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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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वह सूबेदार आगे बढ़ा। घास के गट्ठर जल्दी से खोलकर वहीं गीली जमीन पर एक हल्का-सा बिछौना तैयार किया। दुखने वाले शून्य हुए शरीर वाले सम्भाजी और कविराज को हाथ का सहारा देकर, धीरे से खींचकर बिछौने पर लिटा दिया। अँधेरे में उसका चेहरा भी पहचान में नहीं आ रहा था। किन्तु उसके काँपते हाथ बहुत दयालु और प्यारभरे थे। उस सूबेदार ने उन दोनों को वहाँ पर ठीक से सुला दिया। यह स्थिति देखकर उसका मन अचानक भर आया। वह वहीं पर नंगी जमीन पर बैठ गया। सम्भाजी का पैर पकड़कर वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसके गर्म आँसुओं से सम्भाजी राजा की चेतना जाग गयी। सम्भाजी ने व्याकुलता से पूछा, "कौन भाई मियाँखान?"

पाँच

"जहाँपनाह! आज भी यदि किसी ने 'रामशेज' ऐसा कहा तो ऊँट और घोड़े थरथर काँपने लगते हैं। बेजुबान जानवरों का यह हाल है तो फौजियों का क्या होगा?" असदखान ने कहा। "वजीरे आजम! आपने हार मान ली क्या?" बादशाह की कत्थई आँखें उग्र हो गयीं। मुझे बस इतना ही कहना है, मेरे आका। रामशेज जैसे मराठों के साढ़े तीन सौ किले हैं, उनको जीतने के लिए बची हुई जिन्दगी को व्यर्थ में गँवाने के बदले सम्भा के साथ मीठी बातें करके पहले उसके किलों पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए, हजरतऽऽ।" औरंगजेब ने प्रश्नाकुल नजरों से रूहूल्लाखान की ओर देखा। तब खान बोला, "मेरे आका, सम्भा और कवि कलश जन्मजात बदमाश हैं। वे शाहंशाह को गाली देते हैं।" बादशाह अपने सहयोगियों की बातें शान्तिपूर्वक सुन रहा था। वह अपना मत प्रकट नहीं कर रहा था। वह सोच रहा था, 'सम्भा को तत्काल समाप्त न करके उसके साथ मीठी मीठी बातें करके, आवश्यक होने पर थोड़ी दहशत देकर उसके किलों पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए।' यही राय अनेक सरदारों की भी थी। दक्खिन में आठ-नौ वर्षों की संघर्षशील जिन्दगी बहुत हो गयी। अब कोई युद्ध नहीं चाहिए। अब तुरन्त उत्तर की ओर लौट जाएँ। इन्हीं विचारों में सभी बेताब हो रहे थे। आजकल बादशाह की मानसिक अवस्था बहुत अच्छी थी। वह अपने परिवार

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