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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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के साथ खाने का आनन्द लेता था। रिश्ते में चाचा लगने वाले असदखान को भी बड़े आग्रह से बुलाता था। बीच-बीच में उसे हास्य-व्यंग्य की लहर-सी आती थी। उसके व्यंग्य पर बेगमों को स्वयं पर नियन्त्रण रखना पड़ता था। बादशाह का नूर देखकर बेगमें मन्द-मन्द मुस्कराती थीं। एक बार बादशाह ने पूछा, "उदयपुरी! जब गोधूलि बेला-काफिरों की भाषा में साँझ होती है, तब काफिरों की औरतें क्या करती हैं?" उदयपुरी से कोई जवाब देते नहीं बना। तब बादशाह ने प्रश्नसूचक दृष्टि से असदखान की ओर देखा। असदखान ने सहजता से कहा, "ऐसे समय में वे औरतें इधर उधर घूमते हुए मुर्गे मुर्गियों और भेड़ बकरियों को इकट्ठा करती हैं।" इस बात पर रसोईघर में हँसी की लहर उठी। तब बादशाह ने अपनी शहजी की ओर गर्व से देखते हुए कहा, "जीनतउन्निसा बिटिया, तू ही बता इस सवाल का सही जवाब।" "अब्बाजान, साँझ के समय हिन्दू औरतें अपने मन्दिरों में दीप जलाती हैं। देवता को प्रणाम करती हैं। आँगन में आकर अपने पति की प्रतीक्षा करती हैं। घर के आसपास जब कहीं पति के घोड़े की टाप सुनाई पड़ती है तो उनके हृदय में खुशी का सागर लहराने लगता है।" "सम्भा को गिरफ्तार किये कितने दिन हो गये?" औरंगजेब का चेहरा एक कुटिल आनन्द मे खिल उठा। अपना पतला होंठ मगरूर दाँतों से दबाकर वह बोला, "सम्भा अपनी बेगम से कितनी मुहब्बत करता है, इसके अफसाने हम सुनते आये हैं। वह मूर्ख अपनी रियासत में अपनी औरत के नाम के सिक्के चलाता था। ऐसा लोग बताते हैं। खैर...सम्भा की पत्नी अब पागल हिरनी की तरह इधर-उधर भाग रही होगी, बावली होकर।" "क्या कहना चाहते हैं अब्बाजान?" शहजादी ने पूछा। "आज नहीं तो कल, अपने शौहर की जिन्दगी की भीख माँगती हुई वह जंगली हिरनी यहाँ जरूर आएगी।" "अब्बाजान?" "हाँ बिटिया, वह अकेले नहीं सारे किले की चाभियाँ साथ लेकर आएगी।" गर्व से चारों ओर नजर घुमाते हुए बादशाह ने कहा, "सम्भा की जिन्दगी की खातिर् बेताब होकर वह मेरे पैरों पर नाक रगड़ेगी, वह जरूर आएगी।" औरंगजेब की सावधान नजरों से कुछ ओझल नहीं रह पाता था। शहजादी जीनतउन्निसा आजकल बिना किसी कारण के ही बेचैन दिखती थी। बादशाह को महसूस हुआ कि जबसे सम्भा का जुलूस निकाला गया तबसे शहजादी की बेचैनी 718 :: सम्भाजी