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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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बड़ी सहायता की थी। स्वयं भारी खतरा उठाकर, अपनी जान संकट में डालकर, सम्भाजी ने उसे किस प्रकार बाहर भेजा था, मियाँखान को भूला नहीं था। सब कुछ साफ-साफ स्मरण था। यही कारण था कि सम्भाजी राजा की दशा देखकर मियाँखान का कलेजा टूट रहा था। इन्तजाम देखने के बहाने मियाँखान, उस दुर्गन्ध भरे बन्दीखाने में अनेक बार जाता था। उसके साथ उस पर जान छिड़कने वाले नौकर अन्दर जाते थे। राजा और कविराज को जितना सम्भव होता उतना फलाहार देने, जितनी सम्भव हो उतनी सेवा करने में मियाँखान स्वयं धन्य मानता था। इस जालिम कैदखाने में मियाँखान ही सम्भाजी और कविराज के लिए आँख कान था। उसी से बहादुरगढ़ के समाचार उन तक पहुँचते थे। एक बार मियाँखान ने सम्भाजी राजा से धीरे से कहा, "महाराज ! कुछ भी करके आपके इस गुलाम ने आपको बहादुरगढ़ के इस फौलादी किले से बाहर निकाल दिया होता, मगर...'' "मियाँखान ?'' "हाँ सम्भाजी महाराज। यहाँ से बाहर निकलने में मुश्किल नहीं है। मगर इसलिए कि चारों ओर सौ-सौ कोस तक केवल मुगलों का ही शासन है। इस जुल्मी बादशाह ने किसी के भी तबेले में घोड़े नहीं रखने दिये। हर गाँव से बहुत सारे युवकों को मार-मारकर भगा दिया। आसपास का सारा इलाका मुगलों के क़ब्ज़े में है।'' "जाने दो खानसाहब ! ज़िन्दगी का इतना मोह क्या? कुछ लोग जन्म ही बुरी घड़ी में लेते हैं, क्या कहा जाए? ऐसे लोग अपनी जिन्दगी से नहीं अपनी मौत से यश प्राप्त करते हैं। ऐसे तेजस्वी लोगों की मालिका में सम्मिलित होने के लिए ही जगदम्बा ने हमें बनाया होगा? फिर दोष किसको दें?'' रायप्पा महार ने जुलूस के समय अपना जीवन-पुष्प सम्भाजी महाराज के चरणों में चढ़ा दिया था। उसकी बौखलाहट का अनुमान करके उसके भाई देवप्पा ने महारानी की चिट्ठी अपने पास रख ली थी। संयोग से देवप्पा और मियाँखान की भेंट हो गयी। परिणामस्वरूप चिट्ठी और देवप्पा दोनों सही जगह पर पहुँच गये। उस दिन अमलदार की हैसियत से मियाँखान बन्दीखाने में रात को गया। उसके सहयोगी कर्मचारी साथ थे। अन्दर जाकर उन्होंने कैदखाने का दरवाजा बन्द कर लिया। हजारों फौजियों के कड़े पहरे के बावजूद मियाँखान की सहायता से येसू महारानी का पत्र सम्भाजी राजा तक पहुँच गया। अपनी प्रिय रानी के अक्षरों को पढ़ते समय सम्भाजी की आँखें भर आयीं। महारानी ने लिखा था— "महाराज, चिन्ता न करें। हमने बड़े पैमाने पर फौज एकत्र करना आरम्भ कर 722 :: सम्भाजी