "ठीक कहते हो मियाँ! उस गोकल की याद है न? वह किसानों का विद्रोही नेता। उसे पकड़कर, बोटी-बोटी काटकर बाहर फेंक दिया गया था। मथुरा के मन्दिर भी जलाकर खाक कर दिये गये थे।" "सच है भाईजान। एक बार अल्लाह ताला इन काफिरों को माफ कर सकता है किन्तु बादशाह औरंगजेब कभी नहीं।" दो सखुबाई का मन्दिर बहादुरगढ़ के थानेदार को बहुत प्रिय था। बहुत-सी देवी- देवताओं की मूर्तियाँ और धातुओं पर खुदी हुई तस्वीरें रखी थीं। छत से नीचे तक लटकने वाली सोने-चाँदी की घंटियाँ, विशेष रूप से कमर तक ऊँची म्हालजाई 710 :: सम्भाजी